Aatamaabhivyakti

extremely CRUDE ; completely PURE

244 Posts

3093 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 9545 postid : 902069

योग शक्ति है;भक्ति नहीं ,यह मर्म है ;धर्म नहीं

Posted On: 9 Jun, 2015 Junction Forum,lifestyle,Special Days में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

रामधारी सिंह दिनकर जी की कविता ‘शक्ति और सौंदर्य ‘ की पंक्तियाँ याद आ रही हैं …

तुम रजनी के चाँद बनोगे या दिन के मार्तण्ड प्रखर
एक बात है मुझे पूछनी  , फूल बनोगे या पत्थर
तेल फुलेल क्रीम कंघी से नकली रूप बनाओगे
या असली सौंदर्य लहू का आनन पर चमकाओगे
पुष्ट देह,  बलवान भुजाएं , रूखा चेहरा , लाल मगर
यह लोगे या लोगे पिचके गाल, सँवारी मांग सुघर
जीवन का वन नहीं सजा जाता कागज़ के फूलों से
अच्छा है दो पात जो जीवित बलवान बबूलों से .

ये पंक्तियाँ प्राकृतिक जीवन शैली और इसकी परिणति के रूप में सुन्दर स्वस्थ शरीर के महत्व को बताती है साथ ही कृत्रिम जीवन को अस्वीकार करने को प्रेरित भी करती हैं.

आदरणीय मोदी जी के सभी अच्छे कामों की शुरुआत से हम भारतीय आशान्वित हैं.मुझे सर्वाधिक हर्ष इस बात का है कि भारतीय आदि संस्कृति का प्रतीक योग की शक्ति का लोहा उन्होंने संपूर्ण विश्व से मनवा कर २१ जून को अंतराष्ट्रीय योग दिवस के नाम कर दिया .२१ जून समर सोल्स्टिस के रूप में जाना जाता है उस दिन उत्तरी गोलार्ध में दिन की अवधि सबसे लम्बी होती है .इस दिन का खगोलीय महत्व है .पर जिस तरह से कुछ लोगों ने इस के प्रथम आयोजन को लेकर विरोध के बिगुल बजाने शुरू कर दिए हैं वे भूल रहे हैं कि योग जीवन जीने की शक्ति से जुड़ा है यह किसी धर्म विशेष से जुडी कोई भक्ति नहीं है .यह जीवन को समझने और जीने का मर्म है ;कोई धर्म नहीं है.

मैं प्रतिदिन योगासन करती हूँ यह मुझे पिता से वंशानुगत आदत के रूप में प्राप्त हुआ है.शारीरिक और मानसिक परेशानियों को दूर रखने के प्रतिरक्षात्मक और प्रतिरोधात्मक रूप में इसका अनुभव करती हूँ.मैंने ताज़ा समाचारों में जब यह पढ़ा कि कुछ इस्लामी विद्वानों के अनुसार यदि योगासन सूर्य की ओर देखे बिना किया जाए तो इसमें धार्मिक अंश नहीं रहेगा और इसे अपनाने में भी कोई दुविधा नहीं रहेगी तब मैं यह सोचने पर विवश हूँ कि जो सूर्य धरती पर सभी प्राणी .पादप के लिए ऊर्जा स्त्रोत है उसे धर्म से जोड़ देना जबरन विरोध का हास्यास्पद उदाहरण नहीं तो और क्या है.शरीर की प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक शक्ति को प्रबल बनाने के लिए सूर्य की प्रथम रोशनी का स्नान ज़रूरी है .सूर्य नमस्कार पृथ्वी पर ऊर्जा के स्त्रोत अर्थात जीवन शक्ति के प्रति हमारी कृतज्ञता है जिसका किसी धर्म विशेष से कोई सरोकार नहीं है. दरअसल सूर्य नमस्कार योगासन नहीं है. जो  व्यक्ति गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हुए आसनों या ध्यान के लिए वक़्त नहीं निकाल पाते या किसी निर्बलता ,विकार के कारण कठिन योग साधना नहीं कर पाते उनके लिए सूर्य नमस्कार की पद्धति है.इसकी बारह अवस्थाएं है जो करने में आसान भी हैं और मन और तन स्वस्थ ,शांत और प्रसन्न कर सहजता से मानसिक और शारीरिक सबलता देती है .इसे करने के दौरान जपे जाने वाले मन्त्र से विरोध भी बेजा ही है .प्रथम अवस्था में ओम मित्राय नमः ,दूसरी में ओम रवये नमः ,तीसरी में ओम सूर्याय नमः,चौथी में ओम मानव नमः , पांचवी में ओम खगाय नमः , छठी में ओम पुष्णे नमः , सातवीं में ओम हिरण्य गर्भाय नमः , आठवीं में ओम मरीचये नमः , नौवीं में ओम आदिव्याय नमः , दसवीं में ओम सुविये नमः , ग्यारहवीं में ओम अर्काय नमः और अंतिम बारहवीं अवस्था में ओम भाष्कराय नमः मन्त्रों के जाप में असीम ऊर्जा के प्रतीक सूर्य के प्रति कृतज्ञता है जो इस धरती पर जन्म लेने वाले प्रत्येक प्राणी को व्यक्त करना चाहिए .मूक पशु पक्षी अपनी भाषा में रम्भाकर ,चहचहा कर ,पेड़ -पौधे फूलों को खिला कर झूम कर इस ऊर्जा के प्रति कृतज्ञ हो उठते हैं …सूर्य उगते ही कमलिनी अपने दल खोल देती है …कमल खिल उठते हैं फिर हम मानव जिन्हे बोधगम्य वाक्शक्ति की अनमोल नेमत मिली है वे सूर्य नमस्कार और जाप से गुरेज़ क्यों और कैसे कर सकते हैं.!!!!!!!!!!!!


आज आधुनिक शैली ने शहरों में महंगे जिमखाने की स्थापना कर दी है मुझे इससे कोई विरोध नहीं पर योगासन एक ऐसा व्यायाम है जिसे किसी भी आयु वर्ग के लोग बिना किसी उपकरण के साफ़ ताज़ी हवा वाले किसी भी स्थान में कर सकते हैं चाहे वह घर का कोना हो ,बाहर मैदान या उद्यान …‘.हल्दी लगे ना फिटकरी ,रंग चोखा आये ‘ की कहावत सही मायनों में योगासन सत्य कर देता है.सच है ‘ एक तंदरुस्ती हज़ार नियामत’ के मह्त्व को जो लोग योग से जोड़ कर देखते हैं वे प्रसन्न चित्त और स्वस्थ तन के साथ सकारात्मकता से भरे होते हैं .ऐसा नहीं कि वे बीमार नहीं पड़ते या समस्याओं से परेशान नहीं होते पर वे जल्द ही मानसिक और शारीरिक स्वास्थय लाभ लेने में सक्षम हो जाते हैं.वर्त्तमान युग में पश्चिम देशों के देशों ने भी इस तथ्य को स्वीकार किया है की जीवन शक्ति को असाधारण रूप से विकसित करने में योगासन और साथ ही प्राणायाम जैसी श्वसन क्रिया एक उत्तम विधि है.

अगर हम धर्म को आडम्बर तथा खोखले रस्म रिवाज़ में नहीं बांधते और सही अर्थों में धार्मिक हैं तो योग की आध्यात्मिकता से इंकार नहीं कर सकते क्योंकि योग शब्द का अर्थ ही है ‘जोड़ने वाला’ यह संस्कृत भाषा के ‘युज ‘ धातु से बना है .आत्मा को परमात्मा से जोड़ना योग है.योग के आठ अंगों में से किसी के भी मह्त्व से सिर्फ इसलिए इंकार कभी नहीं किया जा सकता कि यह धर्म से जुड़ा है.प्रथम अंग ‘यम पांच नियम …अहिंसा,सत्य,अस्तेय,ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह से जुड़ा है जो नैतिक जीवन के लिए सार्वभौमिक रूप से स्वीकार्य होने ही चाहियें . दूसरा अंग नियम है जिसके अंतर्गत …शौच,संतोष, तप ,स्वाध्याय , ईश्वर – प्राणिधान की बात है इसकी उपयोगिता और अपरिहार्यता से कौन इंकार कर सकता है.तीसरा अंग आसन से जुड़ा है…जो शरीर को लचीला ,सुन्दर स्वस्थ और सुगठित बनाने में मदद करते हैं.चौथा अंग प्राणायाम है जिसका शाब्दिक अर्थ है’जीवनी शक्ति का नियंत्रण ‘ श्वासः ही जीवन शक्ति है और श्वास लेने और छोड़ने की प्रक्रिया को ही प्राणायाम कहते हैं .पांचवा अंग प्रत्याहार है अर्थात अपनी इन्द्रियों को बाह्य विषयों से मुक्त कर अंतर्मुखी कर देना .यह जीवन के भाग दौड़ उहापोह से शान्ति की ओर ले जाने के लिए अत्यंत ज़रूरी है.छठा अंग धारणा है …निर्मल मन को अपने इष्ट या आराध्य में रमा देना ही धारणा है.यह चित्त के केन्द्रीयकरण एकाग्रता के लिए ज़रूरी है और इसका किसी धर्म विशेष से कोई लेना देना नहीं क्योंकि आराध्य किसी भी सम्प्रदाय के लोग की स्वेच्छा पर निर्भर है.यह ब्रह्माण्ड की रहस्यमयी शक्ति और स्वस्तित्व के आभास का एहसास है.सातवां अंग ध्यान है जिससे मन के सत्व गुणों को प्रबल और राजस और तामस वृत्तियों को दूर करने का प्रयास किया जाता है.अंतिम और आठवां अंग समाधि है सांसारिक क्रियाकलापों को निभाते हुए भी उसकी असारता का बोध हमें समाधिस्थ रखता है .हम धरती पर कुछ वर्षों के लिए किसी महान प्रयोजन के लिए हैं उस प्रयोजन के पूरा होने के बाद किसी अनदेखी दुनिया में जाना हर जीवन की नियति है इसे समझना ज़रूरी है.धारणा, ध्यान और समाधि ही जीवन में संयम लाते हैं.
पशु भी उठते ही अपने शरीर को खिंचाव देते हैं ;बिल्ली सोकर उठते ही चारों पैर पर खड़ी होकर बीच का पेट उठकर अपने पीछे की और खींचती है . दो चार सेकंड ऐसा करने के बाद अपना काम करने लगती है.कुत्ता पिछले और अगले पांवों के सहारे शरीर को खींचता है.

योग को सही मायनों में जीवन में शामिल किया जाए तो शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक स्वास्थ्य भी बना रहता है क्योंकि इससे सदाचारिता ,सच्चरिता,आध्यात्मिकता जैसे गुण सहज ही विकसित हो जाते हैं .अतः योग की शक्ति को भक्ति विशेष से ना जोड़ा जाए .यह धर्म से जुडी पूजा पाठ की रस्म नहीं नहीं बल्कि स्वस्थ तन मन वाले सवा करोड़ भारतीयों के प्रिय भारत देश की सशक्त पहचान है . आज मोदी जी के प्रयास से इस भारतीय विरासत को अंतराष्ट्रीय पहचान मिली है.

स्वास्थ्य का संभव होवे भोग

क्योंकि योग से दूर होवे रोग



Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (5 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

29 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
July 16, 2015

kumarendra jee aapka bahut bahut aabhar

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
June 19, 2015

बिलम्ब के लिए क्षमा चाहूंगा । साप्ताहिक सम्मान व इस खूबसूरत लेख के लिए मेरी बधाई स्वीकार करें ।

Maharathi के द्वारा
June 17, 2015

सादर नमस्कार।। .पर जिस तरह से कुछ लोगों ने इस के प्रथम आयोजन को लेकर विरोध के बिगुल बजाने शुरू कर दिए हैं, मैं उनके लिए एक दोहा प्रेषित कर रहा हूँ- ‘‘प्रतिरोधी प्रतिरोध का बड़ा मानसिक रोग। इसका भी उपचार है आओ कर लो योग।।’’।। महारथी।।

    yamunapathak के द्वारा
    June 18, 2015

    wah !!! bahut uchit panktiyaan hain maharathi jee ..aapka bahut bahut aabhar

Santlal Karun के द्वारा
June 15, 2015

आदरणीया यमुना जी, सामयिक विषय पर गंभीरतापूर्वक आप ने योग संबंधी तथ्यों को प्रामाणिक आधार के साथ व्यक्तिगत रूप से प्रस्तुत किया है | इस पठनीय आलेख के लिए सहृदय साधुवाद एवं ‘बेस्ट ब्लॉगर ऑफ़ द वीक’ के चयन पर हार्दिक बधाई !

    yamunapathak के द्वारा
    June 15, 2015

    आदरणीय करून सर जी सादर अभिवादन आपकीप्रेरणात्मक प्रतिक्रिया का बहुत बहुत आभार

atul61 के द्वारा
June 15, 2015

यह बिलकुल सही है कि योग शरीर को स्वस्थ रखने में सहायक है.सूर्य तो ऊर्जा का अक्षय भंडार है इसलिए सूर्य नमश्कार से परहेज नकाराताम्क भाव है .यंहा तो विरोध करना राजनैतिक लोगों का स्वभाव है जो की केवल सत्ता में आने के लिए सक्रिय हैं और सत्ता पक्ष अपने पक्ष को मजबूती से रखने के लिए प्रतिबद्ध है. मुझे डर है कि इस भारत वर्ष में तो योग कहीं प्रचार की वस्तु बनकर केवल सरकारी कार्यक्रमों तक ही सीमित न रह जाये. आधे से अधिक जनसँख्या जो कि रोजी रोटी की जुगाड़ में लगी रहती है उसके लिए योग के द्वारा स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करने की सोच गौड़ है

    yamunapathak के द्वारा
    June 15, 2015

    अतुल जी आपकी बात सही है ….रोजी रोटी की जुगाड़ में लगी जनता योग पर ध्यान नहीं दे सकती पर भारत की पहचान के रूप में यह दिवस अवश्य महत्वपूर्ण है.आपका बहुत बहुत आभार

Shobha के द्वारा
June 14, 2015

प्रिय यमुना जी जी में बाहर जा रही थी जल्दबाजी में आपका नाम गलत लिख गई क्षमा करे बेहद अच्छा लाभकारी लेख लिखा था आपने

    yamunapathak के द्वारा
    June 14, 2015

    shobha jee कोई बात नहीं आप की प्रेरणात्मक प्रतिक्रिया की सदैव आभारी हूँ

ashasahay के द्वारा
June 14, 2015

बहत सुन्दर ,ज्ञानवर्धक निबंध। योग का विरोध बेमानी है।यमुना जी, बहुत बधाई। आशा सहाय

    yamunapathak के द्वारा
    June 14, 2015

    आदरणीय आशा जी सादर नमस्कार आपका बहुत बहुत धन्यवाद

jlsingh के द्वारा
June 14, 2015

बेस्ट ब्लॉगर सम्मान के लिए बधाई आदरणीया यमुना जी ! आप इसी तरह नये नए विषयों पर जानकारी बांटती रहें . सादर!

    yamunapathak के द्वारा
    June 14, 2015

    आदरणीय जवाहर जी आपका बहुत बहुत आभार

Bhola nath Pal के द्वारा
June 13, 2015

योग जीवन जीनें तथा सत्य में समाहित होनें की कला है . बहुत अच्छा लेख . धन्यवाद …………

    yamunapathak के द्वारा
    June 13, 2015

    आदरणीय सर जी आपका अतिशय धन्यवाद

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
June 13, 2015

यमुना जी अाप योग सालों से करती आ रही हैं जानकर बहूत खुशी हुई । किंतु योग और योगासन मैं ऱात दिन का अंतर है । योगासन कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्था मैं कोई भी कर सकता है । उसका उद्देष्य केवल शरीर को लचीला स्वस्थ रखना ही होगा । …..परंतु योग का उद्देष्य आत्मा का परमात्मा से शाक्षात्कार हेतु तपस्या ही है । साधारण मनुष्य तो ईसके प्रथम अंग यम को ही पार नहीं कर सकता । …्दूसरे या समाधी पहूॅचना तो सिर्फ ख्याली पुलाव भी नहीं हो सकते है । एक ब्राह्मण कुल के पंडित जो कर्म कांड के ज्ञाता हों । यज्ञोपवित धारण कर नित्य सुबह शाम संन्धय़ा वंधन कर अपना धर्म निभा रहे हों वे भी यम को नहीं लाॅघ पाते । एक धर्म भ्रष्ट योगी नहीं हो सकता और एक योग भ्रष्ट परमात्मा शाक्षात्कार नहीं कर सकता । गीता मैं कहा है योगी प्रयासी नष्ट भी नहीं होता ,किंतु अगले जन्म मैं कुलीन कुल मैं जन्रम लेकर योग की ओर प्रब्रत होता है । यानि की योगी भी वही हो सकता है जिसके पूर्व जन्म के शुभ कर्म हों । जिससे संस्कारवान होकर योग प्रसस्त होता है । मोदी जी का उद्रदेष्य योग नहीं योगासन ही होना चाहिए । जिस पर वे योग के विरोधाभाषी विकास मार्ग पर चलते विश्व गुरु बनने की चाहत पूरी करना चाहते हैं। योगासन विकास का मार्ग अवरोधक नहीं होगा और मोदी जी की जय जयकार होगी । मुसलमानों को वेवकूफ ना बनाते वे सत्य को स्वीकार करते कहें हाॅ योग हिंदुओं का ही परमात्मा शाक्षात्कार मार्ग है । जिसमैं योगासन को आम जनता की भलाई के लिए शुलभ किया जा रहा है ।यमुना प्रवाह को अनवरत करना ही मेरा उद्देश्य है | योग तन ,स्थान , और मन को निर्मल करके ही पाया जा सकता है | ओम शांति शांति

    yamunapathak के द्वारा
    June 13, 2015

    हरिश्चंद्र जी आपकी प्रतिक्रिया ने मुझे शब्दों के प्रयोग की गलती की जानकारी दी है सच है योगासन ही सही शब्द है योग क्रिया करना क्या समझना ही कठिन है आपने इस ब्लॉग पर अपनी सुन्दर प्रतिक्रिया देकर इसे और आगे बढ़ाया है मैं आपकी आभारी हूँ.

sadguruji के द्वारा
June 13, 2015

आदरणीया यमुनापाठक जी ! सादर अभिनंदन ! योग विषय पर पाठको के लिए एक उपयोगी लेख प्रस्तुत करने के लिए और ‘बेस्ट ब्लॉगर आफ दी वीक ‘ चुने जाने के लिए बधाई ! इस लेख में अष्टांग योग की बारीकियां प्रकाशित नहीं हो पाई हैं, परन्तु फिर भी लेख सामयिक और योग केप्रचार-प्रसार में उपयोगी है ! सादर आभार !

    yamunapathak के द्वारा
    June 13, 2015

    आदरणीय सद्गुरू जी अआप्का अतिशय धन्यवाद …ब्लॉग ज्यादा बड़ा हो जा रहा था अतः उस भाग को नहीं लिखा …

jlsingh के द्वारा
June 13, 2015

आदरणीया यमुना जी, सादर अभिवादन! ! केरीवाल भी योग क्रिया से ही अपनी खांसी पर काबू प् सके. अब उनको अपनी राजनीतिक ज्ञान और शक्ति बढ़ने के लिए एक बार फिर से योग और प्राणायाम का सहारा लेना ही चाहिए. मोदी जी के बताये रास्ते पर ही हर एक कल्याण होना है अन्यथा रावण की गति को कौन नहीं जानता. आपका बहुत बहुत आभार इस युक्ति संगत और समसामयिक आलेख के लिए. हमरे देश के लोग स्वच्छ भारत कर चुके धन धन्य से पूर्ण आम जनता हो चुकी है अब स्वास्थ्य लाभ की बारी है और स्वास्थ्य से बड़ा कौन सा धन है भला!

    yamunapathak के द्वारा
    June 13, 2015

    आदरणीय जवाहर जी आपकी प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार …यह सच है की योगासन स्वाथ्य लाभ के लिए सर्वाधिक सस्ता और सुन्दर साधन है.मोदी जी के कई कदम बेहद उम्दा हैं पर इसे सुव्यवस्थित रूप से अमल में लाया नहीं जा रहा है. साभार

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
June 9, 2015

यमुना जी नये सुन्दर रुप मैं ,ज्ञान बर्धक लेख को अभिनन्दन …..हे मोदी …तुम योगी हो …….जो आम जनता को अपना अनुसरण करने को बाध्य कर देते हो …..मोदी जी की जय हो .भगवान क्रष्ण ने अर्जुन से कहा किंतु हमारे तो मोदी जी ही हैं ………ओम शांति शांति

    yamunapathak के द्वारा
    June 10, 2015

    हरिश्चंद्र जी मैं सालों से योग करती आ रही हूँ और इसके अच्छे परिणाम से परिचित हूँ ….अच्छी चीज़ों को विरोध का सामना करना ही पड़ता है पर इससे अच्छी बात और उसे मानने वालों पर कोई असर नहीं पड़ता . आपका बहुत बहुत आभार

rameshagarwal के द्वारा
June 9, 2015

जय श्री राम पाठकजी यमुनाजी बहुत अच्छा लेख लिखा अंग्रेजो ले आने के पहले योग गुरुकुलो में पढाया जाता था.अंग्रेजो ने आकर सभी वैदिक और भारतीयों को बंद कर ऐसा प्रचार किया जैसे ये सब बेकार केवल उनकी चीजे टीक हो कृष्णाजी ने गीता में कहा बीच में ज्यादा प्रच्लोत नहीं था फिर स्वामी रामदेवजी ने विश्व के कोने कोने में पहुचाया.मोदीजी ने तो कमल कर दिया की १७७ देशो ने इसका समर्थन किया देश में पाकिस्तानी मानसिकता वाले मुसलमान इतालियन कांग्रेस और वोट के भूखे नेता ही विरोध कर रहे.ये बहुत अच्छा कार्य हैसुर्य की रोशनी मुसलमान क्यों लेते है.

    yamunapathak के द्वारा
    June 10, 2015

    रमेश जी आपकी बातों से सहमत हूँ योग के अपने फायदे हैं पर सिर्फ विरोध के लिए विरोध अपना कर भारतीय विरासत को झुठलाया नहीं जा सकता अआप्का अतिशय आभार

Shobha के द्वारा
June 9, 2015

प्रिय वीना जी बहुत अच्छा लेख योग का कुछ वर्गों द्वारा राजनितिक कारणों से विरोध हो रहा करने वाले भी लम्बा जीने के लिए अपने घरों में योग करते हैं कुछ लोगों ने बताया वह अनुलोम विलोम करते थे सांस के रोगी थी सांस में जमा कफ पतला हो कर थूक से बाहर हो गया वह स्वस्थ हो गए परन्तु क्या करें कुछ लोगों का अड़ंगा डालना ही धर्म बन गया है | .धारणा, ध्यान और समाधि ही जीवन में संयम लाते हैं. योग को सही मायनों में जीवन में शामिल किया जाए तो शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक स्वास्थ्य भी बना रहता है क्योंकि इससे सदाचारिता ,सच्चरिता,आध्यात्मिकता जैसे गुण सहज ही विकसित हो जाते हैं .अतः योग की शक्ति को भक्ति विशेष से ना जोड़ा जाए .यह धर्म से जुडी पूजा पाठ की रस्म नहीं नहीं बल्कि स्वस्थ तन मन वाले सवा करोड़ भारतीयों के प्रिय भारत देश की सशक्त पहचान है बहुत उत्तम बात शोभा

    yamunapathak के द्वारा
    June 10, 2015

    आदरणीय शोभा जी आपने ब्लॉग की प्रतिक्रिया स्वरुप बहुत अच्छी बातें बताएं .आपका बहुत बहुत आभार .बस मेरे नाम को बदल दिया कोई बात नहीं साभार


topic of the week



latest from jagran