Aatamaabhivyakti

extremely CRUDE ; completely PURE

242 Posts

3087 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 9545 postid : 1012979

स्वतंत्रता एक जिम्मेदारी है

Posted On: 15 Aug, 2015 Others,Junction Forum,Special Days में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

प्रिय ब्लॉगर साथियों
स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामना

tirangaखुला विशाल आकाश मिल भी जाए
उड़ान को मज़बूत पंख मिल भी जाए
फिर भी…
ज़मीन से आकाश तक
आगाज़ से अंजाम तक
होती है तस्वीरें ज़ेहन में हमेशा
अपनी मर्यादा के सरहद की
अपनी जवाबदेही के शिखर की

क्योंकि …
स्वतंत्रता एक ‘जिम्मेदारी ‘है

मनुष्य स्वतंत्र जन्म लेता है अतः स्वतंत्रता हमारा अधिकार है .पर इसे जिम्मेदारी से वरण करना हमारा कर्त्तव्य है .एक धुरी से बंधा व्यक्ति , समाज,देश एक निश्चित परिधि में घूमने को विवश हो जाता है .जिससे कार्य का दोहराव ,गलतियों के दोहराव का दुष्चक्र चलता रहता है जो विकास की राह में रोड़ा बन जाता है .नयेपन के लिए स्वतंत्रता ज़रूरी है.घर परिवार समाज देश की स्वतंत्रता हमें जीवन का मक़सद देती हैं .मन की स्वतंत्रता,विचार की स्वतंत्रता ,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ,कार्य की स्वतंत्रता जिम्मेदारी और जवाबदेही के संग आती है.क्योंकि स्वतंत्रता और जिम्मेदारी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं …एक गाड़ी के दो पहिये …एक संपूर्ण शरीर के दो कान ,दो आँखें ,दो हाथ ,दो पैर सदृश ….एक के बगैर दूसरे की अपूर्णता ,अशक्तता स्पष्ट दृष्टिगोचर हो जाती है.प्रत्येक घटना ,परिस्थिति को विवेक की कसौटी पर कस कर जन हित सर्व हित में कार्य करना ही स्वातंत्रय जिम्मेदारी है.

कवि गोपाल सिंह नेपाली जी की कुछ पंक्तियाँ याद आ रही हैं…

तन की स्वतंत्रता चरित्र का निखार है
मन की स्वतंत्रता विचार की बहार है
घर की स्वतंत्रता समाज का श्रृंगार है
पर देश की स्वतंत्रता अमर पुकार है
टूटे कभी ना तार यह अमर पुकार का
तुम कामना करो अनंत कामना करो .

आज सड़क से लेकर संसद तक स्वतंत्रता का जो गैरजिम्मेदाराना प्रदर्शन हो रहा है…उसकी कल्पना स्वतंत्रता के रण बांकुरों ने कभी ना की थी.अपनी विचाराभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कुछ भी कहीं भी कह देना ,भीड़ का हिस्सा बन हिंसा फैला देना ,कार्य स्थल पर अपनी शक्ति का गलत प्रयोग करना स्वतंत्रता के दामन को तार तार कर रहा है.
नदी पहाड़ों की ऊंचाई से निकल कर बहने के लिए स्वतंत्र है पर जब जब उसने अपने कगारों को तोड़ने की भूल की है तबाही का मंज़र अपने निशाँ छोड़ गया है .सूर्य अपनी रोशनी बिखेरने के लिए स्वतंत्र है पर वह भी समयानुसार अपने बिखराव को नियंत्रित करता है.समंदर की लहरें कितनी भी चंचल हों साहिल तक आकर लौट ही जाती हैं …और लहरों के द्वारा साहिल को छोड़ने की गलती के ख़मियाज़े की गूँज मीलों तक सुनी जाती है.प्रकृति अपनी स्वतंत्रता को जिम्मेदारी से वरण करने की भरसक कोशिश करती है.हम मनुष्य ही हैं जो स्वतंत्रता के बेज़ा प्रयोग करने पर आमादा हैं.


सड़क से संसद तक…बच्चे से बुजुर्ग तक…समाज के प्रत्येक तबके ,प्रत्येक वर्ग ,प्रत्येक आयु के नागरिकों को अपनी स्वतंत्रता के प्रति सजग होना होगा ताकि वे इससे जुडी जिम्मेदारी को समझ सकें .हम पूरे देश में स्वतंत्रतता से बिना रोक टोक घूम सकते हैं पर हमारी जिम्मेदारी है कि हम किसी स्थान विशेष को गंदा ना छोड़ें ,दीवारों पर कुछ ना लिखें ,कचरा इधर-उधर ना फैलाएं, अपने और अपने सहयात्रियों के प्रति सजग रहे.हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिली पर हमारी जिम्मेदारी भी है कि किसी भी व्यक्ति,समाज देश के मान सम्मान को ठेस ना पहुंचाएं अनर्गल बातों और बहसों से बच कर रहे .हम स्वतंत्रता से अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार किसी भी होटल रेस्टोरेंट में जाने के लिए स्वतंत्र हैं… हमारी जिम्मेदारी है कि भोजन कभी व्यर्थ ना करें .ऐसा कोई व्यवहार ना करें जो दूसरों की स्वतंत्रता को हानि पहुंचाए ….यूं भी कहा जाता है एक व्यक्ति की स्वतंत्रता वहां ख़त्म होती है जहां से दूसरे व्यक्ति की नाक शुरू होती है.अगर हम अपनी स्वतंत्रता से जुडी जिम्मेदारी को नहीं समझ पाते तो हमें गुलामी की ओर लौटने में तनिक भी देर नहीं लगेगी .
गोपाल सिंह नेपाली जी भी तस्कीद देते हैं…


हम थे अभी अभी गुलाम यह ना भूलना
करना पड़ा हमें सलाम यह ना भूलना
रोते फिरे उम्र तमाम यह ना भूलना
था फ़ूट का मिला इनाम यह ना भूलना
बीती गुलामियां लौट आये ना फिर कभी
तुम भावना करो स्वतंत्र भावना करो .

प्रिय भारतवासियों ,हम सब एक हैं ….एक दूसरे की भाषा धर्म ,विचार ,संस्कृति ,जीवन शैली के प्रति सम्मान रख कर हम ना केवल अपनी स्वतंत्रता का जिम्मेदारी पूर्वक आनंद लेते हैं बल्कि दूसरों को भी यह आनंद दे जाते हैं जिससे हमारा आनंद द्विगुणित हो जाता है .व्यक्ति ,धर्म ,भाषा जब भी अपमानित होती है …इंसानियत शर्मशार होती है ….खून किसी हिन्दू ,मुसलमान ,ईसाई या सिख का नहेीं बल्कि मानवता का बहता है जिसका रंग एक है लाल और भारत देश में इसका एक ही नाम है’ तिरंगा’ .

आइये इस स्वतंत्रता दिवस पर …..मर्यादा की सरहद और जवाबदेही के  शिखर ….स्वतंत्रता की उड़ान के लिए इन दो मज़बूत पंखों को कभी कमज़ोर ना होने देने का संकल्प लें . . …..अपने स्वातंत्रय से जुडी जिम्मेदारी का बोध बखूबी कर सही अर्थों में इसका उत्सव मनाएं .नेपाली जी की पंक्तियों से ही आह्वान करती हूँ …

है देश एक लक्ष्य एक मर्म एक है
चालीस कोटि है शरीर मर्म एक है
पूजा करो पढ़ो नमाज़ धर्म एक है
बदनाम हो अगर स्वराज शर्म एक है
चाहो कि एकता बनी रहे जनम जनम
तुम वन्दना करो मनुष्य वन्दना करो .

जय भारत …जय तिरंगा …जय भारतीय



Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

2 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
August 20, 2015

आदरणीय यमुना जी, सादर अभिवादन । यह कमेंट प्रेषित कर रहा हूं लेकिन यकीन नही कि यह आप तक पहुंचेगा भी कि नही । इधर मेरे बहुत से कमेंट मित्रों को नही मिले । आपका यह लेख बहुत महत्वपूर्ण सवाल उठाता है कि हमे अपने अधिकारों के साथ साथ अपनी जिम्मेदारियों का भी एहसास करना चाहिए । ऐसा नही कि सबकुछ मनमर्जी हो जाए । आजकल ऐसा ही दिखाई दे रहा है ।

Shobha के द्वारा
August 18, 2015

प्रिय यमुना जी बहुत अच्छा लेख बड़ी ही खूबसूरत भाषा में आपने अपने विचार प्रस्तुत किये है गद्य और पद्य के मिलान के साथ लेख बहुत प्रभावी वना है


topic of the week



latest from jagran