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....इज़ नो मोर

Posted On: 8 Dec, 2016 कविता,lifestyle में

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1)
….इज़ नो मोर

…इज़ नो मोर
क्या
है अर्थ इसका
एक औपचारिक घोषणा
अस्तित्व हीन होने की ।
जबकि सच तो यह है कि
हम रोज ही मरते हैं
थोड़ा थोड़ा … किश्तों मेें
अपनी टिकठी बनाते हैं
अपने जनाजे उठाते हैं
अकेले …. तनहाई मेें
खुद पर ही आंसू बहाते हैं
और अगले ही पल
तैयार हो जाते हैं
नई जिंदगी के लिए
एक बार फिर
मौत की साक्षी बनने को
चलता रहता है सिलसिला
जब तक कि क्लाइमेक्स
न आ जाए
…इज़ नो मोर की
टैग लाईन के साथ ।

2)
तलाश

हर जवाब अधूरा है
क्योंकि
हर सवाल अधूरा है
इसलिए
तलाश सम्पूर्णता की
अब तक जारी है ।

3)
चाय का कप और अखबार के पेज

रिश्ता
सुबह की चाय
और
अखबार के पेज
के
बीच
कम्बख्त….
समझ ही नहीं आता
चाय की चुस्की ने
खबर को सुडक लिया
या…
खबर के गर्म मिज़ाज़ ने
चाय की कड़क बढ़ा दी
जिस भयावह हक़ीक़त को
रात स्वप्न का कफ़न था दिया
मुई चाय और अख़बार ने
सुबह उसे जीवन सा दिया

ये एक कप चाय
और
अखबार के कुछ पेज
दस्तक क्यों देते है
रोज़ सुबह के दरवाज़े पर ??

4)
लेखन … डायरी से डिजिटल तक

लेखन
सुबह की चाय
और अखबार की मानिंद
फकत तलब की बात नहीें
यह तो जज्बाती ऐलान है
जैसे …
सूरज मेें किरण
सांस मेें जीवन
फूल मेें सुगंध
दिल मेें धड़कन ।

5)
साम्य

लेखक
लिखता है
या
दीपक
सा
जलता है
लिखने और जलने मेें
एक ही साम्य है
दोनों मिट जाते हैं
अंततः
अंधकार डटा रहता है ।

यमुना



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11 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
December 21, 2016

आदरणीय संचालक महोदय जी सादर नमस्कार और बहुत बहुत धन्यवाद् आदरणीय बिष्ट जी ,सद्गुरु जी ,जवाहर जी और आदरणीय आशा जी सादर नमस्कार आप सबों को अतिशय धन्यवाद् .आदरणीय संचालक महोदय जी और टीम के द्वारा होम पेज में कुछ तबदीली की गई है.पर सच बताऊँ वो गुलाबी फ्रेम में सापताहिक सम्मान के रूप में पब्लिश होना बहुत अच्छा लगता था . बहुत दिनों से manch के गरिमा और स्तर के अनुकूल कुछ भी लिख नहीं पा रही थी .आप सब को यह laghu sankalan अच्छा लगा बहुत आभारी हूँ . saabhaar

ashasahay के द्वारा
December 19, 2016

इस काव्यरूप मे विषयों अतिसुन्दर अभिव्यक्ति।अब यही जीवन यथार्थ है ।यमुना जी,- बधाई, साप्ताहिक सम्मान के लिए।

sadguruji के द्वारा
December 19, 2016

आदरणीया यमुना पाठक जी ! सादर अभिनन्दन और ‘बेस्ट ब्लॉगर आफ दी वीक’ चुने जाने पर हार्दिक बधाई ! सभी कवितायेँ अति सुन्दर और पठनीय हैं ! ‘साम्य’ कविता में आपने लिखा है- “लिखने और जलने मेें एक ही साम्य है दोनों मिट जाते हैं अंततः अंधकार डटा रहता है” आपने सही लिखा है, लेकिन मुझे लगता है कि देश की 80 से 90 प्रतिशत जनता के दिलों तक अभी भी साहित्यिक दिए की पहुँच ही नहीं है ! इलेक्ट्रानिक मंचों पर ज्यादा पाठक नहीं हैं ! कुछ बुद्धिजीवी आपस में मिलकर एक दूसरे की रचना पढ़ लेते हैं और शाबाशी दे देते हैं ! सादर आभार !

jlsingh के द्वारा
December 16, 2016

सीप में मोती की तरह आप चमकती रहें, यही कामना है. साप्ताहिक सम्मान के लिए बधाई बधाई बधाई!

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
December 16, 2016

आदरणीय यमुना जी साप्ताहिक सम्मान के लिए मेरी बधाई स्वीकार करें । वाकई जीवन के यथार्थ को बहुत सुंदर और प्रभावी तरीके से आपने कविता के माध्यम से अभिव्यक्त किया है । ऐसी स्तरीय कविताएं बहुत कम पढने को मिलती हैं । हार्दिक बधाई ।

DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
December 11, 2016

यमुना जी बहुत समय बाद आपके लेखन से रूबरू हुई हूँ .हमेशा की तरह गहन व् सार्थक अभिव्यक्तियाँ .आभार

    yamunapathak के द्वारा
    December 14, 2016

    प्रिय SHIKHA JEE MAIN BAHUT DINON BAAD LIKH पाई हूँ .साइट में कुछ तकनीक प्रॉब्लम भी है .आपकी प्रेरणा के LIYE BAHUT BAHUT AABHAR

Shobha के द्वारा
December 10, 2016

प्रिय यमुना जी काफी समय बाद आपके विचार पढने को मिले लेखन सुबह की चाय और अखबार की मानिंद फकत तलब की बात नहीें यह तो जज्बाती ऐलान है सही है यही से हमारी दिनचर्या शुरू होती है सभी अति सुंदर

    yamunapathak के द्वारा
    December 14, 2016

    aadarneeya shobha jee sadar namaskar kuchh maheenon se naheen likh pa rahee thee .aapkee sundar pratikriya ke liye bahut bahut aabhar

jlsingh के द्वारा
December 8, 2016

आदरणीय यमुना जी, सादर अभिवादन! काफी दिनों बाद आपका अवतरण हुआ. मेरी प्रतिक्रिया- १.जबकि सच तो यह है कि हम रोज ही मरते हैं थोड़ा थोड़ा … किश्तों मेें – सच्ची बात! २.तलाश जारी रहनी चाहिए ३. जिस भयावह हक़ीक़त को रात स्वप्न का कफ़न था दिया मुई चाय और अख़बार ने सुबह उसे जीवन सा दिया ये एक कप चाय और अखबार के कुछ पेज– मार्मिक! 4.सुबह की चाय और अखबार की मानिंद फकत तलब की बात नहीें यह तो जज्बाती ऐलान है- बहुत ही बेहतरीन ! 5. लिखने और जलने मेें एक ही साम्य है दोनों मिट जाते हैं अंततः अंधकार डटा रहता है ।- दिवा रात्रि का चक्र चलता ही रहेगा. सादर! अनूठी रचनाओं के लिए अभिनन्दन !

    yamunapathak के द्वारा
    December 14, 2016

    आदरणीय जवाहर जी सादर नमस्कार aapkee pratyek bhav पर दी गई प्रतिक्रिया बहुत अच्छी lagee.इस प्रेरणा के लिए बहुत बहुत आभार .हमारे इस पसंदीदा मंच पर कुछ तकनीक वजह से भी dikkat aa rahee hai . sabhar


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