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स्त्री की आत्मकथा

Posted On: 27 Jun, 2015 कविता में

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पता चलता है …

समाज विवेकी होता है तो बच्चों से पता चलता है
आज़ाद होती हैं औरतें तो रस्मों से पता चलता है.
मौसम जब बदलता है तो पत्तों से पता चलता है .
दर्द होता है गहरा तो सूखे अश्कों से पता चलता है

जड़ें गहरी हैं कितनी हरे दरख्तों से पता चलता है
शहंशाह थे कैसे यह खाली तख्तों से पता चलता है .
इबारतों के सच का पीले पन्नों से पता चलता है
खामोश रिश्तों के दर्द का अपनों से पता चलता है .

२)

स्त्री की आत्मकथा

इस धरती पर अब भी स्त्री
जीती है कई कई किरदार
समाज ने कुछ माने दागी
हैं कुछ प्रामाणिक बेदाग़
कभी मर्यादा की मूरत बन
होती वह सीता सावित्री
कभी प्रज्ञाबुद्धि मेधा संग
बन जाती गार्गी ,मैत्रेयी
कभी पुत्र मोह में अंधी बन
गांधारी सी बेबस हो जाती
कभी अनजाने ही शापवश
अहल्या सी पत्थर हो जाती
कभी- कभी बनती है स्त्री
हीर,सोहनी या फिर लैला
जीवन संजीवनी छीन लेता
तब समाज यह मैला कुचला
कभी अनजाने है जग जाती
राधा बनने की प्यास भी
अबोध प्रेमवश लग जाती
मीरा सी कृष्ण की आस भी
कुछ होती दफ़न अंतर्मन में
कुछ उभर बाहर आ जाती
मज़बूत बन किरदार कोई
बन जाती जीवन की थाती
आज तक स्त्री चरित को
है पुरुष ने ही गढ़ा लिखा
नहीं लिखी स्त्री ने अब तक
कोई भी एक आत्मकथा .

3)

दीप्त सूर्य के सपने

नन्ही नन्ही बेटियां
देखती हैं सपने
चमकते दीप्त सूर्य की
घर से स्कूल
और स्कूल से घर तक
कुलांचे भरती हैं
भागते हैं
नन्हे नन्हे पाँव
निगाहें होती हैं
आसमाँ के सूर्य पर
पर अफ़सोस …..!!!!
कभी हाथ ही पहुँच नहीं पाते
दीप्त सूर्य तक
और कभी
सूर्य ही अटक जाता है
दरख़्त की टहनियों पर .

4)

जब कभी मन तन्हा होता है

जब कभी मन तन्हा होता है
खुद में जीना अच्छा होता है
………………….
कितनी खामोशी; कितने दस्तक
कुछ होते नूपुर से झंकृत
कुछ सन्नाटे से व्यथित
ख्वाहिश नहीं …
कानों को हाथों से बंद करने की
फड़कते होठों को सील देने की
हर अनुभव निचोड़ना होता है
जब कभी मन तन्हा होता है
खुद में जीना अच्छा होता है
……….
वर्त्तमान को साँसों में भर
भविष्य के धागों में उलझ
अतीत के गर्म रेत में
बोये बीजों को निकाल
अस्तित्व के मर्म को समझना होता है
जड़ से अलग हो जाना
वृक्ष की स्वतंत्रता नहीं
इस संस्कार को जीना होता है
जब कभी मन तन्हा होता है
खुद में जीना अच्छा होता है .

५)

स्वतंत्रता …एक जिम्मेदारी

खुले मज़बूत पंख मिल भी जाएं
ऊंची उड़ान अगर भर ली भी जाए
फिर भी…आगाज़ से अंजाम तक
होती है तस्वीर ज़ेहन में हमेशा
अपनी मर्यादाओं के सरहदों की
कुछ जवाबदेही के शिखरों की
क्योंकि …स्वतंत्रता …
एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है .



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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
July 16, 2015

dubey jee aajkal pratikriya comment blog par direct submit nahin ho pa rahe hain spam mein dekha aapka bahut bahut aabhar

yamunapathak के द्वारा
July 16, 2015

aadarneeya shobha jee yah comment spam mein aa gaya hai ….post par submit nahin ho raha …thodee pareshanee hai .. aapka bahut bahut aabhar

yamunapathak के द्वारा
July 16, 2015

bishta jee comments blog par post nahin ho pa rahe aapka bahut bahut aabhar

pkdubey के द्वारा
June 30, 2015

सादर साधुवाद आदरणीया | मेरे बाबा जी कहते -इंसान के हाव -भाव ,उसकी बातचीत से उसके कुल का पता चलता है |

Shobha के द्वारा
June 30, 2015

प्रिय यमुना जी बहुत अच्छे विचार परन्तु आप तक मेरी प्रतिक्रिया पहुंचेगी गारंटी नहीं लिखना तो बहुत कुछ चाहती हूँ

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
June 30, 2015

आदरणीय यमुना पाठक जी, मन प्रशन्न हो गया आपकी कविताएं पढ कर । बहुत ही सुंदर रचनाएं ।


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