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...और सड़कें दम तोड़ देती हैं

Posted On: 2 Jun, 2015 कविता में

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जीती जागती …दौड़ती भागती
रंगीनियों से भरी सड़कें
बड़ी बेनूरी खामोश सी हो जाती हैं
जब…अर्सों बाद
उस शहर को लौटने पर
नहीं दीखता वह शोखे गुलमोहर
वो नीम जिससे थी शीत दोपहर
वह गली के कोने वाला ठेला
जब छूट जाए वह प्यारा मेला
तब सड़कें उदास हो जाती हैं
यहां यादें ही पास हो जाती हैं
बातें आम से ख़ास हो जाती हैं
वीरानगी आस पास हो जाती है
आज को बीते कल से जोड़ देती हैं
कदम अनाम गली में मोड़ देती हैं
मन को खंडहर में छोड़ देती हैं
और बस ….
सड़कें कुछ यूँ दम तोड़ देती हैं .

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Sonam Saini के द्वारा
June 5, 2015

आदरणीय मैम सादर नमस्कार ……, कविता के भाव बहुत अच्छे हैं, बहुत दिनों बाद आपकी कोई रचना पढ़ने को मिली ……… क्षमा याचना सहित एक लाइन कुछ गड़बड़ सी लग रही है …….’तब सड़कें उदास हो जाती हैं बस यादें ही पास हो जाती हैं” यहां यादे ही पास रह जाती है मुझे ज्यादा ठीक सा लग रहा है …….. यह सिर्फ मेरे अनुसार मुझे ऐसा लग रहा है …….

    yamunapathak के द्वारा
    June 14, 2015

    priya sanam tumahi salaah ke liye aabhar maine ise sudhar kar likh diya comment post nahin ho paaii thee aaj punah likh rahee hun . saabhar

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
June 4, 2015

सडकें दम तोड देती हैं ………तेजी से बदलते कस्बों और शहरों से जुडी हमारी यादें हमेशा एक मीठा एहसास देती हैं और हम उन्हीं दिनों को वहां तलाशने लगते हैं उसी रूप में । लेकिन बदलाव हमे एक भावनात्मक टीस देता ही है । आपने बहुत सुंदर लिखा है । बधाई

    yamunapathak के द्वारा
    June 4, 2015

    bisht ji aapka bahut bahut dhanyvad

Maharathi के द्वारा
June 3, 2015

प्रिय यमुना जी ……. हरे पेड़ की पीड़ कुल्हाड़ी, भारी पीड़ा है। सड़क निकलनी यहाँ से, दिमाग में काला कीड़ा है।। रचना आपकी कमजोर नहीं है। क्या खूब लिखा है नहीं दीखता वह शोखे गुलमोहर वो नीम जिससे थी शीत दोपहर।। बधाई।।

    yamunapathak के द्वारा
    June 4, 2015

    महारथी जी प्रतिक्रिया की पंक्तियाँ सुन्दर हैं आपका अतिशय धन्यवाद साभार

Shobha के द्वारा
June 3, 2015

प्रिय यमुना जी बहुत समय बाद आपको देखा बहुत अच्छा लगा सदैव की तरह खूबसूरत कविता आज को बीते कल से जोड़ देती हैं कदम अनाम गली में मोड़ देती हैं अति सुंदर डॉ शोभा

    yamunapathak के द्वारा
    June 4, 2015

    आदरणीय शोभा जी नमस्कार वक़्त नहीं मिल पा रहा था ….आपको कविता अच्छी लगी मुझे बहुत अच्छा लगा …लिखना चाहती हूँ पर आाजकल विचार को लेख बढ़ा करने का समयाभाव हो जाता है . साभार


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