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सूट की ‘सियासत’ पर संजीदगी

Posted On 24 Feb, 2015 Junction Forum, Others, Politics में

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मैं चाहे ये पहनूं मैं चाहे वो पहनूं “मेरी मर्ज़ी “

पर नहीं ….

कितना सुकून था जब बिलकुल गुमनाम सा था मैं

अब शोहरत जो मिली मेरी मर्ज़ी ही अपनी ना रही

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चर्चित व राजनीतिक विवादों में रहा बंद गले वाला सूट शुक्रवार को तीन दिनी नीलामी के अंतिम दिन यहां 4.31 करोड़ रुपये में नीलाम हो गया। पिन लगे इस नीले रंग के इस खास सूट को सूरत के हीरा व्यापारी लालजीभाई पटेल और उनके बेटे हितेश पटेल ने खरीदा।
पद पर रहते किसी प्रधानमंत्री को मिले तोहफों की यह पहली नीलामी थी। यह सूट दुनिया का दूसरा सबसे महंगा सूट बन गया है। सबसे महंगे सूट पर जहां आधे कैरेट के 500 हीरे जड़े हैं, वहीं मोदी के इस सूट पर केवल मोदी का नाम है। जिला कलेक्टर राजेंद्र कुमार ने शुक्रवार शाम ठीक पांच बजे नीलामी समाप्त करने की घोषणा की और बताया कि सूट 4.31 करोड़ में धर्मानंद डायमंड कंपनी के लालजी पटेल व उनके बेटे हितेश पटेल ने खरीद लिया।
इस रकम का इस्तेमाल गंगा नदी की सफाई में किया जाएगा।हितेश ने कहा कि पता नहीं था, इतने कम पैसे में हमें सूट मिल जाएगा। अंतिम दिन सूट की बोली 2.05 करोड़ से शुरू हुई और शाम चार बजे 2.85 करोड़ तक पहुंची। आखिरी घंटे में 1.46 करोड़ रुपये बढ़कर 4.31 करोड़ पर समाप्त हुई।

कलेक्टर ने बताया कि सूट के लिए 5 करोड़ रुपये की बोली भी लगी, लेकिन यह समय सीमा शाम 5 बजे के बाद आई, इसलिए इसे स्वीकार नहीं किया गया।
(प्रतिष्ठित दैनिक जागरण से संकलित खबर)

ऐसा नहीं कि मोदी जी ने पहली बार अपने उपहारों को नीलामी के लिए रखवाया और अर्जित रकम जन हित की योजनाओं में लगाने की सोच रखी है वे पहले भी ऐसा कर चुके हैं.गुजरात में जब वे मुख्य मंत्री थेय उन्होंने उपहार में मिली 18,000 वस्तुओं की नीलामी करवा कर अर्जित रकम को बालिका शिक्षा के लिए दिया था.परन्तु सूट की कीमत को दिल्ली के चुनाव में एक अहम विवाद के तौर पर प्रचारित किया गया और ये बुरे परिणाम के साथ अच्छा भी हुआ क्योंकि इससे सूट का महत्व और भी बढ़ गया वरना बहुत अधिक कीमत के सूट/साड़ी/कपडे /शाल कई अमीरों और नेताओं के पास अवश्य होंगे .हाँ ,अगर उन्होंने नीलामी में उसे लगवाये तो कितनी रकम की बोली लगेगी यह अंदाज़ा लगाने के पहले उन कपड़ों को चर्चा का विषय बना कर प्रचार करना ज़रूरी है . यह बात भी गौर तलब है कि मोदी जी के ड्रेसिंग स्टाइल के मुरीद बराक ओबामा जैसी शख्शियत भी हैं .कुछ नेताओं ने इसे डैमेज कंट्रोल पब्लिक रिलेशन कहा और अगर यह सही भी है तो भी मोदी जी की लोकप्रियता इसलिए कम नहीं होनी चाहिए क्योंकि एक परिपक्व नेता /प्रधान सेवक की तरह वे अपनी जनता के प्रति जवाबदेह और संवेदनशील हैं अगर आम जनता को उनकी कोई बात पसंद नहीं तो वे उस बात का कोई हल निकालना पसंद करते हैं ना की मीडिया में बयान देना .
नीलामी में सूट को रखना मोदी जी का निर्णय है .यह भी कहा जाता है कि पांच हज़ार से ऊपर के उपहार सरकारी तोशाखाने में रखे जाते हैं .ऐसे कितने उपहार हैं जो तोशाखाने तक पहुँच ही नहीं पाते या पहुँच कर सिर्फ संग्रह किये जाते हैं उनसे धन generate ही नहीं होता है .मुद्रा से ही मुद्रा generate होती है पर इसके लिए उसे चलन में लाना ज़रूरी है.
उपहारों को संग्रहालयों में आम जनता के दर्शनार्थ रखने से भी धन अर्जन होता है क्योंकि जनता टिकट खरीद कर ही संग्रहालयों में जाती है .और यह धन सरकारी खजाने में जाता है जो संग्रहालय के रख-रखाव में लगाया जा सकता है.यह धन अर्जन की दीर्घकालीन फुटकर विधि हो सकती है. और नीलामी से एकमुश्त त्वरित धन अर्जन होता है .जिसे अधिक और त्वरित ज़रूरी जन हित के काम में लगाया जा सकता है .क कहावत है “अगर आप के पास धन नहीं है तो आप औरों के धन का इस्तेमाल करिये .” आज जब गंगा को निर्मल बनाने के लिए अधिकाधिक धन की ज़रुरत है ऐसे में किसी कडोरपति से धन माँगने पर वह देगा ऐसा शत प्रतिशत दावा किया नहीं जा सकता .सूट की बोली लगाने वालों ने गंगा सफाई अभियान पर रकम खर्च करने के मक़सद पर कोई सीधी बात नहीं की पर मोदी जी उनके पसंदीदा नेता हैं इसलिए उनकी इस्तेमाल की गई वस्तु खरीद कर अपने स्वामित्व में रखने की मंशा अवश्य व्यक्त की .मोदी जी एक कुशल व्यवसायी भी हैं .धन का असमान वितरण कभी समाप्त नहीं होगा …इसे व्यवहारिक मान कर धन को जन हित में किस तरह खींचा जाए यह अर्थशास्त्र की मांग है .जिसे मोदी जी ने संभव किया और इसमें कोई बुराई नहीं है.इस बात का विरोध कितना भी हो पर भारत जैसे देश में जहां गरीबी को परिभाषित करना भी स्पष्ट नहीं है क्योंकि कुछ भारतीय अमीर दुनिया के सबसे अधिक अमीर के लिस्ट में शामिल हैं .हां इतनी असमानता हो कि चांदी के कटोरे कुछ घरों के शोकेस की शोभा बढ़ाते हैं और कुछ को हाथ पर रखकर भी खाने को रोटियां नसीब नहीं होती.वहां उपहारों की नीलामी से धन उगाही और उसका जन हित योजनाओं में प्रयोग करना बिलकुल तर्कसंगत लगता है .किसी बहाने तो ऐसे धन संग्रह से बाहर आकर चलन का हिस्सा बन धन generate करें .

Napolean Hill और W.Clement Stone की पुस्तक Success Through A Positive Mental Attitude से उद्धृत कुछ टिप्स जो ज़रूरी हैं …..

1)money can beget money ……money is of the generating nature
2)where there is nothing to lose and a great deal to gain …by all means try it .
3) if you don’t have money -use other people’s money..
4) attract – don’t repel -wealth

मैंने कई घरों के ड्राइंग रूम में सजे बेशकीमती उपहार देखे हैं .ये अमीरों के लिए शौक है .एक ब्लॉगर साथी का कहना है कि उपहार में मिले सामान की नीलामी विपत्ति में भी नहीं की जाती .पर मोदी जी ने उपहार लेते वक़्त ही कह दिया था एक बार पहनने के बाद मैं इसे नीलामी में लगा दूंगा .पर गरीब और मध्यम वर्ग जिसकी हैसियत न महंगे उपहार लेने ना ही देने की हो उसके लिए नीलामी के मायने सिर्फ इतना ही है कि जो भी धन अर्जित हो वह जन हित के काम में लग जाए .धन के समान वितरण ,की दिशा में यह एक बेहद अप्रत्यक्ष पर कारगर तरीका है. लोकपथ में यह पहल स्वीकार कर लेनी चाहिए इससे बहुत संभावना है कि काला धन किसी स्विस बैंक में ना जाकर देश में ही चलन में बना रह सकेगा.हमारे नेताओं को बच्चों की तरह …जो अपने अपने नोट बुक पर दिए स्माइली ,स्टार्स जैसी छोटी छोटी बातों पर लड़ते झगड़ते हैं ..उन्हें यही सन्देश है कि हर छोटी -छोटी सी बात पर बयान देने से अच्छा है कि वे मोदी जी के व्यवसायी अनुभव को भी सराहें .ठीक है कि वे गंजे को भी कंघा बेच देने में सक्षम हैं वह कंघा गंजे के किसी काम का नहीं पर गंजा अगर संवेदनशील और निपुण है तो उस कंघे से किसी और के उलझे केश सुलझा देगा या दूसरों के केश संवार कर उसे सुन्दर बना सकता है. यहां नीलामी की बात किसी अमीर के उतरन की भी नहीं है .यहां बात एक प्रधान सेवक के अर्थशास्त्रीय सोच ,लोकहिताय संवेदनशीलता ,समस्या के त्वरित समाधान की विवेकशीलता ,संजीदगी और अपने अनुभव से सीखते रहने की परिपक्वता की है .एक सूट की नीलामी से उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर सवालिया निशान लगाना जनतंत्र की अपरिपक्वता है.

जनतंत्र विवेकी और शिक्षित हो रहा है वह विवेकपूर्ण सोच की दिशा में आगे बढे .हम सब मोदी जी और उनकी टीम TEAM (Together Engaged And Managed  ) के कार्यों को “सबका साथ सबका विकास ‘के चश्मे से ही देखे तो यह शिक्षित और विवेकी अवाम दुनिया के सबसे विशाल जनतंत्र का सही रूप से संपूर्ण विश्व में परचम फहरा सकेगा .

हो किसी के साथ थोड़ी कभी तो बंदगी

दिखे सियासत पर कभी तो संजीदगी

जय भारत



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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
February 25, 2015

जहां इतनी असमानता हो कि चांदी के कटोरे कुछ घरों के शोकेस की शोभा बढ़ाते हैं और कुछ को हाथ पर रखकर भी खाने को रोटियां नसीब नहीं होती.वहां उपहारों की नीलामी से धन उगाही और उसका जन हित योजनाओं में प्रयोग करना बिलकुल तर्कसंगत लगता है .किसी बहाने तो ऐसे धन संग्रह से बाहर आकर चलन का हिस्सा बन धन जेनरेट करे ! सौ फीसदी सही कहा है आपने ! मुझे लगता है कि वृश्चिक राशि वाले लाल को शनि का नीला कलर सूट नहीं किया ! आदरणीय यमुना पाठक जी, नेताओं के झूठ फरेब और उल जुलूल हरकतों से इतना ऊब गया था कि कुछ दिन विश्राम करना उचित समझा ! सुबह इस लेख का सम्पादित अंश दैनिक जागरण में देखा तो मंच पर आ गया ! आपके प्रेरक और विचारणीय लेख सहज ही पढ़ने के लिए आकर्षित करते हैं ! विषयों में बदलाव पाठक को ऊबने नहीं देते हैं ! वादे पूरे नहीं करने के कारण मोदी जी से लोग अब ऊबने लगे हैं ! केजरीवाल जी से भी कुछ समय बाद जनता ऊबने लगेगी ! वो जनता को खुश कर पाएंगे, इसमें मुझे संदेह है !

    yamunapathak के द्वारा
    February 25, 2015

    आदरणीय सद्गुरू जी नमस्कार आप की बात सही है कुछ चीज़ें वाकई उबाहट का माहौल बना रही थीं .आपकी प्रेरणात्मक प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ .मोदी जी बहुत बदलाव ला रहे हैं पर उनके प्रत्येक काम को मैग्नीफाइंग लेंस से देखना एक फैशन बन गया है और चलिए ये अच्छा भी है इससे वे जनता के प्रति और भी जवाबदेह बनेंगे , आपका अतिशय धन्यवाद


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