Aatamaabhivyakti

extremely CRUDE ; completely PURE

247 Posts

3101 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 9545 postid : 792036

प्रगति पथ (प्रोग्रेस पाथ )का पी2 पी2 पी2 मॉडल

  • SocialTwist Tell-a-Friend

दोस्तों ,अब जब लाल किले की प्राचीर से योजना आयोग को ख़त्म कर देने की घोषणा हो चुकी है अर्थशास्त्र की छात्रा/शिक्षिका रह चुकने के कारण मैं इस विषय पर गहनता से सोचने को विवश हूँ.मुझे खुशी इस बात की भी है कि एक प्रजातांत्रिक देश के नागरिक होने के अधिकार को सिर्फ वोट देने तक ही सीमित ना रखते हुए प्रधानमंत्री जी ने आम जनता से प्रशासन में भी सुझाव मंगवाने की शुरुआत कर जनभागीदारी को व्यापक क्षितिज दिया और जनतंत्र ,जननीति और जननेता की परिकल्पना को साकार करने की दिशा में ठोस कदम उठाया है. आज जब मैं यह ब्लॉग लिख रही हूँ तो संतुष्ट हूँ कि मेरी अर्थशास्त्र की पढ़ाई धोबी के हिसाब और घरेलू सहायिका के पगार निश्चित करने या अपने बच्चे को घर पर पढ़ा कर ट्यूशन फीस बचाने तक ही सीमित नहीं आज मैं democratically empowered हूँ इस ब्लॉग में निहित सुझाव को mygov.in पर भी भेज सकती हूँ .

यह सच है कि स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय से ही विभिन्न कारणों जैसे द्वितीय विश्व युद्ध से उपजी आर्थिक कठिनाइयाँ ,परतंत्र भारत के संसाधनों के भरपूर दोहन और पूंजी के विदेश चले जाने से उपजे बिखराव के फलस्वरूप एक संस्था की नितांत आवश्यकता महसूस की जा रही थी जो सुनियोजित और चरणबद्ध तरीके से तत्कालीन कठिनाइयों को दूर कर .देश में आशावाद की लहर ला सके और १५ मार्च १९५० को योजना आयोग की विधिवत स्थापना की गई थी

वर्त्तमान परिदृश्य बहुत बदल चुका है .परिवर्तन कुछ इस तरह भी कि आज ही इस अनुपम पेज पर ढ़ा ‘मज़बूती का नाम गांधी’ बहुत अच्छा लगा.आज देश के हालात बहुत बदल गए हैं हम नन्हे से ग  ‘G ‘ — GRAM (ग्राम) से विशाल ग G –GLOBAL (ग्लोबल) या नन्हे से ‘व ‘V विलेज (VILLAGE )से विशाल ‘ व ‘V वैश्विक (VAISHAVIK) स्तर पर तक आ गए हैं टेलीग्राम युग से इंटरनेट के सफर ने पुरानी चुनौती के साथ नई चुनौतियां भी खड़ी कर दी हैं .आर्थिक मज़बूती किसी भी देश की सुदृढ़ता के लिए रीढ़ की हड्डी का काम करता है.पर सामाजिक और नैतिक मज़बूती से भी मुख मोड़ा नहीं जा सकता .योजना आयोग के जगह नई संस्था के लिए मैं प्रगति पथ (प्रोग्रेस पाथ )के नाम का ही प्रयोग कर रही हूँ.

कुछ लोगों का मानना है कि नाम वाम से कोई फर्क नहीं पड़ता है पर मैं नाम के प्रभाव पर बहुत विश्वास करती हूँ .आज भारत एक विकासशील देश होने के साथ शक्तिशाली देश भी साबित हो गया है ऐसे परिदृश्य में आज योजना बनाने से ज्यादा प्रगति पथ पर अग्रसर होने पर ज्यादा ज़ोर देने की ज़रुरत है.इस संस्था की संरचना,आत्मा,सोच ,दिशा ,डिज़ाइन नई हो जो एक नए विश्वास के साथ देश को रचनात्मक सोच ,सार्वजनिक निजी सहभागीदारी,केंद्र राज्य सहभागीदारी , ,संसाधन के विवेकपूर्ण प्रयोग के साथ मिनिमम इनपुट मैक्सिमम आउटपुट का किफायती संज्ञान भी दे सके .

सर्वप्रथम बात यह कि योजना आयोग समाप्त कर देने से क्या योजना शब्द का औचित्य भी समाप्त हो गया ? नहीं क्योंकि प्रगति पथ पर बढ़ने के लिए भी किसी बिंदु से शुरुआत करनी होगी या जहां तक पहुँच चुके हैं वहां से नई दिशा की खोज ,उस राह पर आने वाली संभावित बाधाओं से जूझने और आई परिष्टितियों के अनुकूल तैयार होने के लिए योजना बनानी ही होगी.पूर्व निश्चित तथा सुस्पष्ट लक्ष्यों का अल्पकालीन,मध्यकालीन और दीर्घकालीन आवश्यकता और प्राथमिकता के साथ निर्धारण करने ,उनके लिए संसाधनों का आबंटन ,उनकी प्राप्ति (संभावित और वास्तविक)का आकलन इन सबके लिए एक सुस्पष्ट योजना ज़रूरी होगी.हिटलर और मुसोलिनी के समय क्रमशः जर्मनी और इटली में आयोजन का उद्देश्य राजनितिक दृष्टिकोण से देश को शक्तिशाली बनाना था आज भारत देश को प्रगति के पथ पर ले जाने के लिए आर्थिक,सामाजिक राजनितिक ,वैश्विक सभी क्षेत्रों में काम करना है.पूर्ण रोजगार की प्राप्ति,आर्थिक असमानता को कम करना,गरीबी दूर करना,स्वच्छ भारत की स्थापना,वैश्विक पटल पर सुदृढ़ता ,साधनों का युक्तियुक्त विवेकपूर्ण प्रयोग कर अधिकाधिक प्रतिफल पाना,संतुलित क्षेत्रीय विकास ,तकनीक सामरिक आत्मनिर्भरता ,सामाजिक सुरक्षा,आर्थिक स्थिरता जैसे कई बिन्दुओं पर ध्यान देना है.

अब तक योजना आयोग का मुख्य कार्य योजना तैयार करना और उसकी प्रगति का मूल्यांकन करना था .यह केवल परामर्श दे सकता था विकास परियोजनाओं को कार्यान्वित करने का कार्य केंद्रीय तथा राज्य सरकारों का होता था. और लालफीताशाही भ्रष्टाचार तथा अकुशलता की संभावना बनी रहती थी .यह अनेक विभाग तथा उपविभाग के द्वारा काम करता है जो परामर्शदाता मुख्य या सह सचिव के अंतर्गत होते हैं कुछ विभाग निदेशकों के अंतर्गत काम करते हैं योजना आयोग का अध्यक्ष देश का प्रधानमंत्री होता है.प्रशासनिक कार्य एक उपाद्यक्ष तथा आयोग के अन्य नियुक्त तथा वैतनिक सदस्यों के निरीक्षण में होता है.कुछ अंशकालीन सदस्य मंत्री परिषद से भी होते हैं.यह एक सामूहिक समिति के रूप में कार्य करता है.उपाध्यक्ष योजना समन्वय योजना मूल्यांकन प्रशासन तथा आर्थिक विभाग के अंतर्गत विषयों का अधिकारी होता है.पूर्णकालिक सदस्य किसी एक ग्रुप के अधिकारी होते हैं ..उद्योग श्रम यातायात एवं शक्ति ग्रुप,कृषि एवं ग्रामीण विकास ग्रुप,दृष्ट योजना ग्रुप,तथा शिक्षा वैज्ञानिक अनुसंधान एवं सामाजिक सेवा ग्रुप.

नई गठित संस्था के लिए कुछ सुझाव यह हैं..

Copy of MY EXPERIMENTSसर्वप्रथम बात यह कि अब नई गठित संस्था एक स्वायत संस्था हो ; उसका संवैधानिक अस्तित्व अवश्य हो .इसे विभिन्न मंत्रालय के अधिकारियों से अनिवार्य रूप से विचार विमर्श की ज़रुरत ही ना पड़े.सदस्यों की नियुक्ति योग्यता और विशेषज्ञता (तकनीक और बौद्धिक) को ध्यान में रख कर हो.सदस्यों की अपेक्षित योग्यता और नियुक्ति के मानदंड तथा प्रक्रिया का लिखित विवरण अवश्य हो ताकि वे कभी भी मनमाने ढंग से नियुक्त या हटाये ना जा सकें. राजनीति प्रशासन से इसे पूर्णतः अछूता रखा जाए ताकि किसी भी प्रकार के दलगत आरोप प्रत्यारोप से संस्था मुक्त रहे और अपने कार्य की पारदर्शिता बरकरार रख सके.सरकार बदल जाने पर भी इस संस्था में बदलाव ना हो और यह अपने कार्य को निर्बाध पूरा कर सके और लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में अनवरत प्रवाहित रह सके.इस के तीन ही विभाग हों..प्रथम संस्था के निर्माण और रूप रेखा से सम्बंधित…दूसरा, क्षेत्रीय अनुसंधान कर कार्यों और लक्ष्यों की प्राथमिकता तय कर इसे क्रियान्वित करनेप्रशासनिक कार्यों से सम्बंधित विभाग हों ,और तीसरा  मूल्यांकन और नियंत्रण से सम्बंधित –तय समय सीमा के दौरान मॉनिटरिंग और कार्य पूर्ण होने पर मूल्यांकन करने वाले ….ये तीनों ही विभाग अलग अलग हों .सदस्यों और विभागों का रूप मात्रात्मक नहीं अपितु गुणात्मक हों ताकि संस्था के काम काज में मितव्ययिता बनी रहे.प्रोफ़ेसर श्री मन्ना नारायण जी की मानें तो “लोगों को इस बात का पूर्ण विश्वास होना चाहिए कि कराधान तथा सेवा शुल्क वगैरह के माध्यम से उनके द्वारा दी गई प्रत्येक पाई का उन के कल्याण और विकास के लिए समुचित रूप से व्यय होगा….”सबसे मुख्य बात साधनों के बंटवारे की होती है .चूँकि वित्त मंत्री बजट से सीधे तौर पर जुड़े होते हैं यह कह कर साधनों का वित्तीय बंटवारा उनकी जिम्मेदारी में दे देना उचित नहीं .अभी तक वित्तीय साधनों का बंटवारा वित्तीय आयोग की सिफारिशों पर किया जाता है पर कुछ मामलों में बंटवारा योजना आयोग भी कर देता है अतः वित्तीय साधनों के आबंटन में दुहरापन आ जाता है .इसके लिए किसी अन्य बौद्धिक वित्तीय विशेषज्ञ समिति को यह कार्य सौंपा जाए.यह एक लचीली संस्था हो जिसमें तेजी से आये वैश्विक और राष्ट्रीय स्थानीय परिवर्तनों के साथ समुचित परिवर्तन किया जा सके चाहे वह लक्ष्य निर्धारण से सम्बंधित हो या साधनों के आबंटन से सम्बंधित और ऐसा तभी संभव है जब इसे राजनीतिक प्रभाव से दूर रखा जाए.इसे सलाह मशवरा देने ,नियंत्रण रखने और दिशा निर्देशन के लिए एक निकाय की स्थापना हो जिसमें एक एक आर्थिक,सामाजिक,राजनितिक,वैश्विक,तकनीक विशेषज्ञ हों और चार या पांच थिंक टैंक हों ..देश में ईमानदार तथा दक्ष मनुष्यों की वृद्धि किये बिना बड़े पैमाने पर कोई भी कार्य करना और उसका समुचित प्रतिफल पाना संभव नहीं.इस संस्था के अध्यक्ष के रूप में कोई एक ऐसा व्यक्ति हो जो अर्थशास्त्री,वित्तीय विशेषज्ञ,तकनीक जानकारी,समाजशास्त्री होने के साथ साथ एक उच्च कोटि का जननीतिज्ञ भी हो .इस पद को देश का प्रधानमंत्री ही बखूबी निभा सकता है क्योंकि वह जनता के ही फैसले से आता है और उस जनता के कल्याण के प्रति उसकी पूर्ण जवाबदेही होती है.

संस्था के निर्माण में सार्वजनिक उत्साह और सहयोग की कोई कमी ना हो क्योंकि जैसा कि प्रोफ़ेसर लुइस कहते हैं ,“सार्वजनिक उत्साह किसी भी योजना को चिकनाने वाला तेल और आर्थिक विकास का पेट्रोल दोनों ही है-अर्थात एक गत्यात्मक शक्ति जो सब कुछ संभव बनाती है. और सबका साथ ;सबका विकास ‘के लक्ष्य के मद्देनज़र हमारे माननीय प्रधान मंत्री जी ने इस सार्वजनिक उत्साह से जन जन को लबरेज़ कर दिया है.


नई सोच की दिशा में एक नया कदम

नवदृष्टि लिए संस्था का हो नव रूपांतरण

विकास के सुगन्धित फूलों से अब

महक उठेगा अपना यह गुलशन

हमारा अभियान प्रगति पथ

सपनों ने है भर ली एक नई उड़ान

एक ही दिशा में हैं सबके चिंतन

सहयोगिता और सहभागिता ही

बन गई है हर दिल की धड़कन

हमारा अभियान प्रगति पथ



Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

8 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
October 13, 2014

अर्थ शास्त्र के गहन अध्यन के बाद ही कोई व्यक्ति ऐसे विषय पर अपनी व्यक्तिगत सलाह दे सकता है ,आपकी सोच बहुत उम्दा और व्यवहारिकता के करीब है आदरणीय यमुना जी ,बधाई .

sudhajaiswal के द्वारा
October 9, 2014

आदरणीया यमुना जी, उम्दा विचार और सुझाव हैं आपके, मैं भी शोभा जी की बातों से सहमत हूँ|

Shobha के द्वारा
October 8, 2014

प्रिय यमुना जी मोदी जी अपना ब्लॉग स्वयं देखते हैं क्योकि वह कुछ नया करना चाहते हैं नये विचार् लोगों के पास हैं आपने बड़े मनन से अपनी सोच की रूप रेखा बनाई है वह भी हिंदी में नरेंद्र मोदी हिंदी के ही व्यक्ति हैं आप इसे थोड़ा छोटा कर फिर डालें शायद mygov.inमें डाला होगा Gबड़ा है य छोटा मुझे डाउट कहते है मोदी जी रोज दो घंटे इसको देखत हैं डॉ शोभा

    sadguruji के द्वारा
    October 8, 2014

    आदरणीया डॉ शोभा जी ! mygov.in में बहुत संक्षिप्त जानकारी ही दी जा सकती है ! पूरा लेख कॉपी करके फेसबुक पर PMO Office पर प्रकाशित कर दें ! प्रधानमंत्री जी तक तो वो पहुँच ही जायेगा,इसके साथ ही बहुत से पाठकों के लिए भी ये विचारणीय लेख सुलभ हो जायेगा ! आपने सुझाव बहुत अच्छा दिया है !

sadguruji के द्वारा
October 8, 2014

आदरणीया यमुना पाठक जी ! सादर अभिनन्दन ! इस लेख में आपने अच्छा सुझाव दिया है ! अर्थशास्त्र और हिंदी मेरी उच्चशिक्षा के मुख्य विषय होने के कारण विषयवस्तु को समझने में ज्यादा कठिनाई नहीं हुई ! 64 साल पुराने योजना आयोग को ख़त्म करना जरुरी था ! वित्तीय साधनों के आबंटन में दुहरापन तो था ही,साथ ही भेदभाव भी बहुत था ! इसकी जगह पर नई संस्था बनाने का जो सुझाव आपने दिया है,वो बात मुझे विचारणीय लगी ! मेरे विचार से सबसे बड़ी बात ये है कि नई संस्था में देशवासियों की रूचि,विश्वास और किसी न किसी रूप में सहभागिता हो ! मुझे लगता है कि राज्यों को वित्तीय साधनों आबंटन वित्त आयोग के जरिए होगा ! मुझे संदेह है कि नई संस्था को स्वायत्त अधिकार दिए जायेंगे ! ये केवल एक परामर्श देने वाली संस्था भर होगी ! एक बात और हो सकती है,वो ये कि नई संस्था का अध्यक्ष पद भाजपा नेता व पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा जी को दिया जा सकता है ! अंत में आपसे मन की बात कहूँ तो ये सब ड्रामे अपने दल के बुजुर्ग नेताओं को ससम्मान विदा करने के लिए किये जाते हैं ! देशहित सोचनेवाला कोई भी बुद्धिजीवी ऐसी संस्थाओं के भीतर न तो प्रवेश कर पाया है और न कभी कर पायेगा ! भाजपा कांग्रेस से बेहतर जरूर है,लेकिन अपने बुजुर्ग नेताओं को कोई न कोई पद देकर उपकृत करने के मामले में वो कांग्रेस से भी दो कदम आगे है,चाहे वो राज्यपाल के पद हों या फिर किसी नई बननेवाली संस्था के ! सार्थक,अतिसुन्दर और विचारणीय प्रस्तुति के लिए आभार और आपके देशप्रेम के जज्बे को सलाम !

    yamunapathak के द्वारा
    October 8, 2014

    आदरणीय सद्गुरू जी आपकी प्रतिक्रिया से सहमत हूँ.आपके अनुमान सही भी हो सकते हैं. साभार

Shobha के द्वारा
October 7, 2014

प्रिय यमुना जी बहुत ही शानदार लेख लिखा है पूरा अर्थशास्त्र पढ़ा दिया यह लेख मोदी जी की वैबसाइट में डालने के के योग्य है उनके चुनाव अभियान में काम आएगा पी -२ के पी-३ उनमें से प्रत्येक पी में सार्थक दो- दो पी एक भी पी निरर्थक नहीं है यमुना जी आपका अर्थशास्त्र बहुत ही स्पष्ट हैं मोदी जी की अनुनय है लोग उन्हें सुझाव दें बहुत ही सार्थक सोच प्रोग्रेस का पूरा सूत्र है मोदी जी की वेबसाइट पर जल्दी डालिए नहीं तो कोइ स्मार्ट इसे थोडा बदल कर लेख बना लेगा डॉ शोभा

    yamunapathak के द्वारा
    October 8, 2014

    आदरणीय शोभा जी नमस्कार ये ब्लॉग मैंने सेंड तो किया है दरअसल मेरा मानना है की बिना किसी प्लानिंग के कहीं भी पहुचना मुश्किल होता है चाहे रास्ते जाने पहचाने हों या फिर अज़नबी हाँ उनका नाम रूप कलेवर संरचना साधन समयानुसार बदले जा सकते हैं आपकी प्रतिक्रिया से सहमत हूँ .इसे भेज चुकी हूँ.आपका अतिशय धन्यवाद साभार


topic of the week



latest from jagran