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स्वामी विवेकानंद का कवि मन

Posted On: 12 Jan, 2015 Junction Forum,Special Days में

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प्रिय ब्लॉगर साथियों
Desktop18ाहित्य और अभिव्यक्ति का गणित अंकगणित से बेहद जुदा है .जहां 1 विचार + 1 विचार = 2 विचार नहीं होते बल्कि 1+1= किसी तीसरे नए विचार और अभिव्यक्ति को जन्म देते हैं .या फिर…..1+1= 11,,,,,11+ 1 =111,,,,,111+1 =1111,,,,इसी तरह विचारों की संख्या आगे बढ़ती जाती है.
कलम हमेशा से तलवार से बड़ी रही है क्योंकि तलवार की कहानियां भी अगर इतिहास में दर्ज़ हैं तो सिर्फ कलम के माध्यम से .अभिव्यक्ति को कितना भी दबाने की कोशिश की जाए यह अपने गणित के स्वभावानुसार (1+1= 11,,,,,11+ 1 =111,,,,,111+1 =1111,,,,)तेजी से वृद्धि करता है .

आज स्वामी विवेकानंद जी की जयन्ती पर मैंने उनकी काव्याभिव्यक्ति को संकलित किया है .महान से महान व्यक्तियों ने भावों को कविता के माध्यम से कभी ना कभी अवश्य बाँधा है.यह उन अभिव्यक्तियों का ही प्रभाव है जो साहित्यिक गणित का अनुसरण कर कई कई विचार लगातार अविरल प्रवाहित होते रहे हैं.

उस दिन 1863 की 12 जनवरी थी.पौष संक्रांति का पुण्य प्रभात कुहरे से ढका हुआ था शीत से ठिठुरते हुए नरनारियों के दल मकर सप्तमी के स्नान के लिए भागीरथी की ओर जा रहे थे इसी समय सूर्योदय से छह मिनट पूर्व चार बजकर तैतीस सेकंड पर भुवनेश्वरी देवी ने विश्वविजयी पुत्र को जन्म दिया .यह थे नरेन्द्रनाथ अर्थात स्वामी विवेकानंद .
स्वामी जी ने ‘माँ काली ‘ kali the mother शीर्षक से एक कविता की रचना की थी .
छिप गए तारे गगन के
बादलों पर चढ़े बादल
काँपकर गहरा अँधेरा
गरजते तूफ़ान में,शत
लक्ष पागल प्राण,छूटे
जल्द कारागार से – द्रुम
जड़ समेत उखाड़कर,हर
बला पथ की साफ़ करके .
शोर से आ मिला सागर,
शिखर लहरों के पलटते
उठ रहे हैं कृष्ण नभ का
स्पर्श करने के लिए द्रुत
किरण जैसे अमंगल की
हर तरफ से खोलती है
मृत्यु छायाएं सहस्त्रों
देहवाली घनी काली.
आधि-व्याधि बिखेरती,ऐ,
नाचती पागल हुलसकर
आ जननी ,आ जननी आ,आ !
नाम है आतंक तेरा
मृत्यु तेरे स्वास में है
चरण उठकर सर्वदा को
विश्व एक मिटा रहा है
समय तू है सर्वनाशिनि ,
साहसी,जो चाहता है
दुःख,मिल जाना मरण से
नाश की गति नाचता है,
माँ उसी के पास आयी.
जीवन भर की कठिन साधना द्वारा स्वामी जी ने धीरे -धीरे अनुभव किया था -दुःख,दीनता व्याधि महामारी पराजय व व्यर्थता के विरूद्ध वीर की तरह संग्राम करना और यदि आवश्यक हो तो निर्भीक दृढ़ता के साथ वीर की तरह मृत्यु को भी आलिंगन करना ,यही उनकी दृष्टि में कर्त्तव्य शक्ति साधना थी.उन्होंने भविष्य के सार्वभौमिक आदर्श के सम्बन्ध में कहा ,”प्रत्येक जाति या प्रत्येक धर्म दूसरी जाति या दूसरे धर्म के साथ आपस में भावों का आदान प्रदान करेगा परन्तु प्रत्येक अपनी अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करेगा और अपनी अपनी अन्तर्निहित शक्ति के अनुसार उन्नति की ओर अग्रसर होगा .आज से सभी धर्मों के झंडे पर लिख दो ,’युद्ध नहीं-सहायता;ध्वंस नहीं -आत्मस्थ कर लेना ;भेद द्वन्द नहीं-सामंजस्य एवं शान्ति.”
उन्होंने एक और कविता लिखी थी ‘गाता हूँ गीत मैं तुम्हे ही सुनाने को “(श्री राम कृष्ण के लिए)
बाल केलि करता हूँ तुमसे मैं
और क्रोध करके देव
तुमसे किनारा कर्जन कभी चाहता हूँ
किन्तु निशा काल में
शय्या के शिरोभाग में
देखता हूँ तुमको मैं खड़े हुए
चुपचाप-आँखें छलछलाई हुई
हेरते हो मेरे तुम मुख की ओर
उसी समय बदल जाता भाव मेरा
पैरों पड़ता हूँ पर क्षमा नहीं मांगता हूँ
तुम नहीं करते हो रोष
पुत्र हूँ तुम्हारा ,कहो,
और कोई कैसे इस प्रगल्भता को
सहन कर सकता है ?
प्रभु हो तुम मेरे ,तुम प्राण सखा मेरे हो
कभी देखता हूँ-
“तुम मैं हो ,मैं तुम हूँ.”
चार जुलाई को अमेरिका के स्वाधीनता दिवस पर एक छोटा सा उत्सव अपनी अमेरिकन शिष्याओं के साथ मनाया और ‘To the 4th of july  ‘ चार जुलाई के प्रति शीर्षक स्वरचित एक कविता पढ़कर शिष्याओं को सुनाई थी
काले बादल कट गए आकाश से
रात को बांधे हुए थे जो समा
पृथ्वी पर तानी थी चादर ,इस तरह
आँख खोली,जादू की लकड़ी फिरी
चिड़ियाँ चहकी साथ फूलों के उठे
सर— सितारे जैसे चमके ताज के
ओस के मोटी लगे स्वागत किया
क्या तुम्हारा झूमकर झुककर खुली
और फ़ैली दूर तक झीलें ,खुशी
जैसे आँखें कमलों की फ़ाड़े हुए
दर्श करती है तुम्हारा ह्रदय से
कुछ निछावर ,ज्योति के जीवन ,क्या
आज अभिनन्दन तुम्हारा ,धन्य है.
आज,रवि स्वाधीनता की फूटी कली
राह देखी विश्व ने ,कैसे खिली
देशकालिक खोज की,तुमसे मिले
छोड़ा है घर ,मित्र छोड़ी मित्रता
खोज तुमको आवारा मारा फिरा
गुज़रा दहशत के समंदर से कभी
सघन पहले के गहन वन से ;लड़ा
हर कदम पर प्राणों की बाजी लिए
वक़्त वह हासिल निकला काम का
प्यार का ,पूजा का,जीवन दान का
हाथ उठाया संवर कर पूरा किया
फिर तुम्ही ने स्वस्ति की बांधी कमर
जन गणों पर मुक्ति की डाली किरण
देव,चलते ही चलो बेरोकटोक
विश्व को दुपहर ना जब तक घेर ले
कर तुम्हारा हर ज़मी जब तक ना दे
स्त्री पुरूष जब तक न देखे चाव से
बेड़ियां उनकी कटी उल्लास की
जान नयी जब तक समझें आ गयी .
इस कविता को लिखने के ठीक चार वर्ष बाद 1902  की चार जुलाई को स्वामी जी ने अपनी लीला समाप्त की.क्या यह उसी की भविष्यवाणी थी .?अथवा अमेरिका की स्वाधीनता की चिंता करते हुए उनके मानस पट पर समग्र जगत के पददलित राष्ट्रों के पुनरुथान का एक गौरवमय चित्र उदित हुआ था ?

(श्री सत्येन्द्रनाथ मजूमदार द्वारा लिखित विवेकानंद चरित से संकलित …साभार )



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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pkdubey के द्वारा
January 13, 2015

कोई दिव्य चेतना ही जगत के भटकते जीवों का उद्धार कर सकती है ,आदरणीया ,सादर आभार |


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