Aatamaabhivyakti

extremely CRUDE ; completely PURE

244 Posts

3093 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 9545 postid : 863343

कुछ कविताएँ "तली, भुनी ,भाप में पकी और तवे पर सीकीं "

Posted On: 21 Mar, 2015 Others,कविता में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

हम गृहणियां कुछ बातें  रसोई में भोजन पकाते वक़्त भी सोचती रहती हैं ….कभी राशन की डायरी तो कभी कैलेंडर पर और

फिर कभी फुर्सत में यूँ ही संभाल कर रखी डायरी में इन्हे लिख  कर संजो लेती हैं …….

और ये ही बन जाती हैं …..”तली, भुनी ,भाप में पकी और तवे पर सीकीं ” कुछ कविताएँ


1)
पारदर्शिता

ज़िंदगी होनी चाहिए
एक खुली किताब सी
क्लब लाइब्रेरी में
कहा एक वयोवृद्ध ने

पर कहते हैं… …
चली जाती है विद्या
किताब खुली रख छोड़ने से
वहीं पास खड़ी
मासूम किशोरी बोल उठी

पारदर्शिता ‘पर ब्लॉग लिखती
मेरी लेखनी भी ठिठक गई
…..!!!!!……
मानूं किस बात को मैं
परिपक्व विश्वास को
या
मासूम अन्धविश्वास को

2)
वक़्त धारा नहीं ; बूँद  है


लोग कहते हैं
बहे जा रहे हैं
हम वक़्त की धारा में
पर वक़्त धारा में
होता ही नहीं
यह तो है टूटा बूँद बूँद में
बिन्दुओं में टूटी ……
किसी पंक्ति की तरह
ज़िंदगी में घटनाएं तो
घटती हैं क्षण क्षण में
वक़्त नहीं है मेरे पास
कुछ भी गैर ज़रुरी
कहने और करने के लिए
क्योंकि
मुझे वक़्त धारा में नहीं
बल्कि बूँद में दिखता है

3)
सर्वाधिक आकर्षक-चार स्थान

कब्रिस्तान…रेलवे स्टेशन
बस स्टॉप और हॉस्पिटल
सर्वाधिक आकर्षक
मिलन-बिछडन के केंद्र
जीवन को रूलाते-हँसाते
पुनर्जीवित -पोषित करते
उजागर करते
जीवन के दो विपरीत पक्ष को
और साम्यता के कटु सत्य को.
यह सच है ….कि ये चार स्थान
वक़्त के साथ बहते
इस जीवन के
सबसे बड़े साक्षी हैं

4)
अपना ख्याल रखना

स्कूल जाने को कदम बढ़ाते ही
माँ ने कहा “अपना ख्याल रखना”
दूर कॉलेज के गेट पर छोड़ते ही
भाई ने कहा “अपना ख्याल रखना ”
विदाई वक़्त सर पर हाथ फेरते ही
पिता ने कहा”अपना ख्याल रखना ”
घर को रोज़ सहेजते देखते ही
हमसफ़र ने कहा “अपना ख़्याल रखना”
हॉस्टल जाते नमी आँखों में देखते ही
बिटिया ने कहा”अपना ख्याल रखना”

बहुत सुकून दते हैं ये तीन शब्द
हम नहीं अकेले कहते ये तीन शब्द
जब जब सुना मैंने यह तीन शब्द

हाथ जोड़े देखा आकाश को औ कहा
“प्रभु ,इन सब का तू ख्याल रखना ”

5)

अंतिम एक प्रश्न ….

नारी …
धर्मग्रन्थ के पन्नों पर
है अत्यंत पवित्र
संगमरमर की दिव्य मूरत सी
फिर रोज़ रोज़ उसे
रेत के घरौंदों सा
बनाने और तोड़ने का कसूर क्यों ???

नारी….
हर रिश्ते के फ्रेम में
सलीके से फिट
आकाश में जड़े सितारों सी
फिर किस असावधानी से
कांच के टुकड़ों सी
टूटती होती चकनाचूर यों ???

नारी…..
वक्ता के भाषण में
है अत्यंत उन्नत
पर्वत के शिखर सी
फिर एक नदी सी मज़बूर
नीचे घाटियों में
बहने का दस्तूर क्यों ????

नारी….
अपनी लेखनी में
है बेहद मज़बूत
दरख़्त की जड़ों सी
फिर हकीकत में पत्तियों सी कमज़ोर
हल्की हवा से ही
काम्पने को मज़बूर क्यों ??

अंतिम एक प्रश्न ….
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते
रम्यते तत्र देवता (जहां स्त्रियों की पूजा होती है वहां देवता निवास करते हैं )
फिर सारी गालियां
माँ,बहन,बेटी के
रिश्तों से जुडी क्यों ??

6)
पहचान की पहचान

अपनी पहचान होती है
उस हाथी की तरह
जिसे ….सात अन्धे
अपने अपने ही ढंग से
पहचानने का करते प्रयत्न
अज्ञानता की चरम सीमा तो यह
कि उन सात अंधों में
एक स्वयं ही गिने जाते हैं हम
क्या इतनी मुश्किल है
पहचान की पहचान में
फिर प्रश्न तो यह भी
रह जाएगा अनुत्तरित ही
“पहचान की वास्तविक पहचान कौन करे ?”

-यमुना



Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (2 votes, average: 3.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

12 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
April 1, 2015

आदरणीया यमुना जी ..बहुत सुन्दर रचा आप ने ..एक से बढ़ एक…सुन्दर जज्बात अज्ञानता की चरम सीमा तो यह कि उन सात अंधों में एक स्वयं ही गिने जाते हैं हम क्या इतनी मुश्किल है पहचान की पहचान में भ्रमर ५

DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
March 26, 2015

सभी भावभिव्यक्तियां अति उत्तम सन्देश प्रेषित कर रही हैं .बधाई यमुना जी .

yamunapathak के द्वारा
March 26, 2015

आदरणीय वैद्य जी,जवाहर जी ,विजय जी बिष्ट जी,आदरणीय शोभा जी ,निर्मल जी , आप सब का बहुत बहुत धन्यवाद ,विजय जी (गुंजन जी आप ने मुझे अकविता की रह दिखाई थी सदैव आभारी हूँ ,जवाहर जी आप की धर्मपत्नी जी की बात मुझे बहुत अच्छी लगी ) शोभा जी निर्मल जी आपकी प्रतिक्रिया प्रेरणा देती है .वैद्य जी आपने गहनता से कविता पढ़ी और प्रेरणा दी आभारी हूँ आप सब की साभार

vaidya surenderpal के द्वारा
March 24, 2015

मन की भावनाओं का यथार्थ चित्रण किया है आपने इन कविताऒ मे, यमुना जी सादर .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 23, 2015

ज़िन्दगी की बारीकियों को बहुत करीब से अनुभव किया और संजीदगी से कविता में ढाल दिया ,यमुना जी सादर .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 23, 2015

जन्दगी की बारीकियों को बहुत करीब और संजीदगी से कविता में ढाल दिया ,यमुना जी सादर .

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
March 23, 2015

आदरणीय यमुना पाठक जी, बेहद भावपूर्ण और जिंदगी के तमाम पहलूओं को रेखांकित करती यह सुदंर कविताएं बहुत अच्छी लगीं । ” अपना ख्याल रखना ” और आकर्षक चार स्थान , पढ कर सोचने को मजबूर करती हैं । गहन चिंतन है आपका । बस ऐसे ही सुदंर सुदंर कविताएं लिखती रहें, शुभकामनाएं ।

    yamunapathak के द्वारा
    March 26, 2015

    बिष्ट जी आपने जिन कविताओं की बात कही वह भावना सच में अजीब से उथल पुथल के साथ जग जाहिर हुई मुझे लगता है हम सब ऐसा अवश्य सोचते हैं …..आपका बहुत बहुत आभार

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
March 22, 2015

सुन्दर निर्बंध अभिव्यक्ति के लिए यमुना जी ! आप को बधाई ! सादर !!

jlsingh के द्वारा
March 22, 2015

लाजवाब! क्या इतना काफी नहीं है? कब बदलेगा यह समय ?

    jlsingh के द्वारा
    March 24, 2015

    वैसे कभी कभी मेरी पत्नी श्री भी ऐसी ही ”तली, भुनी ,भाप में पकी और तवे पर सीकीं ” कुछ कविताएँ या कविता जैसी सुना देती हैं …ये बात अलग है कि मेरे मूड पर निर्भर करता है कि उसे सजाऊँ संवारूँ या वाक्युद्ध करूँ… बिलकुल नपी तुली व्यंग्यात्मक …सोचने पर मजबूर भी करती है …आखिर हम पुरुष ऐसे क्यों हैं…और महिलाएं सहनशीलता की पराकाष्ठा …

Shobha के द्वारा
March 22, 2015

प्रिय यमुना जी मैने आपकी अपनों प्रतिक्रिया पहले ही दे दी थी परन्तु आज कल जागरण वाले उदासीन हैं फिर से लिख रही हूँ आपकी कविताएँ तली भुनी भाप में पकी तवे पर तपी सभी बहुत सुंदर हैं पहचान की वास्तविक पहचान कौन करे ? शी भाव डॉ शोभा


topic of the week



latest from jagran