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धूसर बादल ; सिंदूरी सूर्य

Posted On: 15 Feb, 2017 lifestyle में

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प्रिय साथियों
यमुना का प्यार भरा नमस्कार

शारीरिक मानसिक रूप से फिट रहना शौक है या आदत यह तय करना मुश्किल है .ऐसा इसलिए कह रही हूँ क्योंकि कई बार अक्सर महिलाओं को कहते सुना है “फिट रहना मेरा पहला शौक है ” और हाँ यह शौक हो या आदत पर एक बात हम सब सर्व सम्मति से कह सकते हैं कि फिट रहना बहुत अच्छी बात है .मेरे लिए यह एक आदत या यूँ कहिये दिनचर्या का हिस्सा है .सवेरे पांच बजे से सनातन चैनल पर सुन्दर काण्ड सुनने के साथ योग करना मुझे बहुत पसंद है और शाम को टहलने जाना भी बहुत अच्छा लगता है .अब आप पूछेंगे की टहलने में कोई संगी साथी भी है .सच बताऊँ बहुत प्यारा सा साथी है और वह है ” अस्ताचलगामी सूर्य ” प्रत्येक दिन मैं कुदरत के इस अनमोल साथी से कुछ ना कुछ ज़रूर सीखती हूँ .यूँ भी अस्त होता सूर्य ..नीड़ को वापस लौटते चहचहाते पंछी ..हवा के झोंके…और इन सबके बीच चूँकि हवाई अड्डा बहुत पास है अतः हवाई जहाज के उड़ने की गड़गड़ाहट … प्रकृति और मानव जनित सृजन का अनूठा संगम .मानो कुदरत ज़िंदगी से प्रेम बरकरार रखने का मधुर गीत सुना रही हो ….साज़ भी कुदरत ….आवाज़ भी कुदरत .

आज भी हमेशा की तरह सूर्य अस्त होने को था… पंछी वापस नीड को लौट रहे थे …ना तो सूर्य की रक्तिम आभा और ना ही पंछियों की चहचहाहट.. किसी में भी थकान का आभास तक ना था …थी तो बस अपने कार्य को, अपने किरदार को बखूभी निभाने की असीम संतुष्टि .अचानक बादल के एक धूसर से टुकड़े ने रक्तिम सूर्य की तरफ बढ़ना शुरू किया मानो वह सूर्य को निगल जाएगा .मेरे तेज बढ़ते कदम सहसा ही रूक गए .उस दृश्य को मैं कुदरत के दिए उपहार ‘मन मस्तिष्क आँखों ‘ के साथ साथ मानव जनित उपहार ‘ ‘मोबाइल’ में भी कैद करने को तैयार थी .बाकी लोग जो उस जगह टहल रहे थे वे अवाक थे .”ऐसा क्या है जो ये हर कोण से इस दृश्य को कैद करने पर तुली है ”

सच बताऊँ तो ..एक तरफ बादल..वे तो बेहद ज़िद्दी लग रहे थे और दूसरी तरफ … मासूम सा सूर्य अपने किरदार को सफलता पूर्वक अंजाम देने के दर्प की लालिमा से अभिभूत था .एक तरफ बादल के जंग की ज़िद तो दूसरी तरफ सूर्य के जीने का जूनून .दोस्तों ,यह ना तो क्रिकेट का कोई रोमांचकारी मैच था और ना ही ताश के पत्तों की कोई बाज़ी .फिर भी मन कौतुहल से भरा था …अब आगे क्या ?? बादल का रंग अब धूसर से थोड़ा स्याह होने लगा …सूर्य पूर्णतः ढक चुका था फिर भी बादल के किनारे सूर्य की सिंदूरी आभा से स्वयं को रंगने से बचा नहीं पाए … ऐसा लगा मानो धूसर से टेढ़े मेढ़े कपडे के टुकड़े के किनारे एक रक्तिम घनी जालीदार झालर लगा कर किसी कुशल दर्ज़ी ने टेढ़े मेढ़े कपडे को भी सौंदर्य दे कर अपने हुनर को साबित कर दिया हो .सूर्य को ढक लेने की बादल की यह कोशिश बहुत ही अल्प क्षणों की रही .धीरे धीरे सूर्य का मध्य भाग दिखाई देने लगा .अब तक मैं मोबाइल से पूरे दस तस्वीर ले चुकी थी .इस दृश्य में सब कुछ क्षणिक था पर मेरे ज़ेहन और मोबाइल दोनों में यह स्थाई हो चुका था .

प्रिय साथियों, जीवन में भी ऐसा ही होता है.कभी कभी आपके हमारे व्यक्तित्व की लालिमा को कुछ अवांछित सामाजिक तत्वों के धूसर रंग ढकने की कोशिश करते हैं …ढक भी लेते हैं पर यकीन करियेगा कि यह क्षणिक है क्योंकि ज़िंदगी जीने की गहनता जब आधात्मिकता का रसास्वादन कर लेती है तो फिर उससे जनित दर्प की सिंदूरी आभा किसी के भी धूसर या स्याह प्रयास से छुप नहीं सकती .

….अस्ताचलगामी सूर्य अब बादलों के कुप्रभाव से मुक्त हो आराम करने जा चुका था कल फिर उदित होने के लिए उसी सिंदूरी रक्तिम आभा के साथ जन जन को नई ऊर्जा नई चेतना देने के लिए उसे भी तनिक विश्राम की ज़रुरत होती है.फिर कभी धूसर स्याह बादल उसे घेर सकते हैं या अवश्य ही घेरेंगे उसे ढक लेंगे …नैनो सेकंड …सेकंड..मिनट…घंटों..दिनों तक के लिए भी … पर वे सूर्य की आभा और चमक को स्थाई रूप से कभी छीन नहीं सकते ….कुदरत इस बात की साक्षी है .

सन्देश …..

ज़िंदगी में कितनी भी बुरी और विपरीत परिस्थितियां आ जाएं …जीने का हौसला इसलिए नहीं छोडना चाहिए क्योंकि प्रत्येक परिस्थिति क्षणिक होती है .आत्मबोध और परिपक्वता ना केवल स्वयं को बल्कि अपने आस पास के लोगों को भी ज़िंदगी के प्रति कृतज्ञता और प्रेम से भर देती है .आइये ज़िंदगी हर हाल में जीएं …क्योंकि ईश्वर ने हमें कुछ किरदार निभाने के लिए बड़े ही शौक से चुना है .आइये खुश रहे और दुःख आ भी जाए तो मन को समझाएं कि यह ज़िंदगी का दूसरा पहलू है इसे भी जीना है .
ढलता सूरज भी गीत गाता है
गुनगुनाता है कुछ ग़ज़ल
बनाता है रिश्ता अटूट
कुदरत सच कहती है
हर शाम ने तराशा है सूरज को
अलहदा अंदाज़ में .

शुक्रिया …

उन सर्जक का जिसने मुझे भी कुछ किरदार निभाने का सौभाग्य दिया …यही प्रार्थना है कि मैं उन के चुनाव के साथ न्याय कर सकूं ..



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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
February 23, 2017

आदरणीया यमुना जी, आपका यह प्रस्तुतीकरण में जो कवित्त्व है, जो जीवन के प्रति नूतन ऊर्जा का सन्देश है, वह अन्यत्र दुर्लभ है. शब्दों के चयन के साथ साथ वाक्य विन्यास, जीने की आश और जीवन के रंग का अद्भुत संगम! बहुत बहुत बधाई आपको! आप इसी तरह जागरण मंच के अनुगृहीत करती रहें! सादर!

Shobha के द्वारा
February 18, 2017

प्रिय यमुना जी आपके लेख बहुत सुंदर लिखे होते हैं पढ़ने में आनन्द आता है ‘एक तरफ बादल के जंग की ज़िद तो दूसरी तरफ सूर्य के जीने का जूनून’ ऐसे ही खूबसूरत भाव आप लिखती है |

    yamunapathak के द्वारा
    February 19, 2017

    आदरणीय शोभा जी सादर नमस्कार आपकी प्रेरणा के लिए बहुत बहुत आभारी रहती हूँ .

sinsera के द्वारा
February 18, 2017

प्रिय यमुना जी, काफी दिनों के बाद आपकी लेखनी में सराबोर होने का मौका मिला . वैसे मैं जेजे पर आऊं और आपका चित्र देख कर क्लिक न करूँ, ये हो नहीं सकता. कुछ नया सन्देश पाने की उम्मीद होती है. ये रचना भी एक सुन्दर सन्देश ले कर आयी है. ऐसे ही लिखती रहिये..

    yamunapathak के द्वारा
    February 19, 2017

    प्रिय सरिता जी नमस्कार आप इस अनुपम मंच पर बहुत दिनों बाद आईं .आपकी सुन्दर प्रेरणा के लिए बहुत बहुत धन्यवाद . साभार

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
February 17, 2017

निर्मल सुगम यमुना प्रवाह.. अस्ताचलगामी सूर्य अब बादलों के कुप्रभाव से मुक्त हो आराम करने जा चुका था कल फिर उदित होने के लिए उसी सिंदूरी रक्तिम आभा के साथ जन जन को नई ऊर्जा नई चेतना देने के लिए ….ओम सूर्याय नमः  ओम शांति शांति 

    yamunapathak के द्वारा
    February 19, 2017

    आदरणीय हरिश्चन्द्र जी ब्लॉग पर आने और सुन्दर प्रतिक्रिया से प्रेरित करने के लिए बहुत बहुत आभार .




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