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ट्रिप्लेट ऑफ़ ' टॉयलेट,टैप,ट्रेनिंग '

Posted On: 5 Sep, 2014 Others,social issues,lifestyle में

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माननीय प्रधानमंत्री जी ने स्वाधीनता दिवस और शिक्षक दिवस दोनों ही अति विशेष अवसरों पर जिस एक बहुत ही तुच्छ समझे जाने वाले मगर बेहद ज़रूरी मुद्दे को जनता के सामने रखा और अपनी संवेदनशीलता से अवगत कराया …..वह है शौचालय की व्यवस्था .

शौचालय से सम्बंधित स्वच्छता महिलाओं के लिए आत्मसम्मान के साथ सुरक्षा से भी जुड़ा मुद्दा है.घर पर शौचालय के अभाव में सामान्य महिलाओं के अलावा गर्भवती महिलाओं और महीनों के कुछ विशेष दिनों का सामना करने वाली महिलाओं को बहुत दिक्कत हो जाती है.है.प्रियंका ने जब शौचालय के अभाव की वज़ह से अपनी ससुराल छोड़ी तो लोग हँसते ताना देते थे ,”कैसी महिला है इतनी छोटी सी बात के लिए ससुराल छोड़ आई पर उसके पति ने उसकी सही सोच में उसका साथ दिया.स्वयं प्रियंका के शब्दों में ‘”पति ने कहा मैं सोच ही नहीं पाया कि शौचालय से सम्बंधित समस्या इतनी महत्वपूर्ण है.”और आज सब प्रियंका को कहते हैं ,”तुमने बहुत नाम कमाया अच्छी सोच की दिशा में लोगों को ले गई.” .बैतूल.कुशीनगर सभी स्थानों से महिलाओं ने आवाज़ उठाई .श्री बिन्देश्वरी पाठक जी ने सुलभ शौचालय की दिशा में कदम उठाया था .आज ज़रुरत है शौचालय प्रत्येक घर में हों .आंकड़े बताते हैं कि बिहार के ७६% झारखण्ड के ९२% छत्तीसगढ़ के ७५% घरों में शौचालय नहीं हैं .कई गाँव में शौचालय बनाये गए पर उनमें से कुछ साफ़ सफाई के अभाव में इस्तेमाल नहीं होते ,कुछ बारिश के दिनों में उपले रखने और मवेशी बांधने के लिए इस्तेमाल हो रहे हैं.गाँव के कई विद्यालयों में भी यह आधारभूत सुविधा नहीं है पर जहां है वहां के भी हालात ऐसे हैं कि उन शौचालयों का इस्तेमाल करना बहुत मुश्किल है.गन्दगी से पटे शौचालय अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराते हैं पर इस्तेमाल नहीं हो पाते. इसके पीछे दो मुख्य समस्या है …प्रथम; पानी के टैप की समुचित व्यवस्था का अभाव और दूसरी टॉयलेट ट्रेनिंग की कमी. शौचालय इस्तेमाल के बाद उसे साफ़ छोड़ने की व्यवस्था सरकार का काम नहीं बल्कि इस्तेमाल करने वाले का सामजिक और नैतिक कर्त्तव्य है.हम सब जानते हैं एक कुत्ता भी अगर किसी स्थान पर बैठता है तो उस स्थान को पहले अपनी पूँछ से साफ़ कर देता है फिर वहां बैठता है .जब एक जानवर गन्दगी से परहेज़ रखता है तो हम सब तो इंसान हैं क्या हम इस्तेमाल कर शौचालय को औरों के इस्तेमाल के लिए साफ़ नहीं छोड़ सकते हैं.?विद्यार्थियों को पठन पाठन के अतिरिक्त इस बात की शिक्षा देनी भी ज़रूरी है.कल ही इसी मुद्दे से सम्बंधित कार्यक्रम में टी वी पर बच्चों के इंटरव्यू देख रही थी .जब एक बच्ची से पूछा गया कि टॉयलेट इतना गंदा है आप इस्तेमाल कैसे करते हो …तो उसका सीधा ज़वाब था,”हम इसे इस्तेमाल नहीं करते …हम घर से ही फ्रेश होकर आते हैं.” ऐसे में वाकई यह एक चिंतनीय विषय है कि इस्तेमाल करने के लिए बने संसाधन का इस्तेमाल क्यों नहीं हो रहा है और यह उस संसाधन पर लगे निवेश की बर्बादी है कि नहीं .लोगों में जागरूकता लाना ज़रूरी है.

गाँव या सरकारी विद्यालयों की ही बात नहीं है यह गैर जिम्मेदाराना व्यवहार हम शिक्षित लोगों में भी देखते हैं.एक मॉल के सिनेमा हॉल में मेरा सामना ऐसी ही एक महिला से हुआ .मैं जब उस अत्यंत साफ़ -सुथरे टॉयलेट के इस्तेमाल के लिए गई तो वहां की सफाई कर्मचारी ने लगभग चिल्ला कर कहा,” ओ मैम , आप भी नीचे फर्श को गंदा मत करना .” ऐसी बात सुन कर स्वाभाविक था कि किसी को भी नाराज़गी होती . मैंने अपने परिधान को देखा शायद साड़ी ब्लाउज में सलीके से आँचल संभालती मैं उसे कुछ असभ्य सी लग रही होउंगी…पर मेरा यह भ्रम दूर हुआ क्योंकि उसकी भनभनाहट जारी थी जिसे मैं अंदर से साफ़ साफ़ सुन सकती थी ..वह बड़बड़ाये जा रही थी…”चली आती हैं जींस टॉप में आधुनिक बन कर और तमीज के नाम पर शून्य हैं बच्चों को टॉयलेट ट्रेनिंग भी नहीं दे सकतीं मेक अप देखो तो इतना ज्यादा .” अब मुझे उसकी नाराज़गी स्पष्ट समझ में आ रही थी .मैंने अपनी सहेली से कहा ,”यार यह तो गलत बात है कितना साफ़ यह टॉयलेट है और शिक्षित सभ्य लोग भी इसे गंदा करने से बाज़ नहीं आते .”उसने लापरवाही से कहा ,”छोड़ ना यार,क्या फर्क पड़ता है ;उसे इसी काम के लिए रखा गया है और उसे पैसे भी मिलते हैं और तू ना अपने अंदर की ये समाज सेविका को मार दे वरना एक दिन खुद मरेगी .” अजीब सी बात थी .मैं सोचती रही जहां सारी सुविधाएं होने पर भी लोग टॉयलेट का इस्तेमाल जिम्मेदारी से नहीं करते फिर जहां पानी के नलों की सुविधाएं नहीं होती होंगी वहां तो शौचालय बस कंक्रीट का कूड़ादान ही होता होगा.ऐसा कितनी बार हुआ है कि सफर के दौरान किसी ढाबे होटल या सड़क के किनारे बने टॉयलेट का इस्तेमाल हम सिर्फ इसलिए नहीं कर पाते कि अपनी ज़रुरत पूरी हो जाने पर किसी ने दूसरों की ज़रुरत का कोई ख्याल नहीं किया था.कितनी बार तो ढाबों या होटलों के मालिक को कहते सुना है ,”क्या करूँ मैडम अब महिलाओं को कुछ बोल भी नहीं सकते ,हमेशा तो स्वीपर खड़ा नहीं रहेगा वह दिन में एक बार साफ़ कर चला जाएगा .”बात उनकी बिलकुल सही है .हमारी खुद की नैतिक जिम्मेदारी की शिक्षा पर मैं क्षुब्ध हो जाती हूँ .

अपने घरों में हम प्रतिदिन स्वयं ही शौचालय की सफाई कर लेते हैं और सार्वजनिक शौचालय के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं रखते हैं.हमें स्वयं को ,अपने बच्चों को यह प्रशिक्षण देना ही होगा कि टॉयलेट्स का होना एक महत्वपूर्ण बात है पर उसको साफ़ रखना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है.पक्के फर्श पर पड़े मल बीमारी का कारण होते हैं और होटलों ढाबों के आस पास तो भोजन पर भी यह गन्दगी असर करती है.अगर सार्वजनिक स्थानों पर हमारी ज़रुरत का ध्यान रखा जाता है तो यह हमारा कर्त्तव्य है कि हम उस ज़रुरत के संसाधन के प्रति सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी अवश्य रखें .अगर समय पर ये संसाधन उपलब्ध ना हों तो हम सब मुश्किल का सामना करते हैं फिर भी इसे इस्तेमाल के बाद साफ़ सुथरा नहीं छोड़ते यह हमारी बहुत बड़ी भूल है.

चलिए हम सब प्रधानमंत्री जी की इस संवेदनशीलता के साथ अपनी समझदारी ,सामाजिक जिम्मेदारी की जुगलबंदी करें और स्वच्छता के लिए 3 टी के triplet ( toilet , tap , training ) को अपनाएं .टॉयलेट के निर्माण के साथ पानी के टैप की व्यवस्था हो और इसके साफ़ सफाई रख रखाव की ट्रेनिंग लें भी दें भी . इसे इस्तेमाल के बाद साफ़ छोड़ा जाए ताकि दूसरों को इसे इस्तेमाल करने में कोई असुविधा न हो .



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17 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
September 12, 2014

आदरणीय संचालक महोदय जी यमुना का सादर नमस्कार मान्यवर, पिछले कुछ दिनों से मैं जब भी ब्लॉग टाइप करने की कोशिश कर रही हूँ HTML पर क्लिक करने से कोई रिजल्ट नहीं मिलता और शब्द बिलकुल टाइप नहीं हो रहे हालांकि dash बोर्ड ओपन हो जाता है.आप को मालूम है अपने इस अनुपम मंच से दूर मैं ज्यादा देर नहीं रह सकती,ब्लॉग्स लिखने के लिए हिन्दी दिवस सा अवसर चूक ना जाऊं मेरे लिए यह भी एक अहम बात है ..कई विषयों पर विचार हैं ब्लॉग का ड्राफ्ट भी तैयार नहीं कर पा रही हूँ .आशा है आप इस दिशा में मेरी त्वरित मदद करेंगे.मैं कृतज्ञ हूँ कि हमें आपने एक ऐसा प्लेटफार्म दिया जो पूर्णतः निःशुल्क है और हम सब हिन्दी भाषा के बहुत ही अदने से ब्लोग्गेर्स को अपने विचार इतने प्रतिष्ठित माध्यम से साझा करने का सुअवसर दिया है .आप को पता है इस सम्मानीय मंच से जुड़ कर मुझे अब सिर्फ सामाजिक ,आर्थिक ,विषयों की तरफ रूझान के साथ साथ राजनीति जैसी कभी रुचिकर ना लगाने वाले विषय के प्रति भी रूझान हो गया है.जब किसी संस्था से हम इस तरह लाभान्वित होते हैं तो हमारी रूचि और सम्मान दोनों ही संस्था के प्रति दुगुनी रफ़्तार से बढ़ने लगती है. हिन्दी दिवस पर इस प्रतिष्ठित अनुपम मंच की वैचारिक दुनिया से जुड़े प्रत्येक सदस्य को बहुत सारी शुभकामना आपका अतिशय धन्यवाद.

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
September 10, 2014

 आदरणीय यमुना जी, आपका यह लेख पढ कर मन प्र्शन्न हो गया । एक ऐसा विषय जिस पर कोइ  लिखने की बात सोच भी नही सकता , आपने एक अच्छा लेख लिख डाला और उन चीजोँ की ओर ध्यान आकर्षित किया जिन पर हम अक्सर गँभीरता से सोचते ही नही । सभी अवसर आने पर खीजते जरूर हैँ लेकिन शायद यह नही समझ पाते कि इसके लिए हम ही जिम्मेदार हैं । आपने जो चित्र प्रस्तुत किया है वही आज का , हमारे समाज का व व्यवस्था का सच है ।

    yamunapathak के द्वारा
    September 12, 2014

    बिष्ट आपका बहुत बहुत आभार आप सोचिये जब हमारे प्रधान मंत्री जी इस विषय पर इतने महत्वपूर्ण दिन इस विषय पर बोल सकते हैं तो हम तो बहुत अदने से लोग हैं.अव्वल तो सभी सरकारी संस्थानों में शौचालय की व्यवस्था नहीं है और जहां है वहां गन्दगी और टूटे दरवाज़े ,टूटे फर्श ,और पानी की असुविधा की वज़ह से वे ABANDONED ही हैं.जो धन राशि इस मद के लिए दी भी जाती है उसके खर्च पर कोई मॉनिटरिंग ही नहीं है.कुछ आँगन बाड़ी के टॉयलेट ना तो बेबी फ्रेंडली है ना ही उनमें छत या दरवाज़े हैं . देश में एक तरफ ऐसे आलीशान टॉयलेट्स हैं जहां बैठ कर हम अखबार मैगज़ीन पढ़ सकते हैं पूरा दिन खुशी खुशी बिता सकते हैं और दूसरी तरफ जहां के आस पास हम फटकना भी नहीं चाहते …. इंडिया और भारत के बीच के अंतर का यह भी एक पैमाना है . साभार

pkdubey के द्वारा
September 8, 2014

इस देश की मूल समस्या तो यही है आदरणीया ,इंसान अपने आगे किसी की सुनता ही नहीं |अपनी धुन में मस्त रहकर जो जी चाहे वो करो ,गुटखा चबाओ और ट्रैन की खिड़की और stairs के कार्नर ,यहाँ तक की मंदिरों की दीवालें भी लाल रंग के पीक से रंग दो ,यदि एक इंसान मल -मूत्र  त्याग करने का सलीका भी न सीख पाया तो जीवन जीने से क्या फायदा ?आप का लेख आज के भारत की गंभीर समस्या है ,सादर आभार |

    yamunapathak के द्वारा
    September 12, 2014

    दुबे जी ब्लॉग पर आने का बहुत बहुत धन्यवाद विद्या बालन का वह अड़ देखा है ना जिसमें वह कहती है “अगर सोच सही हो तो सब सुनते हैं”बात में दम है हम सब अपनी अपनी स्थानीय विषयों के साथ प्रयोग शुरू कर सकते हैं.जितना सामर्थ्य हो उतना ज्यादा दूर जाने की भी ज़रुरत नहीं है . साभार

nishamittal के द्वारा
September 7, 2014

सार्थक पोस्ट यमुना जी

    yamunapathak के द्वारा
    September 7, 2014

    धन्यवाद निशा ji

kavita1980 के द्वारा
September 7, 2014

बहुत सही कहा आपने यमुना जी जहां तक टॉयलेट की सफाई का प्रश्न है मैं समझती हूँ की इन्डियन स्टाइल  टॉयलेट हमारी मानसिकता के हिसाब से अधिक सही हैं जिनका निर्माण अधिक होना चाहिए क्यूँ की थोडा गन्दा होने की स्थिति में भी हम उसे अनिक्षा से ही सही मजबूरी मान के ही सही इस्तेमाल कर सकते हैं मगर युरोपियन तोय्लेट्स को तो अगर एक ने भी सफाई से इस्तेमाल नहीं किया तो उसे इस्तेमाल नहीं किया जा सकता न ही वोहाइजेनिक होगा यही वज़ह है कीमौल जैसी जगह में पढ़े लिखे लोग-महिलाएं भी इनटॉयलेट्स को इस्तेमाल नहीं करना चाहती– कमोड्स भी दें क्यूँ की जोड़ों से परेशान लोगों की मजबूरी है मगर अधिक तर इंडियन सिस्टम का ही निर्माण हो तो शायद कुछ प्रतिशत फर्क अवश्य पड़ेगा ऐसा मुझे लगता है बाकी ये तो निर्विवाद सत्य है की जब तक हम खुद अपने को नहीं सुधारेंगे समाज नहीं सुधर सकता और हम यूँ ही सरकार को कोसते रहेंगे

    yamunapathak के द्वारा
    September 7, 2014

    kavita jee aapkee bat se main sahmat hun ….kai bar paschim sabhyata ko apna to liya jata hai par uskee training naheen ho patee . sabhar

अवी के द्वारा
September 6, 2014

यमुना जी, आपका लेख पढ़ा| स्वच्छता की आवश्यकता और हमारी स्वच्छता के प्रति अति उदासीनता पर आपके विचार काबिले-गौर हैं| मैं स्वयं भी थोडा बहुत लिखता रहता हूँ और इस विषय पर प्रधान मंत्री जी के १५ अगस्त के भाषण के बाद अपने ब्लॉग पर कुछ कहने की कोशिश की है| मेरा लेखन थोडा व्यंग के अंग को ले कर रहता है अतः शायद आपकी जैसी संजीदगी मेरे लेख में ना मिले, पर हमारे समाज की स्वच्छता के प्रति, अति उदासीनता पर टिपण्णी अवश्य है| यदि आप समय निकल कर मेरा ब्लॉग देख सकें तो आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत रहेगा|

    yamunapathak के द्वारा
    September 7, 2014

    aveeji aapka blog maine padha bahut hee prabhavkaaree aur sateek blog hai .aapko bahut bahut dhanyvad

Santlal Karun के द्वारा
September 6, 2014

आदरणीया यमुना जी, सब को सब आता है, किन्तु हम भारतीयों में सार्वजनिक स्थलों की गन्दगी को लेकर दायित्वबोध की बहुत कमी है | महा नगरों के विशिष्ट स्थलों को छोड़कर सर्वत्र गन्दगी का साम्राज्य है | आप ने टॉयलेट के सन्दर्भ में बड़ी संजीदगी से विचार किया है; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

    yamunapathak के द्वारा
    September 7, 2014

    आदरणीय सर जी आपने सही कहा यह दायित्व बोध की कमी का ही परिणाम है. साभार

Shobha के द्वारा
September 6, 2014

प्रिय यमुना जी आपने शौचालय पर मोदी जी से भी ज्यादा प्रकाश डाला हर एंगल को लिया है हमारे देश में सफाई का भान ही नहीं है हमारे देश में न्यूजीलैंड से रिश्तेदार आये उन्हें इस बात की इतनी हैरानी थी उनका टैक्सी वाला कही भी गाडी खड़ी करता गंदगी फैला देता वह मुझे इन्हीं शब्दों में बड़े दुःख से कहते थे जबकि पास में ही शौचालय भी उन्होंने देखा बीएस एक रुपया बचाना है | डॉ शोभा

    yamunapathak के द्वारा
    September 7, 2014

    शोभा जी ब्लॉग पर आने का बहुत बहुत धन्यवाद .आपके अनुभव आपके प्रत्येक ब्लॉग में पढ़ती हूँ और देश दुनिया से रूबरू हो जाती हूँ अच्छा लगता है. साभार

jlsingh के द्वारा
September 6, 2014

bahut hee sundar vichar aadarneeyaa yamuna ji, अभीतक के प्रधान मंत्री के विचारों और क्रय कलापों की प्रशंशा की जानी चाहिए..साथ ही हम सब की जिम्मेदारी है कि देश हित समाज हित में उनके विचारों का अनुकरण करें…सफाई, अनुशाशन, अपना कर्तव्य पालन यही तो मूल है…सादर!

    yamunapathak के द्वारा
    September 7, 2014

    आदरणीय जवाहर जी नमस्कार सही कहा आपने अपनी छोटी छोटी जिम्मेदारी को निभा कर हम देश की बड़ी सेवा कर सकते हैं. साभार


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