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वन्स अपॉन अ टाइम

Posted On: 3 Apr, 2015 Junction Forum,Entertainment,Others में

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एक चार वर्ष की बच्ची ‘ज़ो ‘रोज सोने से पूर्व अपने पापा से कहानी सुनाने को कहती है। पापा बच्ची को जो भी कहानी सुनाते हैं उसमें अलग अलग जानवर ही किरदार होते हैं पर हर बार उसका एक ही नाम होता है ‘रोज़र ‘जिसके माध्यम से कहानी में कल्पना ,समस्या ,समाधान और नैतिक मूल्य को प्रस्तुत किया करते थे. रॉजर की ज़िंदगी में एक समस्या होगी.वह जंगल जाएगा वहां उसे बुद्धिमान उल्लू मिलेगा जिससे वह समस्या कहेगा .उल्लू उसे जादूगर के पास भेजेगा जो छड़ी घूमा कर समस्या दूर कर देगा बदले में रॉजर उसे पैसे देगा . एक शनिवार की रात वे  रॉजर स्कंक की कहानी सुनाते हैं. स्कंक एक ऐसा जानवर है जिसके शरीर से बदबू आती है। अतः कोई उसके साथ नहीं खेलता है. दरअसल पापा अपने बचपन में अकेलेपन का दंश झेल चुके थे।वे इस सम्बन्ध में अपनी बेटी की प्रतिक्रिया जानना चाहते थे .रॉजर स्कंक जंगल जाता है .उल्लू से मिलता है वह उसे जादूगर के पास ले जाता है .जादूगर से स्कंक स्वयं के लिए गुलाब जैसी खूशबू मांगता है .जादूगर छड़ी घूमा कर ऐसा कर देता है .वह उसे पैसे देकर घर आता है .अब सभी उसके साथ खेलने लगते हैं वह अकेला नहीं रहता .पर उसकी माँ कहती है कि अब वह उसका बेटा स्वाभाविक स्कंक नहीं लगता बल्कि बनावटी खूशबू से युक्त है और उसे वापस जादूगर के पास ले जाकर वही दुर्गन्ध वापस दिलवा देती है .जब जादूगर ऐसा कर छड़ी नीचे रख पैसे ले रहा होता है स्कंक की माँ उसी छड़ी से जादूगर के सर पर वार कर बच्चे के साथ घर आ आती है .घर आकर बच्चे को प्यार कर कहती है “अब तुम मेरे असली बच्चे हो गए वही स्वाभाविक गंध के साथ ”
ह कहानी सुन कर बच्ची ‘जो’ नाराज़ हो कर कहती है “छड़ी से माँ को मारना चाहिए जादूगर को नहीं अब बेचारा स्कंक फिर से अकेला हो जाएगा “.पिता नन्ही बच्ची की भावना को समझते हैं फिर भी कहते हैं “बेटे,माँ हमेशा सही होती हैं .”और जब वह सो जाती है तो वे अपने कमरे में चले जाते हैं .

यह जॉन आबदाई की ‘ शुड विज़ार्ड हिट मॉमी ‘ शीर्षक कहानी है.जॉन आबदाई की कहानी हो या विष्णु शर्मा की पंचतंत्र कहानियां नैतिक सन्देश देती हैं.साथ ही इनके किरदार अधिकांशतः पशु और पक्षी ही होते हैं .कृष्णा की बाल लीलाओं में गौओं के किरदार हैं ,रामायण में वानर गरूड़ जैसे किरदार हैं .पंचतंत्र का प्राकृतिक सामाजिक वातावरण जिसमें पशु पक्षी प्रकृति को आधार बनाकर जीव दया ,नैतिकता तथा प्रकृति प्रेम का संस्कार भरा गया है.५०० वर्ष पूर्व ईरान के बादशाह खुसरू के महामंत्री ने पंचतंत्र को अमृत की संज्ञा दी थी.महामंत्री बीमार बादशाह के इलाज़ के लिए संजीवनी तलाशने भारत पहुंचा .काफी भटकने के बाद उसने यह जाना कि पंचतंत्र ही वह संजीवनी है जो मृत (अज्ञानी) को ज्ञान के अमृत से जीवित कर देता है.राजा अमर शक्ति ने अपने तीन पुत्रों को बुद्धिमानी की शिक्षा देने के लिए विष्णु शर्मा जी को निवेदन किया था और विष्णु शर्मा ने या काम छह महीने में पूरा करने का वादा किया.वे तीनों बच्चों को रोज एक नैतिक सन्देश के साथ पशु पक्षी के किरदार वाली कहानी सुनाते .सफलता.मानसिक दृढ़ता ,मित्रता ,एकता जैसे पाठ को राजा के पुत्र कहानियों के माध्यम से ही सीख सके.
कहानियां एक सेतु हैं जो वृद्ध और बच्चों को भावनात्मक रूप से जोड़े रखती हैं .आज की अपार्टमेंट ज़िंदगी में वृद्ध दादा दादी नाना नानी भले ही अपार्ट हो गए हों पर पशु-पक्षियों के किरदार वाली कहानियां टी वी में घुस कर भी नैतिक पाठ पढ़ा देती हैं.सुदर्शन फाकरी साहब की लिखी और स्वर्गीय जगजीत सिंह जी की गई ग़ज़ल की पंक्तियाँ याद आती हैं …
मोहल्ले की सबसे पुरानी निशानी
वो बुढ़िया जिसे बच्चे कहते थे नानी
वो नानी की बातों में परियों का डेरा
वो चेहरे की झुर्रियों में सदियों का फेरा
भुलाये नहीं भूल सकता है कोई
वो छोटी सी रातें वो लम्बी कहानी
वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी.

बच्चे चाहे मॉल संस्कृति के हों या मिल संस्कृति के ….स्मार्ट सिटी के या स्लम एरिया के …कहानियां उन्हें भाती ही हैं.पराग ,चम्पक ,नंदन के पुराने बचपन को भुला कर टी वी वीडियो गेम कंप्यूटर मोबाइल ने चाहे जितनी भी नवीनता लाने की कोशिश कर दी हो पर यह सत्य है कि कहानियों के पुरानेपन की खुशबू बचपन की माटी में आज भी रची बसी है उसे बस बारिश की एक पहली फुहार की दरकार है .वह बचपन के घर में जले धूप बत्ती की तरह है जो बुझ भी जाए तब भी फ़िज़ा को घंटों तक सुवासित किये रहती हैं.ये कहानियां ही तो हैं जिन्होंने चंदा को मामा और धरती को माँ कह कर प्रकृति को भी रिश्तोंमें बाँध दिया .बच्चों को संवेदनशील और व्यक्तित्व में गहराई लाने के लिए कहानियां बहुत ज़रूरी हैं.
यह एक मज़ेदार बात है कि चार पांच वर्ष के बच्चों के लिए लिखी जाने वाली कहानियों में किरदार मनुष्य नहीं बल्कि पशु पक्षी होते हैं.इसकी एक खास वज़ह है .छोटे बच्चे अत्यंत संवेदनशील होते हैं .उल्लिखित कहानी में अगर ज़ो के पिता ने अकेलेपन के दर्द ,सफाई के महत्व ,और माँ के हमेशा सही होने की शिक्षा किसी स्वयं के किरदार से दी होती तो ज़ो अपनी अभिव्यक्ति नहीं दे पाती.क्योंकि प्रतिदिन वह पिता को अलग – अलग किरदार में देखती है .कभी वह उसकी माँ के दोस्त हैं कभी उसके पिता पर स्कंक सिर्फ एक जानवर है अतः वह एक काल्पनिक जानवर से अपनी सोच के अनुसार तादात्म्य बिठा पाती है.बच्चों को पशु पक्षी में रुचि ज्यादा होती है और वे उनके प्रति जिज्ञासु भी होते हैं.जैसा कि खलील ज़िब्रान कहते हैं ,“तुम बच्चों को अपना प्रेम भले ही दे दो लेकिन अपना विचार मत दो क्योंकि तुम्हारे अनुभव उनके समय तक पुराने हो चुके होंगे ,तुम उनके शरीरों को भले ही घर में रखो पर उनकी आत्माओं को नहीं क्योंकि उनकी आत्माएं भावी भवन में रहती हैं वहां तक नहीं पहुँच सकते तुम-स्वप्न में भी नहीं .”
आठ से नौ वर्ष के बच्चे खरगोश बन्दर भालू हाथी को इंसानी विचार और भाषा में समझ पाते हैं और कहानी के सन्देश को याद रखते हैं.वे पशुओं को इंसानी बोली और वेश भूषा में देख पढ़ कर मस्ती भी कर पाते हैं.अपने साथ के दोस्तों या मनुष्यों को वे ऐसे फनी रूप में स्वीकार नहीं कर पाते हैं.अपने आस पास के मनुष्यों को वे बेहद विरोधाभासी पाते हैं .उन्हें समझ नहीं आता कि रोज़ पान तम्बाकू खाने वाले पापा उसे चॉकलेट खाने से मना क्यों करते हैं.वे घर पर होते हुए भी दरवाज़े पर खड़े अंकल को यह कहने के लिए क्यों बोलते हैं कि वे घर पर नहीं है.किशोर वय के बच्चों को तेनालीराम ,अकबर बीरबल या जासूसी कहानियां अच्छी लगती हैं क्योंकि बुद्धिमानी के साथ साथ एक तिलिस्म एक कल्पना भी उनकी ज़िंदगी का हिस्सा बन जाती है. रुडयार्ड किपलिंग की ‘जंगल बुक’(१८९४-९५) में वास्तविक जानवरों के साथ इंसानी रिश्ता दिखाया गया है.मोगली मानव बच्चे का जंगल में जानवरों के साथ रहना वैसा ही व्यवहार करना जहां चार -पांच साल के बच्चों को उत्सुकता से भर देता है क्योंकि वे बहुत जिज्ञासु होते हैं .वहीं आठ नौ साल के बच्चे को मस्ती से और किशोर वय के बच्चे मानवी विकास में वातावरण के महत्व को समझ पाते हैं.
कुछ लोगों का यह मानना है कि फंतासी कहानियां या पशु पक्षी को असली स्वाभाविक रूप की बजाय इंसानी वेश भूषा तथा आवाज़ में प्रस्तुत करना बच्चों में पशु पक्षियों के प्रति गलत ज्ञान को विकसित करेगा .बच्चा और भी कंफ्यूज होगा .उल्लू कहानियों में बुद्धिमान पक्षी है फिर एक विज्ञापन यह क्यों कहता है कि “अब उल्लू बनना कोई अच्छी बात तो है नहीं “साथी को उल्लू का पट्ठा बोलने पर मार क्यों मिलती है.लोमड़ी चालाक ही क्यों है .ऐसे कई प्रश्न उसे भ्रमित कर सकते हैं.पर ये दलीलें पूर्णतः स्वीकार्य इसलिए नहीं हैं कि कहानी का मुख्य उद्देश्य बच्चों का मनोरंजन करना है और कहानी में ज्ञान और नैतिकता की ज़रुरत वैसे ही जैसे प्रथम कदम के बाद दूसरा कदम खुद ब खुद उठ जाए ताकि गति को कायम रखा जा सके .

कहानियां ज़रूरी हैं .आज कंप्यूटर इंटरनेट टी वी मोबाइल ने बेशक बच्चों को तीक्ष्ण मस्तिष्क ,तेज तकनीक ज्ञान के दहकते रंग दे दिए हैं पर वे इस रंग से पलाश(ढाक,टेशू,किंशुक ) के दहकते फूल बन कर ना रह जाएं यह सजगता ज़रूरी है.हमें बच्चों को गुलाब बनाना है जिनमें तकनीक ज्ञान की सुंदरता के साथ साथ मासूमियत और मस्ती की खूशबू भी हो और इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए कहानियों से नाता जोड़ना ज़रूरी है.

बचपन आज भी ज़िंदा है
लॉन में कीट पकड़ती किशोरी में
गुल्लक तोड़ पैसे निकालती युवती में
आटे की लोई से चिड़िया बनाती गृहणी में
बन्दूक में गुलेल तलाशते संतरी में
पहाड़ों की बर्फ पर फिसलते वयस्क में
कार खड़ी कर बारिश में भीगते अफसर में
उपेक्षित होकर भी राह तकते प्रेम में
और रोज़ कहानी सुनती सुनाती मुझे में
तुम सुनो ना सुनो
तुम कहो न कहो
पर मुझे बेहद फिक्र है उस बचपन की
जो चिर निद्रा में सो जाएगा
बचपन गूगल चिल्ड्रन का जाने
किस दुनिया में खो जाएगा .



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
April 21, 2015

कहानी का मुख्य उद्देश्य बच्चों का मनोरंजन करना है और कहानी में ज्ञान और नैतिकता की ज़रुरत वैसे ही जैसे प्रथम कदम के बाद दूसरा कदम खुद ब खुद उठ जाए ताकि गति को कायम रखा जा सके ! बिल्कुल सही कहा है आपने ! बहुत सुन्दर और विचारणीय लेख ! आपने बचपन की याद दिला दी ! दादी, नानी और मौसा जी से सुनी कहानियां अब भी बहुत याद आती हैं ! सोचता हूँ कि उन्हें यादकर लिपिबद्ध करूँ ! मुझे याद है कि जो बुजुर्ग कहानी नहीं सुनाते थे, उनके पास जल्दी जाते ही नहीं थे ! अक्सर कहानी सुनते सुनते सो जाते थे ! आभार और शुभकामनाओं सहित- सद्गुरुजी !

yamunapathak के द्वारा
April 14, 2015

aadarneey dixit jee aur रजनी जी आप दोनों का अतिशय आभार

rajanidurgesh के द्वारा
April 6, 2015

यमुनाजी सच है कहानियां जो बच्चों के मन पर ही नहीं बल्कि बड़ों के मन पर भी अमिट छाप छोड़ देता है. अच्छी रचना.

OM DIKSHIT के द्वारा
April 4, 2015

आदरणीया यमुना जी, एक यथार्थ और सामयिक प्रस्तुति.


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