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24*7 के बीच

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विज्ञापन- आर्थिक और नैतिक मूल्य
गाड़ी हवा से बातें कर रही थी और मैं सड़क के दोनों और तेजी से छूटते होर्डिंग्स पर नज़र दौड़ाये जा रही थी आँखें तो बस सड़क के दोनों और की हलचल को ही कैद कर पाती हैं पर विचार तो मस्तिष्क के विशाल समंदर में कई फ़ैदम नीचे उतर जाते हैं.कुछ लतीफे जैसे,कुछ संवेदनशील,कुछ मूल्यपरक ,कुछ काल्पनिक तो कुछ बेहद अप्रासंगिक विज्ञापन ध्यान खींचते ही हैं .‘सोच बदलो देश बदलो’….’हर खबर हौसला है हर हौसला खबर’…’सबसे तेज... जैसे कई टैग लाइन के साथ 24 * 7 के न्यूज़ चैनल के बीच भी कुछ ऐसा होता है जो सदा से मेरा पसंदीदा विषय रहा है यह है विज्ञापन की दुनिया ..पुनरावृत्ति के बावजूद यह कभी सोचने पर ,कभी हँसने पर ,कभी अचरज में पड़ने के साथ साथ कभी कभी आवेश में भी भर देती है.हालांकि अधिकाँश लोग समयाभाव की वज़ह से इस वक़्त को शेविंग करने ,ऑफिस के लिए तैयार होने या फोन कॉल के लिए बेहतर समझते हैं पर वे कितने भी व्यस्त हों ये विज्ञापन उनका भी ध्यान अवश्य खींच लेते हैं..
सबसे मज़ेदार विज्ञापन अर्धनारीश्वर के तर्ज़ पर बायर और सेलर (buyer & seller)के मैच (match)का क्विकर (quikr)का विज्ञापन है .फिर चाहे वह लाल सोफे की कहानी हो या जिम इंस्ट्रूमेंट की हो. एक दूसरे की ज़रुरत को सहजता से पूरा करने का सन्देश देता है.आज जहां हर वक़्त हर इंसान मोबाइल क्रान्ति के युग में चलता फिरता कैमरा हो गया है वहां प्रिंस पाइप्स का एड’ इंडिया में सब कुछ लीक हो सकता है ‘बहुत सही लगता है .जो हमें हर पल हर स्थान पर सतर्क ,शालीन और विवेकपूर्ण व्यवहार करने का इशारा करता है..इन सब से अलग हट कर tata docomo …निशा की हताशा फेसबुकिया बुखार को बयान करते हुए भलाई करने की भी शिक्षा देता है.आजकल एक नया विज्ञापन अपने दोस्त की बॉस के व्यवहार से उपजी परेशानी से उबारने के लिए उसे फनी सन्देश भेज कर भलाई करने का सन्देश दे रहा है.streaks natural colour का अक्षय कुमार का एड बाल कलर करवा लीजिये भी बहुत फनी है पर यह भी दर्शाता है कि कभी कभी प्रसंशा करने से आप औरों को सम्मोहित कर सकते हैं. राज्यश्री पान मसाला जैसे विज्ञापन ‘अच्छा खाइये ,निश्चिन्त रहिये .और फिर एक तस्कीद ‘chewing of masala may be injurious to health ‘ का औचित्य मेरी समझ से पर ही रहता है.

Desktop20विज्ञापन के इन चकाचौंध करने वाली दुनिया में कुछ ारिवारिक सामाजिक मूल्यों को समेटे सन्देश बेहद अच्छे लगते हैं .लाल रंग की ऊर्जा से भरा रिश्तों को मज़बूत करने का सन्देश देता ए सी सी सीमेंट का cementing relationships खींचता है.अम्बुजा सीमेंट करण नामक बच्चे के ज़वाब के माध्यम से अच्छी और बुरी दीवार के बीच फर्क बता कर भेदभाव को दूर करने का सन्देश देता है परएक शिक्षिका होने के नाते इस विज्ञापन को मैं सम्पूर्ण मूल्यपरक सन्देश इसलिए नहीं मानती क्योंकि जिस तरह से शिक्षिका छात्र को कहती है “अर्जुन ,खड़े हो जाओ ,दीवार पर निबंध सुनाओ’ वह बहुत अजीब लगता है .प्रथम तो निबंध सुनाने का विषय नहीं होता और दूसरी बात विद्यार्थी से शिक्षिका का इस तरह चिल्ला कर डपटते हुए प्रश्न पूछना परम्परावादी शिक्षण को प्रस्तुत करता है .विद्यार्थी से बेहद सौम्य और सलीके से प्रश्न पूछना गुरू शिष्य के मधुर सम्बन्ध का नीतिगत सन्देश देता “करण ,दीवार के विषय में कुछ पंक्तियाँ अपने मित्रों के समक्ष प्रस्तुत करो.”यह कहना ज्यादा श्रुतिकर और प्रभावकारी होता. हम स्वयं भी बच्चों से यह अपेक्षा करते हैं कि वे कुछ भी पूछने के समय नम्रता अपनाएं .हाँ अर्जुन के उत्तर में दुनियादारी की समझ,तार्किक विवेचन की क्षमता ,अन्य बच्चों में विषय विशेष से जुड़े आदर्श, रुचि ,प्रसंशा का विकास उनकी सीखने की प्रक्रिया को अवश्य मज़बूत करता दिखता है ठीक अम्बुजा सीमेंट की मज़बूती की तरह मूल्य का सन्देश देता है.यह विज्ञापन मुझे सामजिक मूल्य के प्रस्तुतीकरण की वज़ह से पसंद है.वंडर सीमेंट का विज्ञापन जब पंडित जी चले जाते हैं और माता पिता के घर आने पर पुत्र का यह कहना कि आप दोनों हैं न (पंडित की ज़रुरत से ज्यादा माता पिता का आशीर्वाद) आज के युवाओं को माता पिता के सम्मान और जीवन में उनके महत्व को समझने का सन्देश दे जाता है .प्रतीक ग्रुप का ‘creating landmark;setting benchmark ‘ ‘ के साथ विज्ञापन’ये इमारतें कुछ कहती हैं यहां नन्ही मन्नतें रहती हैं ‘ मधुर और कर्णप्रिय होने के साथ बेटियों के महत्व को दिखा कर सदियों से पुत्र को मन्नत मान कर चलने की पारम्परिक सोच को बदल देता है. इसी प्रकार का सामाजिक सन्देश फ़ोर्स ट्रैवलर के द्वारा ‘हथेली पे रख ले है नई नवेली…लाखों को सम्हाले तू चला चल’के माध्यम से दिया गया है.जीवन मूल्यों को सीखते विज्ञापन में भारतीय समाज के बेहद करीब और शिद्दत से महसूस करते भाव पीढ़ियों के बीच अन्तर्सम्बन्ध को सुदृढ़ करने की सीख देता हुआ ‘wagnar  ‘ का एक विज्ञापन ‘क्यों न जो लोग दुनिया देख चुके हैं उन्ही से दुनिया शुरू करें . संयुक्त परिवार के ख़त्म होने के परिदृश्य के बीच बेहद संवेदनशीलता से स्क्रीन पर उभरता है. P C jwellers का विज्ञापन even better i am the woman of the house  नयी रोशनी,नया विश्वास ‘घर की व्यवस्था चलाने में गृहणियों के योगदान को इंगित करता है.किनले वाटर का पुत्री द्वारा पिता से झूठ बोल कर अकेले में उस बात का पछतावा और सच्चाई का महत्व बताता विज्ञापन बहुत सुन्दर सन्देश देता है .

ज़िंदगी जीने के गुर सीखते विज्ञापन में एक्रो पेंट्स का ‘रंग दे रंग दे तू ज़िंदगी रंग दे ‘जीवन में रंगों भरे लम्हों को शामिल करने का सन्देश दे जाता है.इसी प्रकार raymond colours wool  का ad जिसमें स्क्रीन पर पहले श्वेत भेड़ दिखने के बाद एक एक कर अलग अलग रंगों वाली कई भेड़ें सुन्दर पैटर्न बनाती दिखाई जाती हैं जो बहुत ही लुभावनी लगती हैं.प्रत्येक कार्यक्रम planned,measurable,time bound  है तो भविष्य भी सुरक्षित हो यह सन्देश ’systematic investment plan ‘ का एड देता है जहां छोटी बच्ची मासूम प्रश्न करती है माँ, कितना ग्लास दूध एक दिन में पीना चाहिए और पढ़ाई कितने घंटे करनी चाहिए .माता पिता सटीक उत्तर देकर अपने शिक्षित होने का प्रमाण देते हैं पर भविष्य के विषय में सचेत करने की जिम्मेदारी बड़े भाई ही उठाते दिखाए जाते हैं यह भारतीय समाज के बड़े -छोटे के दायित्व और कर्त्तव्य को बखूबी बयान कर जाता है. फोर्ड इकोस्पोर्ट ‘मुश्किलों में हँसते हुए चलने का सन्देश देता है. अतिथि देवो भव यह भारतीय समाज का मूल मंत्र है .yatra.com का एड ‘करण जब भी दिल्ली आता है यहीं ठहरता है…एक किडनी ही तो माँगी है दो होती हैं सबकी ‘एहसान मत लो डिस्काउंट लो ‘बहुत ही हास्यास्पद ,अतिश्योक्ति भरा और अमानवीय सा लगता है.भारतीय समाज में आज भी गिव एंड टेक नीति के तहत कोई किसी के घर नहीं जाता उस पर आतिथ्य के बदले किडनी की अपेक्षा अजीब सा सन्देश देता है. या एक और विज्ञापन जो आतिथ्य के बदले बेटी से शादी की अपेक्षा को दर्शाता है और किसी अपेक्षा के लिए ही लोगों को मदद करने की मानव प्रवृत्ति को इंगित करता है Gyproc false ceiling का एड बहुत सही लगता है ,हम वाकई नए पड़ोसियों को या किसी अज़नबी को जब तक नहीं जानते उन्हें बहुत ही underestimate कर के ही अपने दृष्टिकोण बनाते हैं . Ask.comका एड ‘सब पागल कर देते हैं ‘मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना का सबक देकर अपने द्वारा अर्जित ज्ञान और अनुभव को मानने की बात कहता है.सुनफीस्ट का विज्ञापन बेटी को कॉलेज भेजते वक़्त अपने ज़ज़्बात को छुपाने की कोशिश और बेटी का बार बार पूछना माँ तुम मुझे चाय पीते वक़्त भी याद नहीं करोगी मुझे दिल के बहुत करीब लगता है और उन सारी माओं की याद दिलाता है जो अपनी बेटियों को भारी मन से पढने भेजती हैं और अकेले में उनके खैरियत के लिए दुआ मांगती हैं.

इस भौतिक सुख सुविधा की भाग दौड़ ,हर चीज़ को मन की आँखों की बजाय कैमरे में कैद करने को बेताब पीढ़ी , वास्तविक ज़िंदगी को आभासी ज़िंदगी के लिए कुर्बान करते लोगों और ज़िंदगी की ज़द्दोज़हद से दो चार होती ज़िंदगी में अपनों के लिए समय ना निकालने वालों को ाइटन घड़ी का विज्ञापन.’अगर मैं तुम्हे टाइम गिफ्ट करूँ तो’ कह कर अपनों को वक़्त देने का सन्देश देता है .

विज्ञापन ग्राहकों को उत्पाद और सेवाओं के प्रति आकर्षित करने का ठोस जरिया हैं .प्रबंधन के गुरू  Peter Drucker का कहना है …..

The aim of marketing is to know and understand our customers so well that the product or service fits them and sell itself . but it should not be only a profit – making machine but to a contributor to society also.”

विज्ञापन लिखना एक गहरी सोच से जुड़ा विषय है .कोई भी उत्पाद तब तक नहीं बिकता जब तक वह मानव मन को नहीं छूता.पारिवारिक सामाजिक मूल्यों से प्रेरित विज्ञापन एक अच्छी ब्रांड विकसित करते हैं .उत्पाद बिकने की गारंटी के साथ साथ यह इंसानी ज़ज़्बात को भी छूते और मूल्यपरक जीवन जीने का मार्ग निर्देशन करते हैं.




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9 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pkdubey के द्वारा
December 8, 2014

बहुत गहन एवं सार्थक विश्लेषण आदरणीया.सादर आभार.

abhishek shukla के द्वारा
November 28, 2014

प्रणाम आदरणीया! अद्भूत विश्लेषण। तर्कों की कसौटी पर कसा हुआ…

sadguruji के द्वारा
November 27, 2014

बहुत अच्छी प्रस्तुति ! आपने बहुत विस्तृत और अनूठे ढंग से विज्ञापन जगत का हाल बयान किया है ! ऐसी सुन्दर प्रस्तुति के लिए आपका बहुत बहुत आभार !

ranjanagupta के द्वारा
November 27, 2014

प्रिय यमुना जी बहुत अच्छा विवेचन है , विषय भी सामयिक है वास्तव में विज्ञापन की दुनिया ने जिंदगी को एक नए आयाम से सोचना सिखाया है,बस सर्वाधिक कम उम्र पीढ़ी है जो पूरी तरह इसकी गिरफ्त में दिखाई देती है ! कुछ विज्ञापन भले ही कम प्रभावशाली हो ,लेकिन इतनी बारीकी से बहुत कम लोग देखते है सादर !और शायद बुद्धिजीवियो के लिए ये विज्ञापन बनाये भी नही जाते !वे केवल नई वस्तुओ की जानकारी ही ग्रहण करते है !

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
November 25, 2014

कितना सटीक विवेचना की है आपने विग़्य़ापनों की इस दुनिया की । बहुत अच्छा लगा आपका नजरिया और पूरी तरह से सहमत । अम्बूजा सीमेंट वाला विग्यापन प्रभावशाली नही बन पाया इस बात से मे भी सहमत हूं । बाकी आपने तो अच्छा पोस्टमार्टम कर ही दिया है । पठनीय लेख ।

yamunapathak के द्वारा
November 25, 2014

आदरणीय शोभा जी आपके putra को मेरा स्नेहाशीष बहुत हर्ष की बात है और आपका बहुत बहुत धन्यवाद इस ब्लॉग पर अपना अमूल्य वक़्त आपने दिया मुझे बहुत अच्छा लगा साभार

Shobha के द्वारा
November 25, 2014

प्रिय यमुना जी आपने विज्ञापनों की दुनिया का बहुत सुंदर चित्र खींचा है मेरा लड़का बम्बई में स्टार टीवी में प्रोडक्शन डिपार्टमेंट के विज्ञापन डिपार्टमेंट में एक उची पोस्ट पर काम करता हैं इस लिए मुझे आपका लेख बहुत मजेदार लगा वाकई विज्ञापनों द्वारा किसी भी प्रोडक्ट को बेचा जा सकता है बहुत अच्छी तरह इन्सान की साईकोलोजी को समझ कर लिखा गया लेख डॉ शोभा

nishamittal के द्वारा
November 24, 2014

क्या खूब विश्लेषण किया है यमुना जी गहन अध्ययन  जानकारी देता ब्लॉग

    yamunapathak के द्वारा
    November 25, 2014

    निशा जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद


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