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त्रिवेणी

Posted On: 6 Mar, 2016 social issues में

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1)

कितना शोर है शहर में पर ये बेदम सी आवाज है
अंतर्मन की खामोशी सुनने का साहस न समय है

खामोश पहाड़ों खाली घरों में ही प्रतिध्वनि गूंजती है ।

2) एक वक्त था काम कर शरीर से नमक बहता था
बंद कमरों के ए सी ने उपहार में मधुमेह दे दिया

सभ्यता और विकास के नाम पर वक्त ने करवट ली है ।

3)

जिंदगी हवाई जहाज सी न उड़े
जिंदगी हाथ रिक्शा सी न चले

गति और मति दोनों में संतुलन तो चाहिए ।

4)

मुझसे छीन लिया तुम ने मासूम इंसानियत
सपनों को तार तार करने की रही बदनीयत


भीतर बसे बच्चे को कैसे मार पाओगे तुम ?

5)

बात राई सी थी तुम ने तो पहाड़ बना दिया

रो रो कर इन आँखों को समंदर बना दिया


‘पहाड़ चलता नहीं समंदर सूखता नहीं’ यह खबर नहीं ?


6) सत्यम शिवम सुन्दरम का अर्थ था मुझे पता
सत्यमेव जयते कहते सुनते अब प्रौढ हो गया


आदर्श.. सत्य या यथार्थ यही समझ नहीं सका ।

यमुना पाठक

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Madan Mohan saxena के द्वारा
March 9, 2016

अच्छी रचना बधाई स्वीकारें कभी इधर भी पधारें और अपने बिचारों से हमें भी अबगत कराएं

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
March 9, 2016

यमुना पाठक जी बहुत अच्छी दार्शनिक भाव से लिखी कविता । सच कहा आपने………… मुझसे छीन लिया तुम ने मासूम इंसानियत सपनों को तार तार करने की रही बदनीयत भीतर बसे बच्चे को कैसे मार पाओगे तुम ?

Shobha के द्वारा
March 8, 2016

प्रिय बीना जी लिखा मैने वीना जी था पता नहीं आपका नाम ही बदल गया क्षमा करें

Shobha के द्वारा
March 8, 2016

प्रिय यमिना जी बहुत सुंदर विचार लेकिन यह पंक्ति दिल को छु गयी “अंतर्मन की खामोशी सुनने का साहस न समय है”आगे बात राई सी थी तुम ने तो पहाड़ बना दिया रो रो कर इन आँखों को समंदर बना दियायही आज कल हाल है आपका सन्दर्भ बदल रही हूँ आज के राजनेता मुद्दे खोज रहे हैं संसद में जरा सी बात पर बहस कर रहे हैं

jlsingh के द्वारा
March 8, 2016

बहुत ही सुन्दर गूढ़ त्रिवेणियाँ जिसे बार-बार पढने का जी चाहे! समझ ही तो नहीं पाते, समझ भी गए तो अनुकरण नहीं कर पाते. ऊहापोह जी जिंदगी. अभिनंदन! आदरणीया यमुना जी!

    yamunapathak के द्वारा
    March 9, 2016

    आपका बहुत बहुत आभार जवाहर जी


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