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जब तुम से है प्रेम तो 'मैं' कहाँ

Posted On: 6 Feb, 2015 Others,कविता,Junction Forum में

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प्रेम क्या है इसे शब्दों में बांधना मुश्किल है.प्रेम अपने प्रिय के लिए ही जीता है.और अपना व्यक्तित्व अहंकार सब भूल जाता है.
द्वारका में एक बार भगवान कृष्ण अस्वस्थ हो गए.सारे नगर में हाहाकार मच गया.सब इलाज़ निष्फल हुए .अंत में एक वैद्य ने कहा,”किसी व्यक्ति के पैरों की धूल चाहिए ,उसी से उपचार करने पर श्रीकृष्ण को स्वास्थय लाभ मिल सकता है.”पैरों की धूल (चरण रज)लाने की जिम्मेदारी नारद जी को सौंपी गई.वे रुक्मिणी सत्यभामा सहित ऋषि मुनियों के पास भी गए पर श्रीकृष्ण जैसे ईश्वर तुल्य को अपने पैरों की धूल दे कर कौन नरक जाना चाहेगा !! थके हारे नारद श्रीकृष्ण के पास लौट आये और आप बीती सुनाई.कृष्ण मुस्कराये और कहा एक बार ब्रज चले जाओ शायद वहां से मिल जाए .
नारद ब्रज पहुंचे श्रीकृष्ण के अस्वस्थ होने की सूचना सुन सभी चिंतित हो गए .राधा और गोपियों ने जब सुना कि श्रीकृष्ण पैरों की धूल से स्वस्थ हो जाएंगे तो वे धूल देने को तैयार हो गईं.नारद जी ने पूछा ,”अपने पैरों की धूल को श्रीकृष्ण के लिए देकर तुम्हे नरक जाने का भय नहीं है ?? राधा और गोपियों ने कहा ,”हमें तो हमारे कृष्ण के अलावा कोई बात सूझ ही नहीं रही है उनकी और तकलीफ हमसे सही नहीं जाएगी आप ये धूल जल्दी से ले जाओ और उन्हें स्वस्थ करो .”नारद ने राधा की चरण रज ली और जाकर वैद्य को दिया .श्रीकृष्ण स्वस्थ हो गए.
प्रिय के सुख में ही सबसे ज्यादा आनंद होता है.प्रेमी को प्रिय के आगे सभी मूल्य और विचार महत्वहीन लगते हैं.व्यक्ति अपने प्रिय के लिए जीवन का बड़े से बड़ा त्याग करने में हमेशा तत्पर रहता है और इस अवस्था में स्व को भूल जाता है फिर राधा और गोपियों जैसे प्रेमियों को नरक का भय कैसे हो?स्व को भूल जाने का यही गुण उसे अलौकिक सौंदर्य देता है .
स्व को भूलने और प्रेमी को सब कुछ मानने की यह भावना किसी और का कोई नुकसान ना करे यह ध्यान रखना भी अत्यावश्यक है .

1 ) सेलिब्रेशन

नहीं करती नज़रअंदाज़…
तुम्हारी किसी बात को मैं
तुम्हारी छोटी से छोटी खुशी
हैं मेरी ज़िंदगी के हार के
छोटे-छोटे फूल की मानिंद
जब-जब पिरोती हूँ
उन छोटे-छोटे फूलों को
हाथ चलते हैं
पर मन….
उस हर खुशनुमा पल को
करता है सेलिब्रेट
बन जाता है जब पूरा हार
जीवन स्वयं हो जाता है

‘एक सेलिब्रेशन’.

2)

सुवासित लम्हे

एक रात जब भर लिया था
मैंने
अपनी हथेलियों को
रातरानी के फूलों से
और….
महक उठी थी दरो-दीवार
तुमने पूछा….
भाते नहीं क्यों तुम्हे कभी
सुन्दर,महकते लाल गुलाब??
भा जाते हैं बस…
रजनीगंधा,मधुमालती
हरसिंगार,रातरानी और पारिजात.
मैंने धीरे से कहा
क्योंकि…….
ये सभी खिलते हैं बहुतायत से
ठीक तुम्हारे प्यार की तरह
आधिक्य में,
खुशबुओं से लबरेज़
मेरे छोटे-छोटे लम्हों को
सुवासित कर जाते हैं.




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19 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

    yamunapathak के द्वारा
    February 12, 2015

    योगी जी आपका अतिशय आभार

    yamunapathak के द्वारा
    February 12, 2015

    योगी जी आपका ब्लॉग (कड़ी) मुसाफिर चलता जा बहुत ही ज्ञानवर्धक और रोचक श्रंखला है विभिन्न अनदेखे स्थानों की तसवीरें आकर्षित करती हैं.बहुत मेहनत का काम है साभार

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
February 9, 2015

अत्युत्तम प्रेमिल पंक्तियाँ ! सुकोमल मनोभावों का उद्रेक भी ! स्व — आ — हा व सर्व समर्पण की भावना ही तो प्रेम के पथ को सरल-सुगम और सहज कर जाती है ! यमुना जी ! बधाई ! सादर !

    yamunapathak के द्वारा
    February 10, 2015

    gunjan jee aapka bahut bahut aabhar

jlsingh के द्वारा
February 8, 2015

प्रेम की अद्भुत व्याख्या आदरणीया यमुना जी,

    yamunapathak के द्वारा
    February 10, 2015

    aadarneey jawahar jee aapka atishay aabhar

Santlal Karun के द्वारा
February 8, 2015

आदरणीया यमुना जी, प्रेम-सागर में ‘स्वत्व’ के विलय का दृष्टांत देते हुए राधा-माधव की मार्मिक अंतर्कथा और फिर अंत में ‘सेलिब्रेशन’ के आप के अर्थान्तरन्यास ने समूचे कथ्य को अत्यंत प्रभावी बना दिया है – “तुम्हारी छोटी से छोटी खुशी है/ मेरी ज़िंदगी के हार के/ छोटे-छोटे फूल की मानिंद/ जब-जब पिरोती हूँ/ उन छोटे-छोटे फूलों को/ हाथ चलते हैं/ पर मन…./ उस हर खुशनुमा पल को/ करता है सेलिब्रेट/ बन जाता है जब पूरा हार/ जीवन स्वयं हो जाता है/ ‘एक सेलिब्रेशन’” …हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

    yamunapathak के द्वारा
    February 10, 2015

    aadarneeya sir aapkee pratikriya ka bahut bahut dhanyvad

deepak pande के द्वारा
February 7, 2015

वोपहू कपददव बहुत खूब आदरणीय यमुना जी http://deepakbijnory.jagranjunction.com/wp-admin/post.php?action=edit&post=848148

    yamunapathak के द्वारा
    February 10, 2015

    DEEPAK JEE aapne kya likha hai yah spashta naheen ho paya aap blog par aaye aapka atishay aabhar yah link open naheen ho raha main aapke page par direct jatee hun sabhar

pkdubey के द्वारा
February 7, 2015

सच है आदरणीया ,सच्चा सुख तो परमेश्वर के प्रेम में ही है ,फिर भी जीव जगत में जो जिससे जैसा प्रेम करता ,वही रिश्ते नातों में दृष्टिगोचर होता,सादर |

    yamunapathak के द्वारा
    February 10, 2015

    DUBEY JEE AAPKA BAHUT BAHUT AABHAR

February 6, 2015

bahut sundar v sarthak roop se prem ko aapne shabd diye hain yamuna ji .आभार

    yamunapathak के द्वारा
    February 10, 2015

    SHALINI JEE aapka bahut bahut dhanyvad

Shobha के द्वारा
February 6, 2015

प्रिय यमुना जी आपने प्रेम की बड़ी खुबसुरत व्याख्या की है और इसके समर्थन में बहुत सुंदर कथा का समर्थन दिया हैं आज कल का प्रेम ज्यादा तर कसौटी पर खरा नहीं उतरता डॉ शोभा

    yamunapathak के द्वारा
    February 10, 2015

    shobha jee aapka atishay aabhar

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
February 6, 2015

प्रेम भाव की बहुत सुन्दर व्याख्या की है किन्तु जितना प्रेम मैं डूबता हैं वही दुखों का कारन भी बन जाता है । प्रेम जितना आनंददायी होता जाता है विछोह  उतना ही कष्टकारी लगता है । ओम शांति शांति यमुना जी 

    yamunapathak के द्वारा
    February 10, 2015

    HARISHCHANDRA JEE SAHMAT HUN AAPKEE BATON SE AAPKA ATISHAY AABHAR


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