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सुनो कैकेई ! अब राम वन न जाएंगे

Posted On: 8 Jan, 2016 Others,social issues,Junction Forum में

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फिर वही कोप भवन,,कैकेई का रूठना…दशरथ का मनाना..
ओह !!!! त्रेता युग में कैकेई की विवेकहीनता के घने अँधेरे के ऐसे साये का प्रभाव १४ वर्ष तक रहने वाला है और राजा दशरथ के जीवन दीप का लौ तो सदा के लिए बुझ कर इस अँधेरे का साथ निभाने वाला है …यह तो स्वयं राजा दशरथ ने भी ना सोचा था .क्षत्रिय धर्म निभाने की आकुलता राज धर्म निभाने पर कितनी भारी पड़ गई थी .सच है सुन्दर से सुन्दर स्त्री भी अगर विवेकहीन हो जाए तो दिव्य से दिव्य पुरूष भी उस साये में अपनी दिव्यता खो देता है. लगता है पुनः एक बार मंथरा की जीत निश्चित है. ..नहीं…नहीं …ऐसा अब ना होगा !!! वर्त्तमान युग की सीता ने चिंतामग्न हो त्रेता युग को याद किया …नहीं इस बार वह सजग है.कैकेई आज भी उतनी ही विवेकहीन है . जितनी त्रेता युग में थी…..रानी होकर भी उसे राजधर्म और परिवार कल्याण दोनों का ही तनिक भी बोध न था.
आज भी उसमें तनिक भी परिवर्तन नहीं आया है.

वर्त्तमान युग की सीता को मंथरा पर क्षोभ कम है वह जानती है मंथरा अपने बुद्धि स्तर को ऊंचा कर ही नहीं सकती तभी तो वह मंथरा है.पर कैकेई हर बार विवेकशून्य क्यों हो जाती है ?? उसे अपनी पद प्रतिष्ठा का सही भान क्यों नहीं हो पाता ? वह मंथरा के भड़काने पर भी अन्य रानियों कौशल्या सुमित्रा से विचार विमर्श क्यों नहीं करती ?यह सोचते सोचते आज की सीता ने अपने दुःख को कौशल्या सुमित्रा से साझा करने का निश्चय किया .वे दोनों ही विवेकी स्त्रियां हैं .उन्होंने आज के दशरथ को निर्णय सुना दिया “राजा आप क्षत्रिय धर्म निभाओ..अपना दिया गया वचन पूरा करो …हम परिवार और समाज धर्म निभाएंगी …हम परिवार के बेटे बहू को वनवास न जाने देंगी “

दशरथ विवश हैं……राम नारी शक्ति के समक्ष हार रहे हैं……और कैकेई वह क्या करे …यहां तो एक से भले दो को साबित करती दो विवेकी स्त्रियां संगठित हैं……और संग सीता की विवेकपूर्ण सूझबूझ …इस त्रिवेणी का प्रवाह इतना तेज कि नया रामायण रच गया…….दिमागी ताकत विवेक और सूझ बूझ से दिल हार गया .
अब कैकेई कभी कोप भवन न जाएगी…सीता सुसंस्कृत है …अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति पूर्णतः सजग ..उसकी   विलक्षणता का एहसास कैकेई को हो गया.आखिर वर्त्तमान अयोध्या भी चौदह वर्षों के लिए भी रामराज्य से महरूम क्यों रहे .

सन्देश :

एक शक्ति होती है तलवार की …उससे भी ज्यादा शक्तिशाली है कलम की ताकत …और इन दोनों से बड़ी ताकत होती है स्त्री /नारी के विवेक की ताकत जो समाज को सुन्दर बना देती है.अगर घर समाज देश की नारियां अपने विवेक का प्रयोग करें तो कोई मंथरा कभी उसे भड़का ही ना सकेगी और किसी राम को वनवास जाना न पडेगा ….कोई दशरथ असमय मृत्यु को प्राप्त न होंगे .आप कह सकते हैं “फिर रावण कैसे मारा जाएगा ?? ”
रावण यूँ भी किसी ना किसी के द्वारा और नहीं तो अपने अहंकार के वज़ह से मारा ही जाएगा इसके लिए हर बार राम वनवास क्यों जाएं ??

आओ नारियों !! करें स्वागत
नव वर्ष के इस नव गीत का
विवेकी और बुद्धिमती बन के
निभाएं कर्त्तव्य नव रीत का .

-यमुना पाठक



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

harirawat के द्वारा
January 10, 2016

यमुना पाठक जी नमस्ते ! नए साल की बहुत सारी शुभ कामनाएं ! आपने सही विवेचना की की हर युग में क्यों केकई पर मंथारा का दुष्प्रभाव रूपी काली छाया क्यों पड़े और राम को वन वास क्यों हो ? जब आज का आदमी स्वर्ग के आस पास चन्द्र और मंगल तक अपने वायुयान भेजने में सफल होरहा है तो रामायण के पानों में भी बदलाव लाया जा सकता ! कलयुगी केकई राम अब वन नहीं जाएंगे, लेख काफी वजनदार और सटीक है, वधाई !

    yamunapathak के द्वारा
    January 17, 2016

    आदरणीय सर जी आपका बहुत बहुत आभार

sadguruji के द्वारा
January 10, 2016

आदरणीया यमुना पाठक जी ! सार्थक और विचारणीय लेखन के लिए हार्दिक अभिनन्दन ! आपने अच्छा लेख प्रस्तुत किया है, किन्तु मेरे विचार से महारानी कैकेई और दासी मंथरा बुद्धिहीन और विवेकशून्य नहीं थीं ! वो दोनों जरुरत से ज्यादा चतुर थीं ! आज भी बड़े और सम्पन्न परिवारों में मालकिन और नौकर के रूप में कैकेई और मंथरा के दर्शन हो जाते हैं ! सब के सब जरुरत से ज्यादा चालाक ! अति महत्वाकांक्षा एक सदियों पुरानी मानव मन की कमजोरी है ! कैकेई और मंथरा इसे अपने हक़ के लिए लड़ना मानते हैं और जायज भी ! आदरणीया यमुना पाठक जी मुझे लगता है कि जिस मानवता से परिपूर्ण विवेक और बुद्धिमत्ता की बात आपने चर्चा की है वो सच्चे साधू या भक्त के सिवा कहीं संभव नहीं ! अधिकतर गृहस्थों को मैं बहुत मत्वाकांक्षी और चतुर पाता हूँ ! सादर आभार !

    yamunapathak के द्वारा
    January 10, 2016

    आदरणीय सद्गुरू जी सादर नमस्कार आप की बात १०० % सत्य है तभी तो इस ब्लॉग के माध्यम से इस बात को घर परिवार समाज में पहुँचाना चाहती हूँ…ज़रुरत से ज्यादा चालक होना भी विवेकहीनता का ही नमूना है …जो विवेकी है उसे सिर्फ सरलता और सादगी समझ आती है. यह विवेक सिर्फ साधू संतों तक ही सीमित नहीं है ….हाल ही में इस प्रकार की समस्या से समाज में रूबरू हुई …समस्या थोड़ी सुलझ गई है क्योंकि बहुत कम संख्या में विवेकी स्त्रियां मिल पाइ …थोड़ी बाकी है क्योंकि कुछ को ऐसी बातों का मह्त्व ही समझ नहीं आता …. घर परिवार समाज के अस्वस्थ होने का कारण सिर्फ भोजन की आदतों का खराब होना नहीं बल्कि गलत लोगों की संगत भी है यह कोई नहीं समझ पाता है.हर बात के लिए पुरूष वर्ग ही दोषी नहीं है. साभार


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