Aatamaabhivyakti

extremely CRUDE ; completely PURE

250 Posts

3091 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 9545 postid : 832819

१)बेहद ज़रूरी है ..इज़हार प्रेम का (२) बैसाखी-कुछ तारीखों ;कुछ घटनाओं की

Posted On: 12 Feb, 2015 Others,कविता,lifestyle में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

1)बैसाखी-कुछ तारीखों;कुछ घटनाओं की

हमारी खुशियाँ
बहुत निरीह हो गई हैं
इतनी…कि
वे इंतज़ार करती हैं
कुछ तारीखों का
जन्म दिवस
विवाह वर्षगाँठ
देता है सहारा इन्हे .
ज़रुरत हो गई इन्हे …
वैलेंटाइन डे ,प्रॉमिस डे रोज़ डे
किश डे ,प्रोपोज़ डे ,हग डे
जैसे ना जाने
कितनी बैसाखियों की
ये इतनी असहाय
ऐसी पंगु क्यों हो गईं ?
खुशियाँ हो गई हैं…..
बिलकुल मृतप्राय
इतनी …कि
ज़रुरत इन्हे
कुछ घटनाओं की
प्रमोशन ,सफलता
देती हैं संजीवनी इन्हे
चलो खुशियों को बनाएं
इतना जीवंत कि
इन्हे सहारा लेना ना पड़े
कुछ तारीखों …कुछ घटनाओं का

ये महकती रहे
सहजता से
बिना किसी वज़ह के
कुदरत में खिले
फूलों की तरह
और हो इसमें
हर हाल में खिलखिलाते
बच्चों का सा असर .Copy of Copy of Desktop76

2)पेड़ बन जाएं

बहुत उड़ लिए
पंख फैला
अब डर लगता है
अपनी ही उड़ान से
चलो अब हम
कहीं ना जाएं
क्यों ना हम
एक पेड़ बन जाएं !!!

3) बरगद से बोनसाई Desktop46

ज़िंदगी के सोपान
एक के बाद एक चढ़ते हुए
यह ज़रूर है कि
हम जंगल से आ जाते हैं उपवन में
पर अफ़सोस यह कि बन जाते हैं…
बरगद से बोनसाई .
सवाल यह कि …
इस अधोगामी उन्नति का
कौन होता जिम्मेदार ???
अपने अहम में दूसरों को
दिन ब दिन छोटा करने वाले
अंध स्वार्थ से भरे लोग
या फिर हमारी ही पलायनवादिता
हमारा ही आत्मसमर्पण !!
मैंने भी एहसास किया दर्द …
बरगद से बोनसाई बन जाने का
जिस दिन करीब से देखा…
घर के बाहर बैठे बुजुर्ग प्रहरी को
फर्म के रिटायर्ड अधिकारी को
गली के परिचित से भिखारी को
सब दांव पर लगाए एक जुआरी को
सच है कोई भी इंसान
नहीं बनना चाहता
बरगद से बोनसाई….क्योंकि
वह महरूम हो जाता है
पक्षियों के मधुर कलरव से
दूर तक घने अपने फैलाव से
स्व बड़प्पन के वृहद घेराव से
आते जाते राहगीरों के लगाव से
पर यह बरगद की मदहोशी है
देख नहीं पाता वक़्त की कैंची
यह तो उसकी ही बेहोशी है
समझ नहीं पाता हवा की गति
ये उसकी बेइंतहा शोखी है
जो हर लेती उसकी मति
हाँ ,यह वक़्त की भी बेरहमी है
कि भिखारी बन जाता है
बीते कल का करोड़पति
बन जाता है बरगद …से …बोनसाई
कभी स्वेच्छा से …तो
कभी वक़्त के हाथों मज़बूर
पर …..यह सच है कि
बहुत दर्द है इस
अधोगामी परिवर्तन में .Desktop77

4)बेहद ज़रूरी है इज़हार प्रेम का

बेहद ज़रूरी है ..
इज़हार प्रेम का
ना हो इंतज़ार किसी
अवसर विशेष का
प्रेम का इज़हार ना हो
ताजमहल की तरह
देश दुनिया करती
जिस प्रेम का दीदार
उसे स्वयं प्रेम ही
जीते जी देख न सका
गैरों से नहीं
प्रेम का इज़हार
अपने प्रेम से ही करो
खुशियाँ दामन में
उनके जीते जी ही भरो
अन्यथा….
कला की गोद में टपके
अश्क की तरह
प्रेम भी हो जाएगा मृत
ताज की तरह .


-yamuna



Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

12 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

munish के द्वारा
February 13, 2015

दौड़ है आंखें बंद करके सब दौड़ रहे हैं, …………. दो पल की फुरसत कहाँ ……… प्यार के इज़हार के लिए भी दिन निश्चित है उस का भी बाजारीकरण हो गया है ………. लेकिन आदरणीय यमुना जी इतने गंभीर विषय को इतनी भी गंभीरता से नहीं उठाते ……… अरे हमने भी कई वर्ष पूर्व वैलेंटाइन डे मनाया था ……… लेकिन इतनी गंभीरता से नहीं लिंक दे रहा हूँ आनंद लीजिये http://munish.jagranjunction.com/2011/02/14/%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%82-%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AE%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%9C%E0%A5%80-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BE-%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%87/

    yamunapathak के द्वारा
    February 14, 2015

    मुनीश जी आपकी बात से सहमत हूँ आपने जो लिंक दिया वह ब्लॉग पढ़ा मैंने ….बहुत ही रोचक ब्लॉग है और सटीक भी आपका अतिशय धन्यवाद

sadguruji के द्वारा
February 13, 2015

सच है कोई भी इंसान नहीं बनना चाहता बरगद से बोनसाई….क्योंकि वह महरूम हो जाता है पक्षियों के मधुर कलरव से दूर तक घने अपने फैलाव से स्व बड़प्पन के वृहद घेराव से आते जाते राहगीरों के लगाव से ! बहुत सुन्दर और विचारणीय रचनाएँ ! भौतिक विकास तो हो रहा है, परन्तु अहंकारवश लोग बरगद से बोनसाई बनते जा रहे हैं ! 26 जनवरी का न्योता न देकर नरेंद्र मोदी बरगद से बोनसाई बन गए और केजरीवाल बोनसाई से बरगद ! सुन्दर, सुखद और प्रेरक प्रस्तुति के लिए हार्दिक आभार !

    yamunapathak के द्वारा
    February 13, 2015

    आदरणीय सद्गुरू जी आपने बहुत सुन्दर उदाहरण दिया ब्लॉग पर आने का अतिशय आभार .

yogi sarswat के द्वारा
February 13, 2015

अपने अहम में दूसरों को दिन ब दिन छोटा करने वाले अंध स्वार्थ से भरे लोग या फिर हमारी ही पलायनवादिता हमारा ही आत्मसमर्पण !! मैंने भी एहसास किया दर्द … बरगद से बोनसाई बन जाने का जिस दिन करीब से देखा… ​एकदम सटीक और सार्थक पोस्ट ​आदरणीय यमुना जी

    yamunapathak के द्वारा
    February 13, 2015

    योगी जी सारी कविताओं में सभी ने बरगद से बोनसाई पर ही अपने विचार रखे आप का अतिशय आभार .शेष कविताओं पर भी विचार जानना चाहती हूँ ताकि परिष्करण कर सकूँ .ब्लॉग पर आने का बहुत बहुत आभार

pkdubey के द्वारा
February 13, 2015

आदरणीया आप ने बहुत कुछ और बहुत उच्च विचार दिए ,पर आज की पीढ़ी ,पैसे की घुड़दौड़ में शामिल है,जो बहुत दुखद परिणाम दायक साबित होगी |

    yamunapathak के द्वारा
    February 13, 2015

    दुबे जी आपने बहुत सही कहा सब कुछ पैसे पर मापा जा रहा है पर आज की पीढ़ी के विचारों को सही दिशा देने के लिए ही हम सब अपने विचार देते हैं ब्लॉग पर आने का और एक सही दिशा देने का बहुत बहुत आभार .

Shobha के द्वारा
February 12, 2015

प्रिय यमुना जी आपकी कविता बरगद की बोनसाई मेरे बहुत काम आएगी मेरी बहुत प्यारी बहन है परन्तु उसके बेटे की बोनसाई बनाने का बहुत शोक हैं आप जानती हैं यह पेड़ के साथ कितना बड़ा अन्याय है मैने आपकी कविता अपनी बहन और भांजे और परिवार को भेजी साथ ही नोट लिखा यह मेंरी नहीं बुद्धिजीवी सोच है मुझे इस अक्ल पर बहुत तरस आता हैं एक विशाल पेड़ को अपने ड्राइंग रम के कोने में सजा देना शोभा

    yamunapathak के द्वारा
    February 12, 2015

    आदरणीय शोभाजी आपका बहुत बहुत आभार .दरअसल यह एक कला ज़रूर है पर वृक्ष हो या रिश्ते अपने विस्तार में ही सुन्दर और उपयोगी होते हैं .आपका अतिशय धन्यवाद

Shobha के द्वारा
February 12, 2015

प्रिय यमुना जी बोनसाई जापान ने शुरू किया था वह छोटे कद के थे विरोध में उन्होंने विशाल विशाल वृक्षों को बोनसाई बना डाला जो हमें खुल कर आक्सीजन देते उन्हें हमने ड्राइंग में सजा दिया बड़ी प्यारी कविताएँ डॉ शोभा

    yamunapathak के द्वारा
    February 12, 2015

    आदरणीय शोभा जी बोनसाई हमारे संकुचन का प्रतीक है और बरगद विस्तार का ….हमने विकास के नाम पर अपना ही नुकसान किया है आपकी प्रेरणात्मक टिप्पणी का बहुत बहुत आभार


topic of the week



latest from jagran