Aatamaabhivyakti

extremely CRUDE ; completely PURE

250 Posts

3091 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 9545 postid : 778640

प्रार्थना-गंगा 'की' नहीं अब ;गंगा 'के लिए'

Posted On: 31 Aug, 2014 कविता में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

‘गंगा -गंगा जे नर कहहिं ; भूखा प्यासा कबहूँ ना रहहिं ‘
मैं यह पंक्ति पापा के मुंह से हमेशा सुनती थी.मैं उनसे पूछती थी ,गंगा गंगा क्यों ; यमुना क्यों नहीं ?” बस गंगा की गौरवमयी पावन गाथा पापा कहते नहीं थकते थे.सच ही तो है युगों से गंगा की धाराएं प्यार की धरती को सींचती रही हैं.गंगा यमुना सरस्वती की त्रिवेणी में से सरस्वती ने तो कब का साथ छोड़ दिया. और कालिया नाग सदृश प्रदूषण के विष वमन ने यमुना का रंग रूप स्वाद परिवर्तित कर दिया है.गंगा ही है जिसका जल वैज्ञानिकों के लिए भी शोध का विषय बना हुआ है  कि आखिर ऐसा इस जल में क्या है जो यह कीटाणुमुक्त रहता है.आज वही गंगा व्यथित,व्यग्र और बेचैन है .गंगा शुद्धीकरण के नाम पर योजनाओं और धनराशि की बौछार हो गई पर गंगा मैली होती जा रही है …अब वक़्त आ गया है कि हम सब गंगा ‘ की’  नहीं बल्कि गंगा ‘के लिए’ प्रार्थना करें.

29 बड़े शहरों,23 छोटे शहरों और 48 नगरों से गुजरने वाली भारत देश की राष्ट्रीय नदी ‘गंगा’ को प्रदूषण मुक्त करना मोदी सरकार का महत्वाकांक्षी चुनावी वादा होने के साथ ही प्रत्येक भारतीय की एक निहायत आवश्यक आस्था से जुड़ा सवाल भी हैगंगा का गौरव सदियों से भारतीय संस्कृति का अभिन्न पहलू रहा है .गंगा की पाक साफ़ अस्मिता को पुनर्जीवित करना अत्यंत आवश्यक है .

 
 साँझ थी ढल रही…
अलंकृत नभ को कर रही
अस्ताचल सूर्याभा……….
गंगा में थी डूब रही
नयन मेरे अपलक….
गंगा को निहार रहे
मानो पतितपावनी में ….
थे पाप सारे बुहार रहे
दोपहर सा आलोक ना था
पर रोशनी इतनी भी सही
कण कण से गाथा गंगा की
कुदरत में अमृत थी घोल रही
मन ना माना……अंजुली भर
जल अधरों से लगा लिया
भ्रमित हुई खारेपन से मैं
क्या गंगासागर, गंगा से मिला
‘उल्टी गंगा बहाना’ मुहावरों से
निकल सत्य बन है हुआ खड़ा
या कुदरत ने लेकर करवट
जागरण सुप्त चेतनाओं का किया.
 
 
  विकल मन के टूटे सितार सी
व्यथित गंगा ही सिसक उठी
गंगासागर के गंतव्य पूर्व ही
प्रदूषण से मैं जूझ रही
मेरी अश्रुधाराएँ ही हैं जो
खारा पानी को कर रही
धर्मानुष्ठान प्रार्थना ही मुझ पर
अब भारी हैं पड़ रही
माता कह कह कर पुत्र ही
दीप सीने पर हैं जला रहे
लावण्य भरी ममता जला कर
मौत असमय हैं बुला रहे
 

गौमुख की सी वह लावण्यता
फिर तुम मुझे लौटा दो
पाप निज तन मन की स्व में ही
रूपांतरित कर बहा दो
पतित पावन तुम सब बन कर
चलो ! अब मैल मेरे हरो
प्रार्थना ‘मेरी’ नहीं
अब प्रार्थना ‘मेरे लिए’ करो .



Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

10 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

aman kumar के द्वारा
September 9, 2014

गंगा को माता का दर्जा दिया गया है पर उसकी दुर्दशा देखना और कुछ न कर पाना……… आपका लेख अतुलनीय है

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
September 2, 2014

यमुना पाठक जी, बहुत अच्छा सवाल उठाया है आपने ‘ अब मेरी नही, मेरे लिए । सब्कुछ कह दिया है आपने ।

Rajesh Kumar Srivastav के द्वारा
September 2, 2014

अब वक़्त आ गया है कि हम सब गंगा ‘ की’ नहीं बल्कि गंगा ‘के लिए’ प्रार्थना करें. बिलकुल सही कहा आपने / बहुत सुन्दर रचना /

sadguruji के द्वारा
September 1, 2014

चलो ! अब मैल मेरे हरो प्रार्थना ‘मेरी’ नहीं अब प्रार्थना ‘मेरे लिए’ करो ! बहुत गहरे अर्थवाली सुन्दर पंक्तियाँ ! मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ माँ गंगा जल्द से जल्द गौमुख की सी लावण्यता पुन: पायें ! सार्थक और शिक्षाप्रद रचना का सृजन करने के लिए अभिनन्दन व बधाई !

brijeshprasad के द्वारा
September 1, 2014

आप भाग्यवान हैं,पिता जी के विचारों से मिले संस्कारों ने आप को यह दृष्टी दी, जो नमन योग्य है। काश भारत में कुछ पिता और भी ऐसे होते तो भारत की आज यह दुर्गति न होती। शायद, इसी दर्द का इजहार नरेंद्र मोदी जी ने १५ अगस्त को किया था। अत्यंत सराहनीय विचार है। धन्यवाद।

rajanidurgesh के द्वारा
August 31, 2014

yamunaji , yathochit patit pawan tum sab bankar chalo ab mail mere haro prathana meri nahi ab prathana mere liye karo wah uttam ati uttam

jlsingh के द्वारा
August 31, 2014

गौमुख की सी वह लावण्यता फिर तुम मुझे लौटा दो पाप निज तन मन की स्व में ही रूपांतरित कर बहा दो पतित पावन तुम सब बन कर चलो ! अब मैल मेरे हरो प्रार्थना ‘मेरी’ नहीं अब प्रार्थना ‘मेरे लिए’ करो . शिव की शक्ति पा, उमा जी, त्रिशूल धारण करेंगी, गन्दा जो गंगा को करे उसको न छोड़ेंगी, गोमुख की स्वच्छता भारती, बनारस में धरेंगी.. हम सभी निर्मल गंगा की कामना करते हैं..

    yamunapathak के द्वारा
    September 1, 2014

    जवाहर जी बहुत सुन्दर पंक्तियाँ आपने लिखी हैं आपका बहुत बहुत धन्यवाद

Shobha के द्वारा
August 31, 2014

यमुना पाठक जी गंगा जी पर बहुत सुंदर लिखा है मेरा जन्म इलाहाबाद में हुआ था गंगा जी हमारे घर से कुछ दुरी पर बहती थी हम अक्सर गंगा स्नान के लिए जाते थे जैसी सुन्दरता शुरू की पंक्तियों में आपने गंगाजी के लिए लिखी है मेने वह नजारा अपनी आँखों से अक्सर देखा है साफ़ सुथरी माँ चारो ओर कहीं गंदगी का नाम नही अब तो सब कुछ बदल गया मेरा बचपन याद दिलाने के लिए धन्यवाद डॉ शोभा

    yamunapathak के द्वारा
    August 31, 2014

    aadarneeya shobha jee bahut achhi lagee aapkee pratikriya ilahabad jana aksar hota hai mera mujhe bhee yah shahar bahut pasand hai. sabhar


topic of the week



latest from jagran