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काश यह आवाज़ मुझे कभी दिखाई ना दे !

Posted On: 7 May, 2017 मेट्रो लाइफ में

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सा रे गा मा …की सरगम ..कभी किसी फ़िल्मी संगीत की धुन ..कभी कोई ऐसी धुन जिसके शब्दों की श्रृंखला तो दूर एक वर्ण का भी अनुमान लगाना बेहद मुश्किल… पर मन को तो अनुमान लगाने की आदत है …’ये धुन कन्नड़ भाषा के किसी गीत की होगी..नहीं मलयालम या फिर तेलुगु की ….और इस अनुमान में भोर की कॉफ़ी कब केतली से कप पर अधिकार जमा चुकी होती है पता ही नहीं चलता .गीत कोई भी हो पर धुन इतनी प्यारी होती है कि कॉफ़ी के स्वाद को ज़हीन बना देती है.ऐसी ज़हीन जिसका ज़िक्र भी बड़ी से बड़ी कॉफ़ी कंपनी ने अपने विज्ञापन में आज तक नहीं किया है .कभी कभी राष्ट्र गान की धुन बज उठती है ….और मैं किसी के ना देखे जाने पर भी बिलकुल सावधान की मुद्रा में खड़ी हो जाती हूँ .यह बचपन से राष्ट्र गान के प्रति भरा गया सम्मान भाव का अमिट प्रभाव होता है या बांसुरी की मधुर ध्वनि का सम्मोहन !! शायद दोनों का ही प्रभाव होता है तभी तो धुन खत्म होने के बाद भी शून्य में कुछ पलों तक मुझे अपने वतन का तिरंगा फहरता सा दिखाई देता रहता है .
एक से डेढ़ घंटे की रियाज़ वाली वंशी की यह धुन जब बंद हो जाती है तो सच कहूँ तो ना शिकायत होती है कि यह धुन बंद क्यों हो गई …और ना ही कोई गहरी ख्वाहिश जगती है कि काश !! यह और देर तक सुनाई देती .भाव उमड़ता है तो बस …एक गहन संतुष्टि का …कृतज्ञता का …उस वंशी के लिए जो अनजाने ही अपनी मधुर धुन से मेरे प्रत्येक दिन की शुरुआत में मिठास घोल देती है .एक मस्त बात बताऊँ अब तो मैंने कॉफ़ी में शक्कर लेना भी छोड़ दिया है .कड़क से कड़क कॉफ़ी की तिक्तता भी नए स्वाद की ताज़गी से तृप्त कर देती है.
कभी भी यह उत्सुकता ही नहीं होती कि कौन है जो बंशी बजा रहा है …ना उसके उम्र की …ना लिंग की ..ना जाति की ..न भाषा की …न राज्य या प्रदेश की ..ना ही उसके सामाजिक पद प्रतिष्ठा की …ना ही कोई ललक कि आठ मंज़िलों वाले इस अपार्टमेंट के पहली मंज़िल से हर मंज़िल की सीढ़ियां चढ़ कर आवाज़ की दिशा में भागूं और धुन तक पहुँच जाऊं .वह जो भी है मुझे इससे कोई सरोकार नहीं .ज़रूरी नहीं कि आँखें और दिल हर वक़्त एक सा प्रभाव ग्रहण करें .आवाज़ ही काफी है .अक्स का क्या करूँ .शायद यह पिछले कुछ वर्षों के दौरान जान पहचान वालों के विश्वासघात से उपजी नफरत या फिर पहचाने चेहरों के मुखौटों के पीछे छुपे विकराल रूप से उपजे डर का परिणाम है .
बस लगाव है तो बंशी की धुन से .उसमें छुपे संगीत को उभरने वाले वादक को अदृश्य ही रहना चाहिए …उसका साथ देने वाली हवा की तरह एकदम अदृश्य .सिर्फ धुन की ठंडक का एहसास चाहिए.यूँ भी ज़िंदगी में अनजान चीज़ों से डर नहीं लगता है .ज़िंदगी नन्हे बच्चे की तरह आग को छू लेने का साहस रखती है .सांप जहरीले कीड़े से खेलने का मौज़ पालती है .दिक्कत तो तब होती है जब आग, सांप ,जहरीले कीड़ों की भयावहता से पहचान हो जाती है .
झाड़ू पोंछा कपड़ा बर्तन रोज़मर्रा के काम एक घंटे के लिए विराम चाहते हैं.यह ट्रैफिक सिग्नल की लाल बत्ती की तरह थोपी गई रूकावट नहीं होती .यह बेहद कुदरती रूहानी ठहराव होती है …जैसे बारिश के बाद क्षितिज पर इंद्रधनुष थोड़ी देर तक रूक जाए ..सात रंग ; सात सुर ; मेरे सात दिनों को खुशनुमा बना देने के लिए .सुरों का ज्ञान ना होने पर भी जब बंशी की धुन थोड़ी सी भी भटकती है तो मेरे भीतर कुछ टूटने सा लगता है फिर स्वयं पर हंसी भी आती है . वाह यमुना ! सुरों का ज्ञान नहीं और सम्पूर्णता की ऐसी चाह !! कुछ ना कुछ अपूर्णता तो कुदरत भी अपने प्रत्येक सृजन में रख छोड़ती है .फिर यह धुन तो किसी अनदेखे अज़नबी मनुष्य के संगीत प्रेम से उपजा सृजन है इसकी अपूर्णता से इतनी कसक क्यों ??? और आँख और दिल ने कानों के साथ धोखा कर दिया तो ?? अपूर्णता कभी कभी खंड खंड में ही बेहद स्वीकार्य होती है .नहीं नहीं ..अक्स और आवाज़ को एकाकार करना उचित नहीं .
बंशी की यह धुन कण कण में मुझे पसंद है …मानो मालिन बिखरे फूलों को चुन चुन डलिया भरे …आकाश बादलों के मटके से बूँद बूँद बरस धरा को नम करे …नन्ही सी बच्ची की संचय प्रवृत्ति एक एक सिक्कों से पिग्गी बैंक भरे ..मधुमक्खी फूल फूल से रस लेकर मीठे शहद का छत्ता गढ़ दे ..कोई विलक्षण व्यक्तितव एक एक कदम से महानता का इतिहास रचे .
यह धुन ऐसी कि कोसों मीलों दूर बैठे रिश्तों की याद तो दिलाती ही है साथ ही काम पर गए हमसफ़र को भी करीब महसूस कराती रहती है.मानो शाम को घर आने वाला सुबह का भूला कभी हो ही नहीं सकता .बहुत उन्माद है …बहुत उत्साह है…बहुत कशिश है …बहुत तपिश है …इस वंशी की धुन में .

काश !! यह आवाज़ मुझे कभी दिखाई ना दे .



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
June 11, 2017

आदरणीय सद्गुरू जी सादर नमस्कार संगीत की धुन कुदरत से जोड़ती है .आपकी बात से सहमत हूँ.ब्लॉग पर आने का बहुत बहुत धन्यवाद . साभार

sadguruji के द्वारा
May 16, 2017

आदरणीय यमुना पाठक जी ! सादर अभिनन्दन और उत्कृष्ट लेखन के लिए हार्दिक बधाई ! आपने गहरी बात कह दी है कि बंशी की धुन से उभरने वाले छुपे संगीत को अदृश्य ही रहना चाहिए ! संगीतकार शायद इसलिए कहते हैं कि मनुष्य कि तरह संगीत की भी आत्मा होती है, जो दिखाई तो नहीं देती है, महसूस होती है ! सादर आभार !


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