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वीकनेस फॉर 'वेल्थ,वाइन एंड वीमेन'

Posted On: 10 Mar, 2015 Others,social issues,Junction Forum में

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गुफा युग ( cave ) से ग्राफ़िक युग ( computer ) तक के सफर की राह क्या इतनी पथरीली ,खुरदरी ,उबड़ खाबड़ रही कि

इस विकास की छद्म यात्रा में इंसानी रिश्ते ही सर्वाधिक लहूलुहान होते गए .

from the age of cave to computer

from the age of cave to computer

यु के बेस्ड लेस्ली उडविन की डाक्यूमेंट्री ‘इंडिया’ज़ डॉटर ‘( india’s daughter ) के प्रसारण से उपजे विवाद ने मुझे इस दिशा में सोचने को विवश कर दिया है.निर्भया के बलात्कारी अभियुक्त मुकेश के बयान ,दो वकीलों की टिप्पणी और इन दोनों पर बहस ने कम्प्यूटर युग के मानव को केव युग के मानव से भी असभ्य और बर्बर साबित कर मानसिक और आत्मिक विकास पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है.गुफा युग का मानव तो फिर भी कठिन काम से बचे अपने वक़्त को गुफाओं की दीवारों पर चित्रकारी कर व्यतीत करता था इस तथ्य के ऐतिहासिक प्रमाण मौजूद हैं .पर आज कुछ कुत्सित मानसिकता के लोग अपने खाली वक़्त को वेल्थ वाइन और वीमेन (wealth,wine,women )के प्रति वीकनेस (weakness )में ज़ाया करते हैं और यह वीकनेस उनके वॉलेट,विल और विजडम (wallet,will ,wisdom)से भी ज्यादा स्त्रियों के हालात को बद से बदतर worse कर समाज का सर्वाधिक अहित करती है.
शराब,शवाब और स्वर्ण की चाहत उसे इस कदर मदांध कर देती है कि प्रत्येक चीज़ पर प्रयोग कर उसे आज़माना बहुत सुकून देता है .और उसे इस गलती का पश्चाताप तक नहीं होता .

भारतीय समाज की छवि इस डोक्युमेंटरी से विश्व में किस तरह प्रतिरूपित होगी यह …बी बी सी के इंटरव्यू की इज़ाज़त देने के पूर्व सोचना था .अब बवाल मचाने से कोई फायदा नहीं.इंटरव्यू लेकर कोई उसे तहखाने में नहीं रखता वह लोगों के लिए प्रसारित भी किया जाता है ताकि जनता समझे और विचार करे .भारत सरकार के गृह मंत्री राजनाथ सिंह जी ने आश्चर्य किया कि इंटरव्यू लेने की अनुमति कैसे मिली तिहाड़ जेल के डायरेक्टर अलोक कुमार वर्मा को समन भी जारी किया गया .लोगों का मानना है इंटरव्यू की इज़ाज़त देना निर्भया के अभिभावकों का अपमान है .

कई लोगों ने प्रश्न उठाया कि विदेशों में भी बलात्कार होते हैं वहां भी महिलाओं के छोटे कपडे पहनने बार जाने शराब पीने को उनके बुरे चरित्र और बलात्कार को आमंत्रित करने से ही जोड़ कर देखा जाता है क्या ऐसे अपराधियों की मानसिकता को उडविन वहीं रह कर नहीं समझ सकती थी ? पर चूँकि निर्भया से जुड़ा दुष्कृत्य विदेश के कई अखबारों की सुर्खी बन चुका था और भारत की छवि रेप कंट्री दिल्ली रेप कैपिटल के रूप में जाना जाने लगा था अतः इंटरव्यू लेने के आकर्षण के पीछे की यह भी एक वज़ह हो सकती है.यह भी सच है कि बार बार प्रतिदिन प्रति घंटे होने वाले दुष्कृत्य की वज़ह जानने के लिए कई लोगों ने इसे शोध का विषय बना लिया है.लेस्ली उडविन भी अपराध,अपराधी और उस सामाजिक परिवेश जिसमें यह अपराध हुआ इसी बिंदु पर शोध कर रही थीं.दो बच्चे और पति को छोड़ दो वर्षों से इस फिल्म के लिए लगी उद्वीन को लोगों का इस दुष्कृत्य के विरोध में आश्चर्य जनक ढंग से सडकों पर ( Enough is Enough ) की आवाज़ के साथ आना प्रेरक लगा और उसने डोक्युमेंटरी बनाना शुरू किया .
मुकेश (बस चालक अभियुक्त )ने वही कहा जो उसके दिल दिमाग में चल रहा था ,है और चलेगा ???उसने महिलाओं को रात में घर से बाहर निकलने ,दुष्कृत्य का विरोध करने की वज़ह से निर्भया को जान से मार देने की दलील देकर अपने दुष्कृत्य को इतने दिन जेल में रहने के बाद भी सही ठहराया वह बेहद निंदनीय है.उसने यह भी कहा कि दुराचार के बाद महिलाओं को जान से मार देना चाहिए ताकि दुष्कृत्य का कोई गवाह ही ना रह पाये.यह निंदनीय जुबान उसके परवरिश की परिणति है और परिवेश का प्रतिफल.मुकेश से मिलते जुलते बयान कई खाप पंचायत ,देश के कुछ इन गिने नेता भी दे चुके हैं .यह भी सच है कि देश की सड़कें गलियाँ बाज़ार महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं हैं .वकील ए पी सिंह से भी जब रेडियो जॉकी गिन्नी ने यह जानना चाहा कि ऐसे दुष्कृत्य में लिप्त अभियुक्त का केस क्यों कर ले रहे हैं तो उन्होंने भी महिलाओं को ही जिम्मेदार ठहराया और कहा कि अच्छे चरित्र वाली महिलाओं के साथ दुष्कृत्य नहीं होते .अब उन्हें कौन बताये कि देश में छोटी कन्याओं से लेकर वृद्धा तक सुरक्षित नहीं हैं.उन्होंने पहले भी एक इंटरव्यू में कहा था कि अगर उनकी बहन बेटी का चारित्रिक पतन हुआ उन्होंने खानदान की मर्यादा भंग की तो वे फार्म हाउस लेजा कर पूरे परिवार के सामने उन पर पेट्रोल छिड़क कर उन्हें ज़िंदा जला देंगे .
ज़रुरत मुकेश और वकीलों के बयान की भर्तसना इस पर मंथन , वाद विवाद के साथ इस बात पर भी मंथन स्वस्थ बहस और सही क्रिया कलाप की भी है कि देश के कोने कोने में छुपकर बैठे पोर्न वीडियो देख शराब पीकर अपने यौनेच्छा को दमित कर शिकार ढूंढने और फिर इसे व्यवहारिक रूप देने वाले दिशाहीन दिग्भ्रमित युवाओं की मानसिकता का परिष्करण कैसे किया जाए ???
पुस्तकालय,खेल के मैदान,अखाड़े ,जिमखाना थियेटर ,नुक्कड़ सब कुछ मोबाइल में कैद हो गए है एक क्लिक पर अवांछनीय और अनैतिक कही जाने वाली सामग्री सहज उपलब्ध है.मुकेश और उसके साथ के अभियुक्तों ने भी स्वीकारा था कि दुष्कृत्य को अंजाम देने से पूर्व उन्होंने अश्लील वीडियो क्लिप्स देखे थे और शराब पी थी .कल ही fb पर छह वर्षीय बच्ची के साथ पाशविक तरीके से अनाचार की खबर पढ़ी .गलत मानसिकता वाले ऐसे किसी भी क्लिप्स को देख कर उसे प्रायोगिक रूप से करना चाहते हैं .अब ऐसे में उन्हें किस तरह इन अनैतिक बर्ताव से दूर रखा जाए .घर परिवार समाज को यह जिम्मेदारी लेनी होगी .रचनात्मक कार्यों में रूझान विकसित करना ज़रूरी है .पर जहां जनसँख्या का एक विशाल तबका अशिक्षित अभावग्रस्त है वहां यह पहल कोरी कल्पना ही होगी.मुश्किल यह भी कि पहले माना जाता था कि ऐसे अपराध गरीबी की वज़ह से होते हैं क्योंकि ‘अभाव में स्वभाव बदल जाता है .पर आज तो अमीर मध्यम गरीब सभी वर्ग के बुरी मानसिकता वाले पुरुष ऐसे दुष्कृत्य से संकोच नहीं करते .

इस डोक्युमेंटरी को प्रसारित करने की बात को लेकर भी समाज दो वर्ग में बँट गया है .वेब पोल के अनुसार ६४.६३ % लोगों का कहना है “इस डोक्युमेंटरी को प्रतिबंधित करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विरुद्ध होगा ,समाज को बलात्कारी की मानसिकता से परिचित होने के लिए इसे ज़रूर देखना चाहिए .जबकि ३३.७१ % के दूसरा वर्ग कहता है ‘इसे प्रसारण की अनुमति देना मुकेश जैसी क्षुद्र मानसिकता को पोषित करना होगा और इससे महिलाओं के प्रति दुर्भावना और बढ़ जाएगी .१.६५ % इस सम्बन्ध में अनिश्चय की स्थिति में रहे .कांग्रेस स्टेट प्रेजिडेंट सुखदेओ भगत का कहना है इसे प्रतिबंधित ना करने से मुकेश को अनावश्यक रूप से प्रचार मिलेगा .सच है ‘बदनाम होंगे तो क्या नाम ना होगा ‘ पर ऐसा प्रचार संवेदनशील जनता बहुत गंभीरता से लेती है दीमापुर की घटना इस बात का ताज़ा उदहारण है.मुकेश जैसे लोगों के लिए न्याय करने में जनता को तनिक भी देर नहीं लगती है. यह अलग बात है कि इस तरह के जनता न्याय को भी सभ्य समाज में उचित नहीं ठहराया जा सकता है.परन्तु सुखदेओ जी की इस बात से सहमत हुआ जा सकता है कि ऐसी घटनाओं को बहुत महत्वपूर्ण न बनाया जाए , ना ही बहुत वाद विवाद कर इसे हाइप दिया जाए .यह समाज के लिए अच्छा नहीं है.

क बलात्कारी की मानसिकता क्या होती है यह कौन सा समाज नहीं जानता है ??.द्रौपदी से लेकर दामिनी तक पुरुषवादी झूठा अहंकार , स्त्रियों को पतंग मान डोरी अपने हाथों में रखने वाला पुरुष मन जब मदांध भी हो जाए तो स्त्रियों की शारीरिक बनावट ,मातृत्व धारण करने की शक्ति ,समाज की दकियानूस सोच पुरुष को और भी दुस्साहसी बना देती है .वह स्त्री की शक्ति को ही उसकी कमजोरी बना देता है .जिस समाज में स्त्रियों को पल पल उनके खुद के ही शरीर की सुरक्षा को लेकर भय बिठा दिया जाए बलात्कार का भय ,एसिड अटैक का भय ,जिन्दा जला दिए जाने का भय वहां अप्रत्यक्ष रूप से पुरुष को समस्त शक्तियां हस्तांतरित कर दी जाती हैं.फिर घर परिवार समाज में किसी भी निडर स्त्री का सामना उसे स्वस्तित्व के लिए भयभीत करता है और जो पुरुषत्व उसे स्वयं को और निखारने के लिए अपेक्षित है उसे वह स्त्रियों के व्यक्तित्व को बिगाड़ने में दुष्प्रयोग करता है.और यही इस अपराध के पीछे शर्मनाक कड़वी पर बेहद सच वज़ह है.

मुझे कई प्रश्न रह रह कर चुभते हैं ….

1) प्रत्येक वस्तु ,परिस्थिति में स्वानुशासन और अनुशासन का पाठ मोबाइल मूवी और कंप्यूटर के प्रयोग में भी क्यों नहीं है ?
2) शराब,तेज़ाब की सहज उपलब्धता को क्यों नहीं रोका जाता ?
3) परदेश में पड़ोसी हमदर्द क्यों नहीं बनते ?
4) व्यक्ति में रचनात्मकता विकसित करने की जिम्मेदारी किसकी है …स्वयं व्यक्ति की ,परिवार की ,समाज की या फिर तीनों की ?
5) लड़कों को जिम्मेदार विहीन बनाने की सामाजिक परंपरा के लिए जिम्मेदार कौन है ?
6)
पुरुष महिलाओं के निर्णय, रहन सहन ,व्यक्तित्व को अपने फ्रेम में ढलने को कब तक विवश करता रहेगा ?

सच है…

काचौंध के जंगल में मानव
राह मनुष्यता की भूल रहा
मरे फूल संवेदनाओं के सारे
बचा सिर्फ अब शूल रहा

तार तार हुई इंसानियत अब
काल कोठरी में सिसक रही
अब कहावत नहीं कहने को कि
जमीन पाँव से खिसक रही

विवेकहीन संवेदना लूटा मानव
गोश्त अपनों के ही है खा रहा
गुफा युग से चल ग्राफ़िक तक आ
है इतिहास भी अब शर्मा रहा

कहते जिन्हे हम पशु वे भी नहीं
अनायास बेवज़ह करते हैं वार

पशु से भी हुआ बदतर आदमी
कर हत्या लूट और व्याभिचार .

नोट : कुछ जानकारियां नेट से ली गई हैं .शेष स्व विचार



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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
March 20, 2015

आदरणीया यमुनाजी, सादर अभिवादन! चिंतनीय विषय पर गंभीर शोधपूर्ण आलेख के लिए आपका अभिनन्दन! आपने बहुत सारे कारण गिनवाए पर न्यायपालिका की तरफ आपकी कलम न चल सकी …सजायाफ्ता कैदी को संग्रहालय में रखने की प्रवृत्ति आखिर कब तक रहेगी. क्या न्यायाधीश महोदय के पास ज्ञान की कमी है जो इस तरह के संगीन और क्रूरतम मामले को स्थगित रखने का तात्पर्य क्या है? और इस चर्चित विडिओ और दीमापुर की घटना से भी वे न्यायविद अनजान है? उनके उपर कोई उंगली उतहये तो न्यायपालिका की अवमानना, और सेवामुक्त होने के बाद काटजू की तरह प्रलाप ..ऐसे ही जज समांज का हित कर पाएंगे.? काम पढ़े लिखे की मानसिकता पर सवाल उठाना आसान है पर पढ़े लिखे लोग ही तो पोर्न फ़िल्में बनाकर ब्यवसाय कर रहे हैं और उनको अनुमति देनेवाले भी अनपढ़ तो नहीं.

    yamunapathak के द्वारा
    March 20, 2015

    aadarneey jawahar ji aapkee baat bahut sahee aur ligical bhi hai .सजायाफ्ता कैदी को संग्रहालय में रखने की प्रवृत्ति आखिर कब तक रहेगी. क्या न्यायाधीश महोदय के पास ज्ञान की कमी है जो इस तरह के संगीन और क्रूरतम मामले को स्थगित रखने का तात्पर्य क्या है?…..पढ़े लिखे लोग ही तो पोर्न फ़िल्में बनाकर ब्यवसाय कर रहे हैं और उनको अनुमति देनेवाले भी अनपढ़ तो नहीं. main aapki bat se pura itfak rakhati hun. sabhar

yamunapathak के द्वारा
March 16, 2015

बिष्ट जी आपकी बात से सहमत हूँ

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
March 16, 2015

यमुना जी अभिवादन । दर-असल इस मुद्दे पर समाज पूरी तरह दो हिस्सों मे बंटा हुआ है । महिलाएं जिनमे 99% की सोच एक्तरफा है और पुरूषों मे थोडा संतुलिए स्थिति है लेकिन इतना भी नही जितना ऊपर से दिखाई दे रहा है । इसमे पाखंडपूर्ण व्यवहार भी शामिल है । मुंह मे कुछ और दिल मे कुछ । रही बात बी.बी.सी की तो उसके पहले तो भारतीय मीडिया जिम्मेदार है । ऐसा तमाशा बनाओगे तो कोई भी डाक्यूमेंट्री बनाने आयेगा । इस तमाशे के कारण ही दीमापुर मे एक बेकसुर मारा गया । बलात्कार को तमाशा बनाने मे सभी का अपना अपना हित है । वरना सामाजिक समस्याएं तो और भी हैं और कम गंभीर नही । शहरों मे बुजुर्गों की बढती हत्या, बच्चों का यौन शोषण, अवसाद की बढती प्रवत्ति के कारण हो रही आत्महत्याएं , शहरों मे देह व्यापार का फैलता जाल , और भी तमाम । लेकिन वहां कुछ नही, बलात्कार को लेकर सारी चिंताएं हैं । मुझे तो मीडिया और समाज का यह व्यवहार ही समझ मे नही आ रहा ।

Shobha के द्वारा
March 12, 2015

प्रिय यमुना जी बहुत डिटेल में लिखा गया बहुत अच्छा लेख हमरी संस्कृति उत्तम संस्कृति रही हैं परन्तु रेपिस्ट और उनके वकीलों की मानसिकता ने मन को दुखी कर दिया डॉ शोभा

yamunapathak के द्वारा
March 12, 2015

अमीषा जी आपकी बातों से १००% सहमत हूँ. साभार

Amita Srivastava के द्वारा
March 12, 2015

यमुना जी आपकी लेखनी को नमन .कंप्यूटर के इस युग मे नेट द्वारा परोसी अनैतिक निम्न स्तरीय चीजो पर पूर्ण प्रतिबंध लगना अति जरूरी है| धन्यवाद


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