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रंगों का हो जहां भुलावा (लघु कथा )

Posted On 19 Mar, 2016 Junction Forum, मेट्रो लाइफ में

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“माँ, रंगों से क्यों खेलते हैं ?”सुमन के गोद में सर रख कर सुशांत ने पूछा .”क्योंकि कुदरत रंगों से भरी है…पत्तियों का हरा रंग ,सरसों के खेत में फैला पीला रंग ..आसमान का नीला रंग …रात की कालिमा..सूरज की रक्तिमा …बेहद व्यवस्थित और संतुलित रूप से कुदरत के कैनवास में बिखरे हैं.” सुमन ने ज़वाब दिया ..

“जब कुदरत में रंग इतने व्यवस्थित हैं तो फिर होली के रंग इतने अव्यवस्थित क्यों ?” वह अनमना सा हो रहा था .सुमन ने उसके बालों में प्यार से उंगलियां फेरते हुए कहा ,”कभी कभी व्यवस्थित चीज़ों के बीच अव्यवस्था बहुत अच्छी लगती है.बचपन में तुम अपने खिलौने ,कपडे यहां वहां रख देते थे…सोफे का कुशन बिस्तर पर ..बिस्तर के तकिये शो केस के ऊपर …अब जब तुम परदेश चले जाते हो घर बहुत व्यवस्थित रहता है पर उस अव्यवस्था को मैं अवश्य जीती हूँ .कुदरत के व्यवस्थित रंगों के बीच होली के रंगों की अव्यवस्था की तरह तुम्हारे बचपन की बेतरतीबी के भुलावे को जीना बहुत भला लगता है..

सुमन सोच रही थी क्या सुशांत जैसे कई युवा इस अव्यवस्था के रंग के महत्व को समझ सकेंगे.!!!!

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
March 24, 2016

कुदरत के व्यवस्थित रंगों के बीच होली के रंगों की अव्यवस्था की तरह तुम्हारे बचपन की बेतरतीबी के भुलावे को जीना बहुत भला लगता है….. वाह वाह! क्या ट्रक दिया हैा आपने होली की बेतरतीबी का …अच्छा लगता है.

    yamunapathak के द्वारा
    March 26, 2016

    आदरणीय जवाहर जी आपका BAHUT बहुत आभार


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