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...देते हैं इन्तहां

Posted On: 17 Oct, 2014 Others,कविता में

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जलाकर खुद को औरों को देते हैं रोशनी

चिराग अंधेरों में रह कर देते हैं इन्तहां

पत्थर फेंकने वालों को भी देते हैं फल

दरख़्त ये हक़ अदा कर देते हैं इन्तहां

शाख से कट सज जाते हैं गुलदानों में

और गुल मुस्करा कर देते हैं इन्तहां

बड़े अरमानों से कर बेटों की शादियां

बुजुर्ग वृद्धाश्रम पहुँच कर देते हैं इन्तहां


घरों के बीच फासले तो होते हैं पल के

पड़ोसी मीलों चल कर देते हैं इन्तहां .Copy of Desktop16



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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ashishgonda के द्वारा
October 27, 2014

जटिल समस्या का सचित्र वर्णन……..

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
October 23, 2014

बड़े अरमानों से कर बेटों की शादियां बुजुर्ग वृद्धाश्रम पहुँच कर देते हैं इन्तहां………….यही है समाज का बिगडता चेहरा , सुदंर कविता ।

jlsingh के द्वारा
October 21, 2014

जिंदगी इम्तिहान है कल भी इम्तिहान थी आज भी इम्तिहान है

Shobha के द्वारा
October 17, 2014

प्रिय यमुना जी छोटी परन्तु सुंदर कविता वाकई बेटे की शादी का सबसे अधिक चाव माता पिता को होता है वृद्धाश्रम की तैयारी का समय आ जाता है मेरे भी शादी लायक दो बेटे हैं मैने अपनी अटैची और कम्प्यूटर बांध लिया है कम्प्यूटर आपकी रचनाये पढ़ने के लिए काम आएगा समय भी कटेगा डॉ शोभा

    yamunapathak के द्वारा
    October 18, 2014

    आदरणीया शोभा जी आपको बहुत बहुत बधाई …जो बच्चे संस्कारों में बड़े होते हैं उनके माता पिता को कभी शिकायत नहीं मिल सकती और आप के संस्कार आपकी रचनाओं में स्पष्ट दिखाते हैं आप हम सभी महिला ब्लोग्गेर्स के लिए एक प्रेरणा हैं. दीपावली की बहुत साड़ी शुभकामना .


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