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रंगों का राजनीतिकरण

Posted On: 7 Jan, 2018 Junction Forum में

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पेंट बनाने वाला एक ब्रांड जब विज्ञापन में कहता था
‘ रंग देखे नहीं सोचे जाते हैं ” तब यह उस पेंट के प्रति आकर्षण उत्पन्न करता था .रंग से यह दुनिया खूबसूरत है .
अन्थोनी टी हिंक्स का कथन है…
I celebrate life with a different color each day.
that way ,each day is different .”
“मैं प्रत्येक दिन अलग/विविध रंग से जीवन उत्सव मनाता हूँ ,इस प्रकार प्रत्येक दिन अलग/विविध हो जाता है .”
खलील जिब्रान का कथन है..
Let me ,O let me bathe my soul in colours ;let me swallow the sunset and drink the rainbow .”
“मेरी रूह को रंगों में नहा लेने दो मुझे सूर्यास्त को निगल लेने दो और इंद्रधनुष को पी लेने दो .”
हमारी ज़िंदगी रंगों से भरी रहे यह हम ना सिर्फ अपने लिए बल्कि दूसरों के लिए भी दुआ करते हैं.
प्रत्येक रंग कुछ विशेष अर्थ और संवेदना से जुड़ा होता है. ये रंग ही हैं जो कुछ भी दिखा सकते हैं और ये रंग ही हैं जो कुछ भी छुपा सकते हैं.दृष्टि की बात की जाए तो कुछ रंग आसानी से ध्यान आकर्षित करते हैं कुछ कम दृष्टिगोचर होते हैं .दोस्तों , मेरा मानना है कि वही नेतृत्व सर्वश्रेष्ठ है जो इंद्रधनुषी सौंदर्य में विश्वास करता है .सभी रंग अपनी अपनी पहचान बनाये रखते हैं स्पष्ट दृष्टिगोचर भी होते हैं पर जब आकाश में एक साथ होते हैं तो उन्हें विबग्योर VIBGYOR violet indigo blue green yellow orange red नहीं बल्कि इंद्रधनुषी आभा के साथ बिखरते देखा जा सकता है .
सियासत के सौंदर्यीकरण के लिए रंगों की राजनीति स्वीकार्य नहीं हो सकती है फिर भी अगर रंगों से ही खूबसूरती संभव है तो फिर वह रंगों का इंद्रधनुषी एकीकरण हो कोई रंग विशेष नहीं .किसी भी रंग विशेष को दल विशेष से जोड़ना उचित नहीं .
बसपा के नीले सपा के लाल हरे रंग के बाद अब उत्तर प्रदेश राज्य में केसरिया /भगवा रंग की राजनीति ने सियासत को स्याह करना शुरू कर दिया है .रंगों का प्रयोग गलत नहीं क्योंकि रंगों से ही कुदरत खूबसूरत है पर जान बूझ कर इसे सियासत से जोड़ना अनुचित है.मुख्य मंत्री जी के व्यक्तिगत उपयोग की वस्तुओं का भगवा रंग कोई बात नहीं यह उनकी व्यक्तिगत पसंद और ज़रुरत हो सकती है परन्तु सरकारी बुकलेट्स स्कूल बैग्स बसों को एक रंग विशेष से सजाना सियासी सीरत के सिवा कुछ भी नहीं .संकल्प सेवा के तहत ५० केसरिया रंग के बसों को झंडी दिखा शुभारम्भ करना ,स्टेज को केसरिया रंग के पर्दों से सजाना यहां तक कि उड़ाए जाने वाले गुब्बारों का रंग भी भगवा … अन्य सभी रंगों के महत्व को दरकिनार करता प्रतीत होता है.एक लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष देश में रंगों का यह राजनीतिकरण सौंदर्यीकरण की ऐसी सियासत नहीं जंचती .२९ अगस्त को राज्य के स्पोर्ट्सपर्सन्स को लक्ष्मण और रानी लक्ष्मी बाई अवार्ड्स दिए गए .सर्टिफिकेट्स की पृष्ठभूमि केसरिया रखी गई.सरकारी विभाग के सभी मंत्रियों और अधिकारियों के कांटेक्ट डिटेल्स वाली इस वर्ष की डायरी का आवरण पृष्ठ भी केसरिया रंग का है.यह सपा के कार्य काल में लाल और बसपा के समय नीला होता था .(१९९५ में जब मायावती जी की सरकार बनी तो सभी सार्वजनिक कार्यक्रम के पंडाल नीले रंग के ही होते थे. उन्होंने सडकों के dividers को भी अंतराष्ट्रीय मानक के पीले और काले के विपरीत सफ़ेद और नीले में कर दिया था .)पश्चिम बंगाल में भी जब कम्युनिस्ट की सरकार थी तब सभी पेंटिंग्स लाल रंग में थी क्योंकि यह रक्त और आम जनता के संघर्ष का प्रतीक रंग था. ममता बनर्जी जी की सरकार आते ही सब कुछ नीले और सफ़ेद रंग में किया गया .हालांकि रंगों में बदलाव के प्रश्न पर श्री श्रीकांत शर्मा जी ने कहा ,”हम सभी रंगों को पसंद करते हैं पर केसरिया हमारा पसंदीदा रंग है क्योंकि यह रंग त्याग बलिदान और शौर्य को दर्शाता है.उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि सरकार ने सोच समझ कर यह रंग नहीं चुना है.यह महज़ एक इत्तफ़ाक़ है.सरकार सबकी है और योजनाओं का लाभ भी सबके लिए है .रंगों पर किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए ..”
यह उचित है कि रंग विशेष से कोई आपत्ति नहीं है पर रंग विशेष का अतिशयता से प्रयोग कई प्रश्न ज़रूर खड़े करता है.
मुझे कहीं पढ़ा हुआ अन्थोनी टी हिंक्स का कथन याद आता है …
you can almost smell the damp earth when brown is your most favourite color .”
पर जब लक्खनऊ के हज ऑफिस की बॉउंड्री वाल को केसरिया रंग से रंगा गया तब मुस्लिम समुदाय के नेताओं ने आपत्ति जताई और फिर इसे ठेकेदार की गलती बता कर इसे हटाया गया .
ये सियासत की रंगीन मिज़ाज़ी है या सौंदर्यीकरण का जूनून
कि बेज़ुबान इमारत भी अब कई कई बार हैं होली मना रहे .

केसरिया रंग अपनाने से किसी को परहेज नहीं है .यह हमारे राष्ट्र ध्वज का सबसे ऊपरी रंग है .ऊर्जा बल त्याग साहस का प्रतीक है .यह प्रातः काल उगते सूर्य और सांयकाल अस्ताचलगामी सूर्य के सिंदूरी रंग का सौंदर्य है.फिर भी दोनों वक़्त के दरम्यान कुदरत आकाश को ज़रुरत के हिसाब से नीले सफ़ेद स्याह काले पीले और इंद्रधनुषी कई रंगों से सजाती रहती है .ज़रुरत इस बात को समझने की है कि रंग विशेष का प्रयोग कब कहाँ क्यों कैसे और कितना किया जाए ताकि इस रंग से जुड़े विशेष उद्देश्य भी पूरे हों और सौंदर्यीकरण में भी यह रंग अपनी अहम् भूमिका निभा सके .इतिहास गवाह है कि युद्ध पर जाने वाले बहादुर केसरिया रंग के वस्त्र ही पहन कर जाते थे.पर हम आज भी उसी परम्परा का निर्वाह नहीं कर सकते आज युद्ध के तौर तरीके तकनीक हथियार बदल गए हैं . आज ऐसे वस्त्र की ज़रुरत है जो उन्हें दुश्मनों से छिपाने में मदद कर सके इसलिए वे कॅमफ्लॉज वस्त्र पहनते हैं . हर रंग का अपना मह्त्व है पर किसी एक रंग से एकीकरण का प्रयास नेतृत्व के निष्पक्षता पर प्रश्न चिन्ह लगाता है .सबका साथ सबका विकास की अवधारणा तो इंद्रधनुषी सौंदर्य की पर्याय है .रंग विशेष की नहीं .नेता सूर्य है जनता वर्षा की बूँदें जब दोनों एक साथ होंगे तभी इंद्रधनुष की संरचना संभव है .

जैसा कि अन्थोनी टी हिंक्स कहते हैं
“जीवन में रंग आ ही जाते हैं जब आप थोड़ा प्रेम जोड़ देते हैं .”
color comes to life when you add a little love .”love powers my heart and color powers my soul .



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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sinsera के द्वारा
January 19, 2018

लेखक ह्रदय ऐसा ही होता है. छोटी छोटी बातों की सूक्ष्मता भी उसको विचलित कर देती है. आपके लेखों में यही लेखक हृदय ढूंढने आती हूँ प्रिय यमुना जी . भगवा रंग से याद आया अभी कहीं न्यूज़ में पढ़ा है कि सपा के निर्देशानुसार उनके क्षेत्र में टॉयलेट्स की दीवारें भगवा रंग में रंगी गयी हैं और स्पष्टीकरण में कहा गया है कि यह प्रधानमन्त्री जी का प्रिय रंग है. इस राजनीति को भला क्या नाम दें..

    yamunapathak के द्वारा
    February 15, 2018

    प्रिय सरिता जी सही बहुत सही . बहुत बहुत आभार

Rinki Raut के द्वारा
January 17, 2018

Politics have many shades and colour

    yamunapathak के द्वारा
    February 15, 2018

    सुन्दर बहुत सुन्दर . धन्यवाद् रिंकी jee

jlsingh के द्वारा
January 15, 2018

आदरणीया यमुना जी, बहुत ही सुन्दर विचारणीय आलेख लिखा है आपने! आपने सिर्फ रंग पर लिखा है. उनका हर पसंद आज आवश्यक और अनिवार्य बनाया जा रहा है. मूल मुद्दों से हटकर जनता को भटकानेवाले मुद्दे ही आज की मांग है शायद. विपक्ष सशक्त न होने के कारण आज विरोध करना देशद्रोह सा हो गया है. पता नबाही आगे क्या क्या होनेवाला है आप और हम देखेंगे … सादर!

    yamunapathak के द्वारा
    January 16, 2018

    आदरणीय जवाहर जी सादर नमस्कार आपका बहुत बहुत आभार

Shobha के द्वारा
January 7, 2018

प्रिय यमुना जी सुंदर लेख कई प्रश्न उठाता लेख सही है रंग सभी कुदरत के बनाएं हैं उन पर सियासत नहीं होनी चाहिए

    yamunapathak के द्वारा
    January 10, 2018

    आदरणीया शोभा जी सादर नमस्कार आपका बहुत बहुत आभार


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