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क्यों भूल गए बनाना ' कश्ती कागज़ की ' ?? बाल दिवस पर

Posted On: 9 Nov, 2017 Special Days में

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अब तक हमारी उम्र का बच्चा नहीं गया
घर से चले थे जेब के पैसे गिरा दिए .
शायर ने ठीक ही कहा है .यह सच है कि बचपन मासूमियत अल्हड़ता और बेफिक्री का दूसरा नाम है .मित्रों आप सब को इस बाल दिवस पर मासूमियत की तरफ लौट जाने की बहुत बहुत शुभकामना .
फिर भी विचारणीय बात यह भी कि यह बेफिक्री कितनी ?? क्या इसकी सीमा तय करना अनिवार्य होगा ?? यह प्रश्न आज बेहद प्रासंगिक हो गया है .टी वी पर प्रद्युम्न ह्त्या के केस से जुडी सी बी आई जांच का खुलासा देखा .ग्यारहवीं के छात्र ने सिर्फ इस लिए इस ह्त्या को अंजाम दिया क्योंकि वह अभिभावक शिक्षक मीटिंग और परीक्षा को टलवाना चाहता था .वह पियानो क्लास भी जाता था .उसे एग्जाम फ़ोबिआ था .उसने यह भी स्वीकार किया कि घर पर माता पिता के बीच झगड़े की वजह से वह पढ़ाई में ध्यान नहीं दे पाता था . परीक्षा और पी टी एम् को टलवाने के लिए एक जान के खून से खेल जाना पूरे शिक्षित समाज को झकझोर कर तेजी से एकल परिवार में तब्दील होते समाज , बच्चों की परवरिश , शिक्षा की रूप रेखा जैसे कई विषयों को सवालों के कटघरे में खड़ा कर गया . कहा जा रहा है की इन दो महीनों के दौरान इस छात्र में कोई असामान्य व्यवहार नहीं देखा गया .उसके माता पिता तक उस लडके के व्यवहार में कोई बदलाव समझ नहीं पाए .वह सामान्य ढंग से ज़िंदगी जी रहा था . यह सम्पूर्ण समाज के लिए बहुत ही संवेदनशील मुद्दा है .आज से नहीं बल्कि कई सदियों से शिक्षा और उससे जुडी नियत समय पर होने वाली परीक्षा बच्चों के सामाजिक विकास का अंग रही है.विद्यालय के अनुशासन का अपना मह्त्व है .उसे दरकिनार कर ऐसा जघन्य कदम उठाना किसी भी सभ्य समाज के लिए कलंक है . दोस्तों यहां एक बात का ज़िक्र अवश्य करना चाहूंगी .मेरी पुत्री जो मेडिकल सेकंड ईयर की छात्रा है ने जब पहली बार डेड बॉडी (cadaver) काटा था तब दुःख से रो पडी थी  कि क्या मनुष्य जीवन का असली अर्थ यह है .कई अभ्यास के बाद वह इसे अपने अध्य्यन का हिस्सा समझ सकी .क्या हम अपने बच्चों में संवेदनशीलता को ताउम्र ज़िंदा नहीं रख सकते ??
बशीर बद्र साहब की पंक्तियाँ याद आती हैं ..
उड़ने दो परिंदों को अभी शोख हवा में
फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते .
यह बच्चों की आज़ादी के मह्त्व को बयान करता एक खूबसूरत शेर है .पर सवाल यही कि उड़ान कब कैसी कितनी क्यों और कहाँ तक ???
कुछ दिनों पूर्व एक परिचित के यहां जाना हुआ.सुशिक्षित मध्यम परिवार के अभिभावक ने हमें गेस्ट रूम में सादर बिठाया जैसाकि अमूमन हर घर में होता है.घर की सामान्य साज सज्जा में कोई कमी ना थी पर ध्यान बरबस ही दीवारों पर अटक गया .इसलिए नहीं कि वे असिअन पेंट्स या नेरोलक के खूबसूरत रंग से सजी थीं .बल्कि बहुत ही बेतरतीब ढंग से खींची गई रंग बिरंगी आड़ी तिरछी रेखाएं पूरे दीवार को बदरंग कर गई थीं .सोफे के सामने की दीवार ..पीछे की… दाएं की… बाएं की दीवार .बस छत नहीं क्योंकि वहां तक बच्चे के हाथ नहीं पहुंचते और फर्श पर नहीं या हाँ भी…सफाई की वजह से रोज़ साफ़ हो जाते होंगे .इस दृश्य से मुझे दो ढंग से सोचने का अवसर दिया .चूँकि पिछले छह सात वर्षों से मेरी एकमात्र संतान शिक्षा के लिए घर से दूर है और घर हर वक़्त सजा सँवरा व्यवस्थित ही रहता है जो कि उसकी उपस्थिति में थोड़ा कम रहता था .फिर भी मुझे वो बिखरा सा घर अच्छा लगता था.अतः एकबारगी मैं दीवार देख कर मासूमियत शरारत और कुछ बेतरतीब से सृजन के साक्षात्कार पर बहुत संतुष्ट हुई.बच्चों की माँ ने भी स्वीकार किया कि ठीक है बड़े हो जाएंगे तो स्वयं ही यह सब करना छोड़ देंगे जैसा कि बड़े बेटे ने जो कि अब कक्षा सात में है छोड़ दिया है .
अब मेरे मस्तिष्क में कई बातें एक साथ आईं .क्या ऐसे ही बच्चे किसी पर्यटन स्थल किसी ऐतिहासिक धरोहरों पर लिख कर उन की दीवारों को गंदा करते होंगे क्योंकि उन्हें दीवारों पर नहीं लिखने की हिदायत और अनुशाषण कभी नहीं सिखाया गया ?? क्या बच्चे के लिए एक सफ़ेद या स्याम बोर्ड घर पर ही कहीं रख कर उस पर लिखने का अनुशाषण विकसित नहीं किया जा सकता ??
दोस्तों ,मूल प्रश्न यही है कि अनुशाषण की सीमा क्या हो .अत्यधिक अनुशाषण से बच्चों की सहजता छीन जाने का डर होता है . लम्बे लम्बे खींचे चहरे,आँखों में शुष्कता ,क्रोध और क्षोभ से भींचे होठों ने कब गोल मटोल खिलखिलाते चमकते बचपन का स्थान ले लिया एहसास तक नहीं हुआ .कागज़ की कश्ती से खेलने वाले किशोर खंजर से खूनी खेल कब खेलने लगे पता ही नहीं चला .क्या बचपन के प्रति बड़े इतने बेफिक्र हो गए हैं .इतने लापरवाह ??क्या कभी अचानक से चुपचाप होते बच्चों की खामोशी की वजह जानने की बड़ों ने कोई कोशिश की .चुपचाप मोबाइल चलाते बच्चों के अंदर कितना शोर उमड़ रहा है क्या वह बड़ों ने सुना ??
जैसा कि शायर आदिल मंसूरी कहते हैं…
चुपचाप बैठे रहते हैं कुछ बोलते नहीं
बच्चे बिगड़ गए हैं बहुत देखभाल से .
मारना पीटना अपमानित करना सजा देना यह अनुशाषण तो कभी स्वीकार्य नहीं पर बच्चों के साथ बच्चे बन कर उनकी रूचियों का सम्मान करते हुए व्यवस्थित ढंग से रहने की शिक्षा खेल खेल में दे देना बहुत आवश्यक है .
किसी ने ठीक कहा है
किसने कहा नहीं आती वो बचपन वाली बारिश
तुम भूल गए हो शायद अब नाव बनानी कागज़ की .
गौर करने वाली बात यह है कि बचपन और किशोरावस्था दोनों ही खतरे में ना पड़े .शोध से यह बात प्रमाणित हो चुकी है कि व्यक्तित्व का विकास प्रथम बीस वर्ष में ही हो जाता है .शेष वर्ष बस इन्ही बीस वर्षों का प्रतिबिम्ब होते हैं .चाहे कुछ भी जोड़ दो या घटा दो पर मूल प्रवृत्ति इन्ही बीस वर्षों में आकार ले लेती है.अतः प्रत्येक अभिभावक को बहुत सजग रहने की ज़रुरत है.बच्चों के दोस्त कौन है ,बच्चा कहाँ जाता है ,क्या करता है ,इतनी जानकारी रखनी ही होगी .आज तकनीक ने बच्चों को माता पिता से अधिक जानने के स्त्रोत भले ही दे दिए हों पर ज़िंदगी की शिक्षा सिर्फ अनुभव से ही मिलते हैं जो हर युग में अभिभावकों और बड़ों ने ही दिया है .बड़ों को अपने व्यवहार में बहुत परिपक्वता और संवेदनशीलता लानी होगी .ताकि बचपन भयमुक्त रहे .वह आदर करे …भय नहीं .कोई बच्चा यह ना कहे कि मैं बड़ा होना नहीं चाहता .
क्या दर्द बयान किया है किसी ने …
खुदा अब के जो कहानी लिखना
बचपन में ही मर जाऊं ऐसी ज़िंदगानी लिखना .
आज अभी अभी पढ़ा … चाकू से फिंगर प्रिंट मिटाने के लिए आरोपी छात्र ने इंटरनेट में कई उपाय भी सर्च किये थे .यह पूरी घटना तेजी से तकनीक के इस्तेमाल के युग में बहुत सजगता से परवरिश पर जोर देती है .नन्हे से बच्चे के गिर जाने पर जमीन कुर्सी टेबल या किसी भी निर्जीव चीज़ जिसने उस बच्चे को चोट पहुंचाई है को मारने की सलाह देना ,विद्यालय में किसी से मार खा कर आने के बाद दूसरे दिन उसे चोट पहुंचाने की सलाह देना इस तकनीक युग में और भी घातक हो सकता है .पूरे दुनिया उनके पास मात्रा एक क्लिक पर अपने हर अच्छे बुरे रूप में उपलब्ध है . पर अच्छे को स्वीकार कर बेहतर और महान बनाना बुरे को दरकिनार रख कर व्यक्तित्व की उज्जवलता बरकरार रखना यह बड़ों के मार्ग दर्शन से ही संभव है .बचपन को ज़िंदा रखना होगा पर संतुलित सकारात्मक अनुशाषण के साथ .ताकि कोई असामाजिक तत्व कोई भी अवांछनीय भावना वक़्त से पूर्व बच्चों को काल कवलित ना कर सके .

कंचे, कश्तियाँ ,कहानी की किताबों आओ फिर गलियों में सज जाओ
तकनीक की अंधी गलियों से आज सिसकते बचपन ने आवाज़ दी है .



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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

November 16, 2017

बहुत सुन्दर बात कही है यमुना जी

    yamunapathak के द्वारा
    November 20, 2017

    आपका बहुत बहुत आभार शालिनी जी

Shobha के द्वारा
November 12, 2017

प्रिय यमुना जी सोच में डालता लेख सारांश में या दर्द बयान किया है किसी ने … खुदा अब के जो कहानी लिखना बचपन में ही मर जाऊं ऐसी ज़िंदगानी लिखना बचपन से अच्छी कोइ अवस्था नहीं है आजकल बच्चों की हर ख्वाहिश पूरी कर लोग बच्चों को जिद्दी बना रहे हैं .

    yamunapathak के द्वारा
    November 13, 2017

    आदरणीया शोभा जी सच है बचपन आज बहुत खतरेमें है . ब्लॉग पर आने का आपका बहुत बहुत आभार

jlsingh के द्वारा
November 12, 2017

गंभीर सवाल उठता आपका आलेख आदरणीया… शायद किसी का भला हो जाय!

    yamunapathak के द्वारा
    November 13, 2017

    आदरणीय जवाहर जी सादर नमस्कार सच में यह घटना बेहद व्यथित कर गई . साभार


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