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आफलाइन से बेहतर आनलाइन होली

Posted On 23 Mar, 2016 कविता में

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1) आफलाइन से बेहतर आनलाइन होली

आनलाईन होली की धूम है
आफलाइन कुछ कहीं गुम है
एक तरफ मोहब्बत की बोली है
दूसरी ओर नफरत की गोली है .

एक तरफ रंगे इश्क भीग रहा
तो कहीं लहजे अश्क खीझ रहा
एक तरफ गजब शोर शराबा है
दूसरी ओर अजब खून खराबा है .

आनलाइन संदेशे की भरमार है
तो आफलाइन अहम की मार है
एक पर इन्द्रधनुष उग आया है
दूजे पर लहू मासूम बह आया है.

जो रंग चाहो वह रंग तुम उछाल दो
थोड़ी इंसानियत की भी पर गुलाल हो
आफलाइन से बेहतर आनलाइन होली है
पर हम कहे कैसे “बुरा न मानो होली है. “


(ब्रुसेल्स की आतंकी घटना से क्षोभ है .)

2)” बुरा न मानो होली है ”

होली एक दिन क्यों रोज ही मैं खेलती
रंगों में सराबोर मदहोश रोज हूँ डोलती
बहकते न कदम हैं भावों को भी शरम है
रंगों में भीगा जबकि हर गांव औ शहर है .

अलसुबह सूर्य की सिंदूरी लहक
कदम तले शीत हरे तृण की दमक
दूर तक फैले नीले नभ की चमक
रंगीन तितलियों संग फूल की महक
खेतों की हरियाली और वासंती लचक
महकती माटी की सोंधी मटमैली महक
सुरमई सांझ की प्यारी सी धूसर धमक
और अंत में काली रात की स्याह सहन

कौन है जो मल देता सारे रंग मेरे चेहरे पर
बिठा रखे हैं सिपहसलार हुस्न ने पहरे पर
उषा से निशा तक मुझे रंगती और हंसती है
‘बुरा न मानो होली है ‘ कुदरत यह कहती है ।

मुना



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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
March 24, 2016

कौन है जो मल देता सारे रंग मेरे चेहरे पर बिठा रखे हैं सिपहसलार हुस्न ने पहरे पर उषा से निशा तक मुझे रंगती और हंसती है ‘बुरा न मानो होली है ‘ कुदरत यह कहती है । होली की हार्दिक शुबकामनाएं! अच्छा कितना लगता जब आप मेरे घर आएं!…सादर आदरणीया!

    yamunapathak के द्वारा
    March 26, 2016

    आदरणीय जवाहरजी इन दिनों लिखना काम हो प रहा है.आप से और आपके परिवार के प्रिय सदस्यों से मिलने मैं अवश्य आउंगी .आपका बहुत बहुत आभार .

Shobha के द्वारा
March 24, 2016

प्रिय यमुना जी भुत सुंदर लिखती हैं ” आप एक तरफ गजब शोर शराबा है दूसरी ओर अजब खून खराबा है .” अलग ढंग से आपने उतसव की ख़ुशी और आतंक के क्रंदन को दिखाया है

    yamunapathak के द्वारा
    March 26, 2016

    आदरणीय शोभा जी सादर नमस्कार आपकी टिप्पणी बहुत प्रेरणा देती हैं.आपका बहुत बहुत आभार .

sadguruji के द्वारा
March 24, 2016

आदरणीया यमुना पाठक जी ! सादर अभिनन्दन ! दो ब्लॉग में आपने कुदरत की समष्टिगत भाव वाली व्यवस्थित होली का बहुत सुन्दर वर्णन किया है ! इसके लिए आपका अभिनन्दन ! मनुष्यों के द्वारा खेली जाने होली व्यक्तिगत भाव वाली और अव्यवस्थित होती है, इसलिए अपूर्ण और बहुत हदतक खतरनाक भी होती है ! ! होली की आपको बहुत बहुत बधाई !

    yamunapathak के द्वारा
    March 26, 2016

    आदरणीय सद्गुरू जी सादर नमस्कार होली के अर्थ आज बहुत बदल गए हैं .आपकी टिप्पणी के लिए बहुत बहुत आभार .


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