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मैं साइन बोर्ड हूँ

Posted On: 27 Nov, 2017 Junction Forum में

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यात्रा के दौरान थक चुकी थी .राह की थकान से ज्यादा राह भटकने की थकान बेहाल कर रही थी .तभी एक साइन बोर्ड पर निगाह पडी …मानो मेरी थकान और बेहाली को शब्द दे रहा हो .” मैं एक साइन बोर्ड हूँ .भारत देश के एक राज्य के गाँव में रहता हूँ .मेरे कई भाई बहन रिश्तेदार भी देश के बड़े छोटे शहरों गाँवों में देशवासियों के मदद के लिए तैनात हैं .मैं तब बहुत दुखी होता हूँ जब कोई अन्य राज्य से आया हिंदी भाषी राह सिर्फ इसलिए भटक जाता है क्योंकि मैं उसकी कोई मदद नहीं कर पाता.कुछ स्थानीयलोगों की जिद की वजह से मुझे राजभाषा हिंदी के बिंदी से नहीं सजाया जाता ..मैं राष्ट्रीय नहीं बन पाता .बाशिंदों के कान्वेंट शिक्षित ना होने के कारण इंग्लिश के रंग भी मुझे नहीं लगाए जाते मैं वैश्विक भी नहीं हो पाता … मैं बस स्थानीय होकर रह जाता हूँ . “
मित्रों , कुछ महीने पूर्व कर्नाटक के बेंगलुरु के चिकपेट और मैजेस्टिक स्टेशन पर साइन बोर्ड पर हिंदी में लिखे शब्दों को टेप से ढक दिया गया था .ट्विटर पर एक अभियान चलाया गया था ….. #Nammametrohindibeda    … our metro , we don’t want hindi . हिंदी में उद्घोषणा को रोका जाए ,हिंदी शब्दों का साइन बोर्ड में प्रयोग ना हो … ऐसी कोशिश की जाती है.पिछले शुक्रवार को विक्रोळीी मुम्बई में मनसे कार्यकर्ताओं ने एक दुकानदार से मार पीट की क्योंकि साइन बोर्ड पर गुजराती में शब्द लिखे थे और यह उनके अनुसार मराठी भाषा का अपमान है.
साइन बोर्ड में भाषा के इस्तेमाल के लिए नियम बने हुए हैं .यूँ भी सर्वश्रेष्ठ बात यह है कि किसी भी साइन बोर्ड पर पहले उस राज्य विशेष की भाषा ,फिर हिंदी भाषा और फिर अंग्रेज़ी भाषा की लिपि में लिखे शब्द हों .स्थानीय से …राष्ट्रीय से… वैश्विक तक कदम बढ़ें .पहले जननी फिर जनक और फिर रिश्तेदार .त्रिभाषा का फॉर्मूला ऐसा ही हो .कई राज्यों में विदेशी भाषा अंग्रेज़ी से कोई विरोध नहीं दीखता पर हिंदी राजभाषा से है .यह अजीब सी विसंगति है.कई राज्यों की सरकार हिंदी को अपने राज्य की भाषा से नीचे लिखना पसंद करती हैं .उनका तर्क यह रहता है कि बाहर से आने वाले लोग स्वयं को राज्य विशेष से जोड़ सकें .पर यही बात उलटी दिशा में सोचें तो हिंदी समझकर राज्य के बाशिंदें स्वयं को राष्ट्र से और अन्य राज्यों के लोगों से जोड़ सकेंगे .ग्लोबल कंपनी के होटल रेस्टोरेंट स्थानीय भाषा में साइन बोर्ड रखना पसंद नहीं करते क्योंकि वे राष्ट्र को राज्य से ज्यादा महत्व देते हैं .अतः हिंदी भाषा और अंग्रेज़ी भाषा को ही बोर्ड मेंप्रयोग करना पसंद करते हैं .कई राज्यों में कुछ गाँव में हिंदी बिलकुल नहीं दीखता .हाल ही में हमें बेंगलुरु से कुछ दूर नंदी पहाड़ी घूमने जाना था .हम बार बार राह भटक रहे थे क्योंकि साइन बोर्ड में सिर्फ कन्नड़ भाषा का प्रयोग था .हिंदी या अंग्रेज़ी भाषा का नहीं .स्थानांतरण की वजह से हमें कई बार एक राज्य से दूसरे राज्य जाना ही पड़ता है .उत्तर प्रदेश की मूल निवासी ,झारखण्ड में शिक्षा और नौकरी रोजगार की वजह से अब तक महाराष्ट्र , मध्य प्रदेश , पश्चिम बंगाल , ओडिशा , कर्नाटक तक का सफर तय कर चुकी हूँ .ऐसे में हिंदी भाषा और अंग्रेज़ी भाषामें लिखी लिपि ही पढ़ सकती हूँ .हमारे कई रिश्तेदार हैं जो ग्रामीण परिवेश से आते हैं .वे अंग्रेज़ी भाषा नहीं पढ़ सकते .उनके लिए साइन बोर्ड में हिंदी भाषा ही मायने रखती है .
परिवहन और संचार सुविधाओं के प्रचार प्रसार होने से आज एक राज्य से दूसरे राज्य में शिक्षा रोज़गार व्यापार कई वजहों से लोग जाने लगे हैं .तकनीक क्षेत्र में देखें तो व्हाट्सप्प फेस बुक जैसे संवाद तकनीक सुविधाओं ने सामाजिक संरचना को नए आयाम दे दिए हैं .शादी विवाह अन्तर्राजीय होता जा रहा है.ऐसे में युवा तो शिक्षित हैं जो अंग्रेज़ी भाषा पढ़ सकते हैं पर उनके रिश्तेदार आज भी हिंदी और स्थानीय भाषा को ही समझते बोलते और लिखते पढ़ते हैं .ऐसे में यह संभव नहीं कि कार्य के सिलसिले में एक राज्य से दूसरे में स्थांतरण में हर नए राज्य की भाषा सीखी जाए .व्यावहारिक तौर पर भी और देश के प्रति सम्मान के वजह से भी हिंदी राजभाषा ही एक लिंक के रूप में इस्तेमाल होने वाली भाषा बनानी चाहिए .वर्त्तमान समाज बहु संस्कृति वाला समाज है .भाषा पहनावा खान पान के प्रति बहुत अधिक कठोरता व्यक्तिगत सामाजिक आर्थिक विकास को रोक सकती है. प्रत्येक संस्कृति भाषा को फैलाने फूलने का पूरा अधिकार है परन्तु राष्ट्र को हाशिये पर रख कर कभी नहीं .राष्ट्र है तो राज्यें हैं .और राज्यों से ही राष्ट्र है.इस अन्तर्सम्बन्ध को कारगिल से कन्याकुमारी …कच्छ से कामरूप तक प्रत्येक राज्य की सरकार और स्थानीय जनता को समझना ही होगा .

जननी ( राज्य की भाषा ) जनक (राजभाषा ) रिश्तेदार ( अंग्रेज़ी ) के त्रिभाषा रूप को साइन बोर्ड पर इस्तेमाल कर हम साइन बोर्ड के सही मायनों में महत्व को स्वीकार करने के भूमिका निभा सकते हैं .



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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

shashi bhushan के द्वारा
December 7, 2017

आदरणीय यमुना जी, सादर ! कहने को तो हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है, किन्तु जब संसद में ही हमारे आधे से अधिक सांसद अंग्रेजी में बोलने लगते हैं तो मन कुंठित हो जाता है ! ऐसा नहीं है की ये नेता हिंदी नहीं बोल सकते या नहीं जानते, शायद वे जानबूझ कर ऐसा करते हैं ! आदरणीय जवाहर भाई ने कहा कि शायद मोदी जी इसपर ध्यान दें ! ! काश ! मोदी जी ऐसा करते ! किन्तु न ऐसा कर रहे हैं न भविष्य में उनके द्वारा ऐसा होने की कोई उम्मीद दिखती है !

    yamunapathak के द्वारा
    December 8, 2017

    आदरणीय शशि जी सादर नमस्कार आप लम्बे अर्से के बाद मंच पर आये .आपके कमैंट्स देख मुझे बहुत अच्छा लगा .आपकी बातों से सर्वथा सहमत हूँ .चाहती हूँ आप सब पुनः इस अनुपम मंच पर सक्रीय हो जाएं .हमें इंतज़ार रहेगा . आपका बहुत बहुत धन्यवाद .

Shobha के द्वारा
November 29, 2017

प्रिय यमुना जी बहुत अच्छा लेख कई प्रश्न उठाता लेख मेरे माता पिता पंजाब के हैं ननिहाल जाना होता है कहीं भी स्टेशन पर न हिंदी न अंग्रेजी लिखी रहती है केवल गुरुमुखी कौन सा स्टेशन है पूछना पड़ता है कब हम हिंदी का महत्व समझेंगे और सुनिए हम ईरान में रहते थे वहां पाकिस्तानी ख़ास कर मुझसे प्रश्न करते थे जैसे पता चलता था भाभी का लिंक पंजाब से है बाजी बना देते अगला प्रश्न बाजी यह भईया ही तुम्हारे पिता को शादी के लिए भईया मिला था भईया मतलब यूपी मेरा जबाब होता भईया बहुत अच्छा है कहते चलो जोड़ी सलामत रहे बच्चों से कहते इन्हें मदर टंग पंजाबी नहीं सिखाई

    yamunapathak के द्वारा
    December 4, 2017

    आदरणीया शोभा जी सादर नमस्कार आपकी टिप्पणी हिंदी के प्रति परदेशियों के प्यार को ज़ाहिर करती है .यह सच है की अपने ही देश में हिंदी को लोग बेगाना बना रहे हैं .अंग्रेज़ी सामाजिक स्टेटस की भाषा मानी जाती है . आपका बहुत बहुत आभार्र

jlsingh के द्वारा
November 27, 2017

आदरणीया यमुना जी! आपका कहना बिलकुल ही सही है. शायद मोदी जी और भाजपा जो हिंदी, हिंदुस्तान,और भारत माता के प्रबल समर्थक लोग शायद इस बात पर ध्यान दें! हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है िष्का विरोध तो हरगिज नहीं होना चाइये. सादर!

    yamunapathak के द्वारा
    December 4, 2017

    आदरणीय जवाहर जी सादर नमस्कार दक्षिण भाग में हिंदी को लेकर स्वीकृति तो है पर हम हिंदी भाषियों के प्रयास इसके प्रचार प्रसार के लिए बहुत ज्यादा नहीं दिखते है . साभार


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