Aatamaabhivyakti

extremely CRUDE ; completely PURE

244 Posts

3093 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 9545 postid : 799143

ज़िंदगी मांगती है हिसाब

Posted On: 3 Nov, 2014 कविता में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

1) बौने से बौने

ऊंचाई को छूने की कोशिश में
हम बौने से बौने होते चले गए
अस्मिता,मिठास हमारे मूल्यों के
आंसू के समंदर में खोते चले गए
बेबाकी से कह जाते थे हर बात
आज खुद में ही सिमट कर रह गए
जीने की कशिश ललक अरमानों की
हम अपनों में ही बेगाने बन रह गए .

2 ) ज़िंदगी मांगती है हिसाब

कितने मोड़;कितनी राहें
प्रश्नोत्तर की कितनी आहें
अँधेरे को चाहिए उजाले से
उजाले को दरकार अँधेरे से
हर कण का हिसाब किताब
हर क्षण दिखाए नया शबाब
हर पल का दूजे पे क़र्ज़ बेहिसाब
सच है,ज़िंदगी मांगती है हिसाब

3) क्रंदन/वंदन

विनाश और सृजन चलते हैं साथ-साथ
क्योंकि प्रकृति को चाहिए संतुलन
हमारी एकांगी दृष्टि देख नहीं पाती
सृजन ; विनाश के क्रंदन में
और ना ही
विनाश ; सृजन के वंदन में
जबकि एक का होना ही
दूसरे के अस्तित्व का प्रमाण है.

4) लब सिले हुए

उन्ही चेहरों ,उन्ही शख्शियतों को
देखा मैंने हर मोड़ पर मिलते हुए
मिलते थे कल कहकहों के बीच
आज जो मिले तो थे लब सिले हुए.

Recently Updated15) धर्म का ज़नाज़ा

क्यों ना अब ऐसा भी करें
कई कई टिकठियां बनाएं
और निकालें धर्म का ज़नाज़ा
अपने अपने धर्म को कफ़न पहना
कहीं दूर सदा के लिए दफ़न कर आएं
गर इसी धर्म की आड़ में
चलती हैं गोलियां ,फेंके जाते हैं पत्थर
लगाए जाते हैं घरों में आग
कि सिकतीं रहे राजनीति की रोटियां
बांटी जा सकें सत्ता की बोटियाँ
धिक्कार है ऐसे हरेक धर्म को
जो फैलता है दंगा
बढ़ा बेवाओं के आंकड़े
छोड़ जाता बच्चों को
अनाथ,भूखा नंगा
जिस धर्म को यह एहसास नहीं
किसने किसको है खून से रंगा
मंज़िल हो उसकी बस श्मशान में
यही ज़ज़्बात जग जाए हर इंसान में



Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

4 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
November 5, 2014

ऊंचाई को छूने की कोशिश में हम बौने से बौने होते चले गए अस्मिता,मिठास हमारे मूल्यों के आंसू के समंदर में खोते चले गए……..बिल्कुल सच । सच है,ज़िंदगी मांगती है हिसाब….नि:संदेह यह जीवन का सच है । …………और यह भी सच है कि इस पेज पर आपकी सभी कविताएं स्तरीय हैं तथा सोचने को मजबूर करती हैं ।

pkdubey के द्वारा
November 5, 2014

लौकिक और अलौकिक सच्चाई को दर्शाता काव्य,सादर आभार आदरणीया.

jlsingh के द्वारा
November 4, 2014

एक से बढ़कर एक कविताएँ पर धर्म का जनाजा सामायिक हार्दिक अभिनंदन आदरणीया इधर आपकी दृष्टि नहीं पडी मेरी रचनाओं पर. कम से कम पगार पोंगा और पकौड़ी (एक कर्मचारी की कविता) जो आपसे प्रेरणा प्राप्त है. एक नजर दौड़ा लें

    yamunapathak के द्वारा
    November 4, 2014

    आदरणीय जवाहर जी नमस्कार आपकी बात सच है पर मैं आपकी रचनाएँ अवश्य पढूंगी बिटिया छुट्टियों में घर आई थी बस थोड़ा लिख ले रही थी पढ़ना नहीं हो पाया पर अब वक़्त मिला है आज मंच पर पढने ही बैठी हूँ . आपका अतिशय आभार


topic of the week



latest from jagran