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ज़िंदगी चाय की प्याली है ..

Posted On: 17 Dec, 2015 कविता में

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कल की बस्ती जब से शहर हो गई

तब से मैं भी नदी से नहर हो गई

रोज़ कुछ न कुछ लिखती हूँ ..अक्सर .सोचती हूँ ईश्वर से बड़ा लेखक कौन है…इतनी कहानियां ..इतने नाटक..इतनी कविताएँ …सब एक दूसरे से ज़ुदा …क्या वह कभी नहीं थकता…रोज़ नई कहानियां …नए संस्मरण लिखता ही जाता है…इतना ही नहीं पहले से लिखे में और भी जोड़ता जाता है..
जब हम बच्चे किशोर या युवा होते हैं तो ज़िंदगी बड़ी रूमानी लगती है पर उम्र बढ़ते ही .ज़िंदगी की उधड़ी हुई सच्चाईयों से परिचय होने लगता है…दिल चाहता है अपने अनुभव पूरी ईमानदारी से सब को लेखनी के माध्यम से बाँट दूँ…लिखती भी हूँ …कभी नग्न सत्य तो कभी प्रतीकों में सत्य उड़ेलने की कोशिश करती हूँ…कल्पना से सत्य ज्यादा मुखर होता है…मेरे लिए लेखन का एक उद्देश्य है…सच्चाई पर पडी धूल को साफ़ कर देना..मेरी लेखनी मुझसे ज्यादा मज़बूत है …यह मुझे वही बना रही है जैसा मैं बनना चाहती हूँ .लेखन में जब ईमानदारी नहीं तो यह आडम्बर के सिवा कुछ भी नहीं ….पर सच्चे लेखन की कीमत भी भरपूर चुकानी पड़ती है…हम स्वयं को सच कहते हैं…दुनिया हमें बागी सरफिरे कहती है.उँह !!!! इंसान भी किन किन गलतफहमियों में ज़िंदगी गुज़ार देता है…पिछले कुछ वर्षों में मैं थोड़ी परिपक्व हो गई ….मेरी लेखनी थोड़ी समझदार हुई …अब हड़बड़ाहट नहीं …बेचैनी नहीं…ठहराव है…वक़्त को लेखनी में बांधने की सनक तो है पर उतावलापन नहीं …जानती हूँ जो नहीं लिख पाउंगी उसे दुनिया पूरा कर देगी …
.बचपन के रिक्त स्थान भरो …..के प्रश्नों की तरह ….जब तक दिल दिमाग चैतन्य है तब तक तो प्रवाह बना रहे ….

जब कोई बात समझ में ना आये तो उसे ईश्वर का सन्देश मान कर स्वीकार कर लें .शायद वह हमसे कुछ अन्य महत्वपूर्ण काम करवाना चाहता है .समय का सदुपयोग और जीवन के मायने दोनों को समझ कर शांत मन से अपनी ज़िंदगी के प्रत्येक लम्हों को सहेजें.

1) ज़िंदगी चाय की प्याली है

हर सुबह …
स्त्री बनाती है चाय
पुरूष पूछता है
क्या कर रही हो
वह कहती है
‘ जिंदगी छान रही हूँ ‘
चाय सा दुख
पी जाऊंगी
चायपत्ती सा सुख
मिट्टी मेें डाल दूंगी
ताकि पौधों के रूप में
सुख कुदरत मेें बंट जाएं
पुरुष हंस कर कहता है
सच..
बात तुम्हारी निराली है
‘ जिंदगी चाय की प्याली है ‘
क्या समझ पाएगी स्त्री
इस हंसी के रहस्य को
जबकि अक्सर ही रखा
छुपा पुरुष ने अश्क़ को .

.हर सुबह …

स्त्री बनाती है चाय

पुरूष पूछता है

क्या कर रही हो

वह कहती है

‘ जिंदगी छान रही हूँ ‘

चाय सा दुख

पी जाऊंगी

चायपत्ती सा सुख

मिट्टी मेें डाल दूंगी

ताकि पौधों के रूप में

सुख कुदरत मेें बंट जाएं

पुरुष हंस कर कहता है

सच..

बात तुम्हारी निराली है

‘ जिंदगी चाय की प्याली है ‘

क्या समझ पाएगी स्त्री

इस हंसी के रहस्य को

जबकि अक्सर ही रखा

छुपा पुरुष ने अश्क़ को .
2) प्रश्न पूछिए

चुप्पी तोडिये
प्रश्न पूछिए
स्वयं से भी
और औरों से भी
नकारिये गलत को
यही एक विकल्प है
समाज को सही दिशा में
ले जाने का
अँधेरा इतना घना
ज़रुरत है कि
चटक हो
रोशनी का विश्वास
आओ बदल दें
सोच को सच्चाई में .

3) यकीन करना

दिन चाहे कितना भी रोशन कर लो
रात अंधेरी ही होती है यकीन करना
ये लाव लश्कर और ये लोगों का हुजूम
बेचैनी अकेली होती है यकीन करना

तन्हाईयाँ जब टकराती दीवारों से
सदा हमारी होती है यकीन करना
आवाज़ करती नहीं दीवारें किले की
भुरभुरा कर गिरती है यकीन करना

घड़े कभी रुके नहीं रहते पनघट पर
प्यास सबको लगी होती यकीन करना
छनक पायल की ना चूड़ी की खनक
दौड़ती बहू भी सोती है यकीन करना

बदल जाते हैं दीवारों पर लगे इश्तहार
हर शय की उम्र होती है यकीन करना
हैं मोड़ कई कोई आएगा कोई जाएगा
गली वहीं टिकी होती है यकीन करना .

4) पुरूष होने का अर्थ

जिम्मेदारियो की दहलीज पर
पुरूष खड़े हैं इस उम्मीद में

कोई लेखनी तो होगी जो
दर्द उनका बयां कर जाएगी

नारी होने का अर्थ
है सबकी सोच का विषय
पुरूष होने का अर्थ भी
क्या पूछा किसी ने कभी
मजदूर हो या अधिकारी 
अनगिनत सपने लिए
रोज सुबह निकलता घर से
पीछे अनगिनत चिंताएं
कमरे की खिड़की पर छोड़
मशीन /लैपटॉप पर उंगलिया
और मस्तिष्क में
जिम्मेदारियो की फेहरिस्त
जोड़ घटाव गुणा भाग मेें
जिंदगी गणित सी निकल जाती है

पुरूष होने का अर्थ समझ पाते
उनका भी दर्द कभी देख पाते ।

5) रीढ़विहीन लोग…रेंगता समाज

जब भी देखती हूँ
ज़मीन पर
रेंगते हुए समाज को
कोई आश्चर्य होता नहीं
जानती हूँ
रीढ़विहीन लोगों ने
कर दिया है
समाज को रेंगने पर मज़बूर
सीधे खड़े हो कर चलने वाले भी
टकरा कर गिर पड़ते हैं
रीढ़विहीनों ने
नहीं छोड़ी कोई जगह
जहां रीढ़ की हड्डी वाले
खड़े भी हो सकें
समाज भी हो गया है आदी
अब उसे रीढ़विहीनों के बोझ से
नहीं होता कोई दर्द
अब उसे रेंगना ही
बहुत अच्छा लगने लगा है .



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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
December 30, 2015

नमस्कार सादर पढ़ा , अच्छा लगा . नए साल की शुभ कामनएं

    yamunapathak के द्वारा
    January 1, 2016

    सर जी आपको भी बहुत बहुत शुभकामना

Aakash Tiwaari के द्वारा
December 24, 2015

आदरणीया यमुना जी, सुन्दर अतिसुन्दर आपने जिस तरह से स्त्री को समझा जो की स्वाभाविक है वही दूसरी ओर आपने पुरुष वर्ग पर एक बेहतरीन सोच को दर्शाया है,,,अच्छा नहीं बहुत अच्छा लगा पढ़कर,…. आकाश तिवारी

    yamunapathak के द्वारा
    December 26, 2015

    आकाश जी आपको ब्लॉग अच्छा लगा इस बात के लिए मुझे बहुत प्रसन्नता हुई …आपका बहुत बहुत आभार

harirawat के द्वारा
December 22, 2015

यमुनाजी नमस्ते ! काफी अरसे बाद आपके ब्लॉग पर आना हुआ, कारण शारीरिक परेशानियां, जिनको मैं अभी तक हवा में उड़ाया करता था, लेकिन जब हवा ही उल्टी चलने लगे तो भला आदमी ….. आपकी कविता के मुताबिक़ जिंदगी चाय की प्याली है! सच पूछो आपकी हर कविता में एक रहस्य छिपा है, एक चेतावनी है तो चेतना भी ! जिंदगी एक चाय की प्याली से शुरू होकर रीढ़ विहीन लोग …रेंगता समाज ..यहां आकर थम जाता है ! सच कहूँ आप प्रगति पथ की जन जन में जान डालने वाली सच्चाई पर पडी गार्ड हटाने वाली कवित्री हो, I salute you. I wish your affords may bring you cheerfulness and evergreen smile as flower.

    yamunapathak के द्वारा
    December 23, 2015

    AADARNEEY SAR JEE saadar namaskar aap jald swasth hon iishvar se yahee prarthana hai…aapkee prerana ke liye bahut bahut aabhee hun .

jlsingh के द्वारा
December 21, 2015

आदरणीया यमुना जी, अभिनंदन आपका. आपने पुरुषों के अश्क को भी महसूस किया है उसके जिम्मेदारियों की फेहरिश्त भी देखी है ..लाजवाब है सभी कविताएँ एक से बढ़कर एक … एक जगह मैं अपनी समझ से संशोधन का अनुरोध करना चाहता हूँ – खनक पायल की ना चूड़ी की छनक की जगह छनक पायल की ना चूड़ी की खनक होना चाहिए …सामान्यत: ऐसा ही प्रयोग होता है …. अगर आप विशेष अर्थ देना चाहती होंगी तो अलग बात है… सादर!

    yamunapathak के द्वारा
    December 21, 2015

    आदरणीय जवाहर जी सादर नमस्कार आपने बहुत सही सुधार की तरफ ध्यान दिलाया है मैं अभी इसे सुधार लेती हूँ आपका बहुत बहुत धन्यवाद मैं हमेशा चाहती हूँ आप जैसे सुधी ब्लॉगर साथी मेरे ब्लॉग पर अवश्य आएं आपको अभिव्यक्ति अच्छी लगी आभारी हूँ .

pkdubey के द्वारा
December 18, 2015

आदरणीया ,बहुत सच्चा आलेख और काव्य ,बचपन के रिक्त स्थान भरो ………………………..| एक सच्चा आचार्य हमेशा चिंतनशील है ,समाज के लिए ,अपने शिष्यों के लिए ;कल आप का २०१२ का एक लेख पढ़ा, सरहद का सिपाही -शीर्षक -मुन्ना के बचपन की कहानी,हृदय स्पर्शी जीवन ,सादर आभार के साथ |

    yamunapathak के द्वारा
    December 20, 2015

    दुबे जी आपका बहुत बहुत आभार ..लिखना एक अजीब सी संतुष्टि देता है ….


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