Aatamaabhivyakti

extremely CRUDE ; completely PURE

250 Posts

3091 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 9545 postid : 790092

सिर्फ रावण ही क्यों जले !!!

Posted On: 29 Sep, 2014 कविता,Junction Forum,Special Days में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

वज़ूद औरतों का भी बचा कर रखिये

सिर्फ मर्दों से ही कुदरत चला नहीं करती

Backgrounds

पराई अमानत नहीं;तुम्हारी अपनी बेटी

नारी के मान सम्मान को बढ़ाता नवरात्रि का यह पर्व हर वर्ष दो बार स्त्रियों के प्रति हमें बहुत संवेदनशील कर देता है ..दहेज़ प्रथा,बलात्कार,घरेलू हिंसा,यौन अत्याचार,जैसे ना जाने कितने महिषासुर को खत्म करने के संकल्प से भारतीय समाज की भुजाएं फड़कने लगती हैं….इस अवसर पर कन्याओं का विशेष सम्मान उनकी पूजा… करता भारतीय समाज कन्या भ्रूण हत्या ,बाल विवाह जैसे शुम्भ निशुम्भ को मार गिराने के लिए प्रतिबद्ध दिखाई देता है....पर अफ़सोस यह कि भारतीय समाज बेहद विरोधाभासी है.एक तरफ कन्या जन्म पर पांच वृक्ष लगाकर विवाह का खर्च उठाने की बात कर अनजाने ही दहेज़ के दानव को मरने नहीं देता दूसरी तरफ लिंग असमानता पर अफ़सोस भी करता है .आप ही बताइये क्या दहेज़ प्रथा के कारण भी कन्या का जन्म वित्तीय बोझ नहीं माना जाता …परिवार में दो पुत्र का जन्म हो जाएं तो कोई बात नहीं दो पुत्रियां हों तो दस वृक्ष ज़रूर लगा लेना ताकि उनके विवाह के समय दहेज़ लोलुप पुत्रों को उनके अभिभावक को संतुष्ट कर सकें ….फिर स्त्री पुरूष लिंगानुपात कैसे संतुलित रह सकता है ….या तो उन्हें जन्म ना लेने दो या फिर जन्म लें तो दहेज़ की बलि चढ़ जाने दो ….ऐसा क्यों ना हो कि वर और वधू दोनों के माता पिता पाँच- पाँच वृक्ष लगाएं और सहभागिता से विवाह का खर्च आधा आधा बाँट लें ….ऐसा ही उचित है क्योंकि आज माता पिता पुत्री को भी वही शिक्षा दे रहे हैं जो पुत्रों को मिल रही है.संतान पुत्र हो या पुत्री हमें लिंग विभेदीकरण के भाव से ऊपर उठना ही चाहिए …वह सिर्फ संतान है ना पुत्र ना ही पुत्री …और यह भाव सबसे पहले घर की स्त्री ही उत्पन्न कर सकती है .. ऐसे निर्णयों और भाव के साथ उसकी प्रतिबद्धता को कोई चुनौती नहीं दे सकता .बेटियों की शिक्षा के बावजूद दहेज़ देने की मज़बूरी क्यों रहती है.हमारे समाज में बेटियों के विवाह में दहेज़ का विरोध करने वाले ही बेटों की शादियों में खुल कर दहेज़ की मांग करते हैं. गलती तो यहीं से शुरू हो जाती है.हाल ही में मेरे एक रिश्तेदार की बेटी ने (बैंक में पी ओ ) जिसका विवाह भी बैंक में पी ओ के पद पर आसीन लडके से तय हुआ था जब होने वाले श्वसुर से कहा ,”आप मेरे माता -पिता से दहेज़ में कार और नगद की मांग कर रहे हो जब कि मैं स्वयं कमा रही हूँ ..मैं इस शादी से इंकार करती हूँ …तो लगभग सभी ने उस बेटी का ही विरोध किया पर उसने भी स्पष्ट कह दिया ,”मुझे अपनी ज़िंदगी जीने का अधिकार है.पर सवाल वही कि ऐसा कब तक चलता रहेगा ??दहेज़ के इस दानव को समाप्त करना बहुत आवश्यक है. Backgrounds3विजयादशमी के अवसर पर प्रतिवर्ष रावण दहन की परम्परा तो मुझे और भी ज्यादा उद्वेलित करती है .रावण प्रकांड विद्वान और शिव भक्त भी था .और उसे आज तक गलती की सज़ा दी जा रही है …सच कहूँ तो जब एक बार उसे राम जी द्वारा मार दिया गया तो पुनः हर वर्ष उसे मारने की परम्परा बुराई की संरचना कर उसका प्रतिकार करते रहने का एक दुष्चक्र के सिवा कुछ और नहीं है. रावण दहन के साथ दहेज़,अनाचार,अत्याचार,उत्पीड़न के ऐसे दानव जिनका दहन नहीं होता बल्कि वे दर्द की तपन देते हैं क्या उन्हें समूल नष्ट करने की इच्छाशक्ति की कोई अग्नि समाज प्रज्ज्वलित करता है ???क्या हर बेटी यह कहती सुनाई देती है ‘मैं पराई अमानत नहीं;तुम्हारी अपनी बेटी हूँ ‘….क्या रावण दहन कर हम अपने अंदर के रावण को समाप्त कर पाते हैं ? ??कल बच्चों की एक फैन्सी ड्रेस प्रतियोगिता में एक सात वर्ष के बच्चे को रावण बने देखा .मज़े की बात यह कि उसके नौ सिर ही थे ..बीच में उसके स्वयं के सिर के दोनों तरफ चार चार सर ..मुझे अच्छा लगा क्योंकि वह ऐसा कर संतुलित रह पा रहा था …रावण के दस सिरों में संतुलन .कैसे हो सकता है …ठीक मध्य में तो कोई भी सिर नहीं था …..यह भी प्रतीकात्मक है जब हमारी बुद्धि विवेक में संतुलन नहीं होता तब हम पथ भ्रष्ट होने लगते हैं…रावण के दस सर तो फिर भी दृष्टिगोचर होते हैं पर हम में से प्रत्येक के एक सर के पीछे छुपा नौ सर प्रत्येक रावण दहन के अवसर पर और भी ज्यादा अहंकारी हो उठता है यह क्यों नहीं दिखाई देता ? ????? एक पापी को पत्थर मारने के सवाल पर जब यह बात सामने आती है कि पहला पत्थर वही उठाये जिसने कभी कोई पाप नहीं किया तो पत्थर लिए हज़ारों हाथ क्यों झुक जाते हैं ….चलो अच्छा है उस मूवी में हाथों में पत्थर लिए लोगों में कम से कम इतनी ईमानदारी तो है कि वे इस प्रश्न की नैतिकता से जुड़ जाते हैं हाथ नीचे कर लेते हैं .पर रावण को जलाने वाले हज़ारों लाखों हाथ क्या अपने निष्पाप होने के आत्मविश्वास से भरे होते हैं ????तो फिर सिर्फ रावण ही क्यों जले ??/प्रतीकात्मक ही सही प्रत्येक घर में अपना  भी एक पुतला बना कर जलाया जाए.

जब रामायण की शुरुआत की बात करें तो राजा दशरथ की रानी कैकेयी भी नारी समाज को मार्ग दिखाती है. .एक बुद्धीजीवी स्त्री होने के बावजूद वे मंथरा जैसी दासी के बहकावे में आ गईं अपने विवेक बुद्धि से अपने परिवार के हित की बात उन्हें नहीं सूझी .स्त्रियां प्यार,समर्पण त्याग करूणा की मूरत होती हैं पर कैकेयी ने तो अपने प्यार और सेवा के बदले दशरथ जी से स्वकेंद्रित होकर मांग रखी …परिवार हित या समाज हित को विस्मृत कर गईं .जो स्वीकार्य नहीं हो सकता.आज समाज में कुछ स्त्रियों के उदाहरण मिल जाते हैं जो घरेलू सहायिकाओं के बातों में आकर अपना घर परिवार बिगाड़ बैठती हैं .कुछ अपने पति से प्रेम और समर्पण के बदले उनसे कुछ अस्वीकार्य मांग कर बैठती हैं जो परिवार के हित में सही साबित नहीं होता .कैकेयी के किरदार के द्वारा हमें यह समझने की ज़रुरत है कि हम अपने पति से ऐसी कोई मांग न करें जो परिवार के हित में न हो. एक बात यह भी गौर तलब कि सीता जी के स्वर्ण मृग को देख कर उसे लाने का आग्रह करना भी हम स्त्रियों के लिए एक प्रतीकात्मक शिक्षा देता है…कोई वस्तु कितनी भी लुभावनी ,मनमोहक हो उसे हासिल करने की हमारी लालसा हमारे परिवार जनों को किसी बड़ी परेशानी में डाल सकती है.आज कुछ स्त्रियां जिन्हे आवश्यकता और लालसा में फर्क नहीं समझ आता ;सोने चांदी के आभूषणों ,आकर्षक वस्तुओं की खरीदारी के लिए या महज़ अपने शौक की पूर्ति और आपसी प्रतियोगिता के लिए घर के पुरुषों को गलत ढंग से आय अर्जित करने के लिए प्रेरित कर देती हैं. स्त्रियों को इस प्रवृत्ति से दूर रहने की आवश्यकता  है . (नोट : भारतीय संस्कृति के महान आदर्श और त्याग की प्रतीक देवी सीता मेरे लिए पूजनीय हैं मैं उनके प्रति असीम श्रद्धा भाव रखती हूँ कृपया इसे सहजता से स्वीकारा जाए ) वरात्रि ,विजयादशमी जैसे पर्व त्यौहार से जुडी परम्पराओं का निर्वाह संस्कृति की शाश्वतता के लिए आवश्यक है तो इसे सही विधि से स्वपरिष्करण का साधन मानना इसे प्रासंगिक बनाये रखने के लिए अपरिहार्य है.घर परिवार समाज में सृजन का अधिकार कुदरत ने स्त्री को ही दिया है.ज़रुरत है वह सृजन के साथ परिष्करण भी करती रहे.चूँकि स्त्री भावप्रधान होती है अतः वह अपने प्यार सद्बुद्धि शक्ति से सही दिशा निर्देशन की क्षमता भी रखती है.वह समाज की प्रत्येक विकृति की कॉस्मेटिक सर्जरी करने वाली कुशल सर्जन बन सकती है ..बस ज़रुरत है एकता ,दृढ़ता और सही अर्थों में नारी शक्ति प्रदर्शन की …इस के लिए उसे पुरुषों से ना तो आचार विचार उधार लेने की ज़रुरत है ना ही खान पान और पहनावा की…वह अपने नारी स्वरुप में ही जहां खड़ी हो जाए वहां वह ना + अरि है …ना किसी की दुशमन …ना कोई उसका दुश्मन … ज ज़रुरत है स्त्री अपने बुद्धि ,विवेक ,प्रज्ञा का घर परिवार समाज के सही दिशा निर्देशन में प्रयोग करे.आज स्त्रियों के शक्ति का सूर्य स्वयं के अस्तित्व ,सुरक्षा ,मान सम्मान के प्रति एक भय संशय अनिश्चितता के मेघों से ढक गया है जिसे दूर करने के लिए एकता स्वज्ञान स्वशक्ति के भान की तेज हवा की ज़रुरत है…..

आज उसे कुछ याद नहीं कि कौन सा ये साल है

पर पूछती स्वयं से क्यों अस्मिता मेरी हलाल है ….

कल तक थी शांत धरा आज भयंकर भूचाल है

शान्ति की मूरत थी कभी अब हाथ में करवाल है …..

शोलों सी जलती आँखें लब पर एक ही सवाल है

समाज में इतनी विकृतिया कहाँ क़ानून बहाल है ….

क्रान्ति का जब करती नाद न परिवार बना ढाल है

परित्यकता हो कर भी समक्ष समाज के विकराल है …..

चुप रहे आखिर कब तक जब समाज का ये हाल है

शांत दरिया के उफान पर फिर क्यों करे कोई मलाल है…..

देख लो हर रिश्ते में वह चाहे वृक्ष से टूटी एक डाल है

बुझी किस्मत रोशन करने हाथ में ली जलती मशाल है ….

दीन दुखी अबला कब ; वह आज भी साक्षात त्रिकाल है

नारी सदियों से रही सशक्त स्वयं में ही एक मिसाल है ……

बदलती है रूप तस्वीर का जिस पर अत्याचार का जाल है

यह कमल खिल उठता वहीं कीचड से भरा जहां ताल है ….

नाद गूंजे ‘विजयी भव ‘का चहुँ ओर ऐसा एक बवाल है

यह वह हर वक़्त तुम्हारा, सबला तुमसे ही हर काल है.

शुभ नवरात्रि शुभ विजयादशमी



Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

7 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
October 3, 2014

आदरणीया यमुना पाठक जी ! अभिनन्दन और विजयदशमी की बधाई ! आपका लेख बहुत सार्थक और विचारणीय है ! आज सुबह दैनिक जागरण में इस लेख सम्पादित अंश पढ़ा ! आपके पिछले लेख का भी कुछ अंश अभी कुछ रोज पहले सम्पादकीय पेज पर छपा था ! अच्छे लेखों के सम्पादित अंश अख़बार में छपा देखकर बहुत ख़ुशी होती है ! आपके यहाँ दैनिक जागरण अख़बार नहीं मिलता होगा,इसीलिए मैंने सोचा कि आपको खबर कर दूँ ! आपका लेख पढ़कर एक नई चीज मैं सोच रहा था कि यदि रावण अर्द्धनारीश्वर होते अर्थात उनमे पुरषोचित के साथ स्त्रियोचित गुण भी होते तो वो राम के द्वारा नहीं मारे जाते ! मुझे लगता है कि यदि स्त्री और पुरुष दोनों भगवन शिव की तरह से अर्धनारीश्वर हो जाएँ संसार की अशांति और दुःख बहुत हद तक कम हो जाये ! विचारणीय वैचारिक प्रस्तुति के लिए आभार !

    yamunapathak के द्वारा
    October 4, 2014

    आदरणीय सदगुरू जी आप के विचार बिलकुल सही हैं…किसी भी व्यक्ति का आदर्श शिव के अर्धनारीश्वर स्वरुप में ही निहित है …पुरूष जब स्त्रियोचित गुणों प्रेम,करूणा,दया ,त्याग को अपनाता है और स्त्रियां जब साहस ,दृढ संकल्प चुनौती स्वीकारने जैसे पुरुषोचित गुणों से भर जाती हैं तभी शिव और शक्ति मिलकर संसार को धन्य कर जाते हैं . आपकी प्रतिक्रिया मुझे प्रत्येक ब्लॉग में कुछ नए की जानकारी दे जाती है …आपका अतिशय आभार

priti के द्वारा
October 3, 2014

सुन्दर ! सार्थक और विचारोत्तेजक ,आप बहुत अच्छा लिखती हैं .

    yamunapathak के द्वारा
    October 4, 2014

    प्रीती जी आपका अतिशय धन्यवाद …मुझे भी आप सब ब्लॉगर साथियों के ब्लॉग्स बहुत अच्छे लगते हैं मैं प्रत्येक दिन जितना हो सकता है वे ब्लॉग ज़रूर पढ़ती हूँ

Shobha के द्वारा
October 1, 2014

प्रिय यमुना जी में आपके विचारों की फैन हो गई स्त्रियाँ आधी वोटर हैं यदि एक हो गई सत्ता उल्ट जायेंगी | शोभा

Shobha के द्वारा
September 29, 2014

यमुना जी नवरात्रि की शुभ कामना बहुत अच्छा लेख जिस तरह आपने रामायण व्याख्या की है बिलकुल आधुनिक संदर्भ लगता है आपने स्त्री अपनी विवेक प्रज्ञा का—बहुत अच्छी बात है आज जरूरत ऐसी बात की है आपने पूरा समाज शास्त्र हमारे सामने रखा है अंत में” यह वह हर वक्त तुम्हारा ,सबला तुमसे ही हर काल है.” पूरा आशा वाद हैं डॉ शोभा

    yamunapathak के द्वारा
    September 30, 2014

    आदरणीय शोभा जी स्त्रियों की पीड़ा स्त्री ही दूर कर सकती है …एक माँ अपने बच्चे को सही शिक्षा दे तो वह प्रत्येक स्त्री का सम्मान करे .दहेज़ प्रथा के विरोध में भी पुत्र की माँ इसका विरोध करे …जेंडर डिस्क्रिमिनेशन को ना स्वयं स्वीकारे ना इसे घर पर प्रयोग करे …..घरेलू हिंसा के विरोध में घर की स्त्री ही उसे मदद कर सकती है…भ्रूण हत्या को सिरे से ख़ारिज करे संतान को जन्म देने का उसे अधिकार है फिर चाहे वह पुत्र संतान हो या पुत्री …अपने स्त्री रूप में ही वह गौरवान्वित हो….खेल अंतरिक्ष विज्ञान गीत संगीत लेखन ऑटो चालक ,इंजन चालक …..हर क्षेत्र में उसने अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा दी है …फिर उसे हताश होने की ज़रुरत नहीं है…पुरूष स्वभावतः कठोर होता है पर स्त्री की कोमलता और विवेक बुद्धि की रक्षा भी करता है ठीक उसी तरह जैसे गुलाब की कोमलता की रक्षा कांटे करते हैं कभी उसके खिलने के मार्ग में बाधक नहीं बनते…..आप ही बताओ क्या कभी किसी गुलाब ने यह शिकायत की कि कांटे उसे खिलकर सुगंध बिखेरने नहीं दे रहे हैं …बस ज़रुरत है गुलाब के पौधे रूपी समाज में फूल रूपी स्त्री की कोमलता और कांटे रूपी पुरुष की कठोरता एक दूसरे की सहायक बने …गुलाब का अस्तित्व भी उन काँटों की वज़ह से ही बच पता है.और कांटे गुलाब की वज़ह से ही कुदरत का अंग बन पाते हैं . ब्लॉग पर आपने अपना बहुमूल्य समय दिया आपकी आभारी हूँ.


topic of the week



latest from jagran