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कौवा और कोयल

Posted On: 26 Aug, 2014 कविता में

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आज सुबह योगाभ्यास के वक़्त अजीब सी शान्ति महसूस हो रही थी…….अचानक कोयल ने अपनी कूक का पत्थर मस्तिष्क के शांत झील में फेंक दिया …विचार और भाव की तरंगें योगासन पर भारी पड़ने लगीं…….बीच में ही उठना पड़ा…विचारों का क्या है…बारिश की आस लगाए किसान को छलते बादलों की तरह कब आये कब चले जाएं ……किसान तो बादलों को पकड़ नहीं सकते ….पर मैं तो भाव और विचारों को शब्द बना जन मानस तक पहुंचा सकती हूँ और बस भाव कुछ यूँ शब्दों में पिरोती गई……

ओ कोयल….काली काली
पंचम सुर के…तानों वाली
कितना सुरीला गाती हो
अपनी कू कू से लुभाती हो
कर्कश बोल वाले कौवे से
करती तुलना दुनिया तेरी
पर की कोशिश आज तक किसने
जाए सच के तह तक भी .
मैं पूछती हूँ…अमराइयों में अक्सर
गाती हो तुम क्यों छुप कर ही
डर अपने स्वरुप से ज्यादा
शायद तुझे है अंतर्मन की
तुम्हारी मीठी बोली सुनते सब
देख पाता है कालिख पर कौन
अंतस में छुपे काले मन की .
धोखा देती हो तुम
कर्कश बोल वाले , दुत्कारे जाने वाले
सीधे सपाट कौवे को
रख अपने अंडे घोंसले में उसके
छलकर इस्तेमाल कर जाती उसको .
कितना भी कर्कश हो कौवा
बेहतर है तुमसे वह
कम से कम…जगजाहिर तो है वह
नहीं रचा कोई भ्रमजाल उसने
जैसा दीखता है वैसा ही तो है वह
शायद इसलिए वह सम्मान भी पाता है
वर्ष में एक बार ही सही खोजा तो जाता है.
तुम ??????????????????
अमराइयों में छुप कर
मीठी तान देते …एक दिन थक जाती हो
अंतिम तान देकर अमराइयों में मिल जाती हो
ना अपने स्वरुप में समक्ष आती हो
ना कभी लोगों द्वारा बुलाई जाती हो
तुम्हारी मीठी बोली का
करते प्रचार अक्सर लोग
पर कौवे को लगाते हैं
ससम्मान पितृ भोग . ………………………. 

तुम्हारा छल तुम पर ही
कितना भारी पड़ता है
बिन प्रयोग हुए ही
तुम्हारा वज़ूद मिटता है.

 

……………

 

……………………..

 

…………………………..



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13 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
August 30, 2014

तुम्हारी मीठी बोली का करते प्रचार अक्सर लोग पर कौवे को लगाते हैं ससम्मान पितृ भोग . ………………………. तुम्हारा छल तुम पर ही कितना भारी पड़ता है बिन प्रयोग हुए ही तुम्हारा वज़ूद मिटता है. सुन्दर पंक्तियाँ ..गूढ़ भाव लिए …जीवन में ऐसी बहुत से अनबूझी पहेली बूझने पर बहुत कुछ पता चलता है … भ्रमर ५

yamunapathak के द्वारा
August 30, 2014

आदरणीय जवाहर जी नमस्कार आपकी प्रतिक्रिया ने एक तीसरा रूख जोड़ कर ब्लॉग को बहुत ही संतुलित कर दिया मुझे यह मंच इसी लिए अनुपम लगता है क्योंकि यहां हमारे विचारों को कई नए आयाम मिल जाता है और हम जीवन से जुडी छोटी से बड़ी सभी बातों पर संतुलित ढंग से सोचना सीखने लगते हैं …आपका बहुत बहुत धन्यवाद

jlsingh के द्वारा
August 30, 2014

आदरणीया यमुना जी, सादर अभिवादन ! लीक लीक गाड़ी चले कायर क्रूर कपूत, लीक छाड़ि तीनो चले शायर सिंह सपूत. आपने एयर सद्गुरु जी ने लीक से हटकर अपने विचार दिया हैं, पर मुझे कुछ तीसरा ही सूझ रहा है, कोयल की कूक कवियों, को प्रेमियों को भाती है, कोयल की चतुराई मूर्ख कौवे को क्यों समझ न आती है. महामारी में कौवे ही मरते हैं,जूठे भोजन, और मुर्दे पर कौवे ही टूट पड़ते हैं. विधि का विधान, कुछ ऐसा ही है, चतुर मिहनत नहीं करते, मूर्ख मिहनत कर गरीबी में रहते है… एक दिन में डेढ़ करोड़ आदमी खाताधारी कार्ड धारी बन जाता है, गरीबी कैसे भगाई जाती है, किसी को समझ में कुछ आता है? बुलेट ट्रैन, काशी को क्योटो, स्मार्ट सिटी विकास ही कहलाता है.

sanjay kumar garg के द्वारा
August 28, 2014

सुन्दर अभिव्यक्ति! आपने तो सिद्ध कर दिया “या से तो कौवा भला भीतर बाहर एक” साभार आदरणीया यमुना जी!

    yamunapathak के द्वारा
    August 28, 2014

    YAH SACH HAI BISHT JEE BLOG PAR AANE KA BAHUT BAHUT DHANYVAD

अवी के द्वारा
August 28, 2014

ये अनंत काल से चल रहा है। मुंह में राम बगल में छुरी वाला हाल है, मीठा बोलने वाले अक्सर पीठ में खंजर घोंप देते हैं,परन्तु हम हमेशा मीठा बोलने वाले को ही अच्छा मानते हैं। सत्य और कड़क बात करने वाला हमारे समाज में दुत्कार ही पाता है| अच्छी कविता है, धन्यवाद|

    yamunapathak के द्वारा
    August 28, 2014

    अवि जी आपकी प्रतिक्रिया से सहमत हूँ आपका बहुत बहुत धन्यवाद

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
August 28, 2014

आदरणीय , बहुत सुंदर पहलू लिया है आपने जिंदगी का । कोयल और कौवे के माध्यम से आपने मीठी वाणी बोलने वाले लेकिन काले मन वाले लोगो पर एक सटीक टिप्पणी की है । अक्सर जिंदगी मे भी हम ऐसा ही धोखा खाते हैं । बहुत अच्छी कविता

    yamunapathak के द्वारा
    August 28, 2014

    बीस्ट जी ये चलन वर्त्तमान में बहुत ज्यादा होता जा रहा है यह अनुभव हम सब कर रहे हैं .प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद

sadguruji के द्वारा
August 28, 2014

तुम्हारी मीठी बोली का करते प्रचार अक्सर लोग पर कौवे को लगाते हैं ससम्मान पितृ भोग ! आदरणीया यमुना पाठक जी ! सुप्रभात ! फिर से एक नए विषय पर बहुत सुन्दर कविता ! परन्तु एक शिकायत भी है कि आपने अपनी कविता में कौवे का पक्ष कुछ ज्यादा ले लिया है ! आज सुबह आपकी कविता मैं पढ़ा और उसपे मैं कुछ देर तक विचार भी किया ! मेरे मन में भी एक विचार पैदा हुआ कि कौवे इस संसार के प्रतीक हैं और कोयल हम सब से अपने को छुपाये हुए परमात्मा की प्रतीक है ! परमात्मा रूपी कोयल कि सुरीली कूंक शांतचित्त होने पर आत्मा में जब गूंजती है तो आंनद और करुणा के सिवा और कुछ कहाँ रह जाता है ! सुबह के समय आपकी कविता पढ़ना बहुत अच्छा लगा ! अभिन्दन और बधाई !

    yamunapathak के द्वारा
    August 28, 2014

    सद्गुरू जी यह आपने एक नए पहलू से परिचित कराया .व्यवहारिक दुनिया से पर अध्यात्म से जुड़े कौवे और कोयल का प्रसंग इस ब्लॉग को एक नया आयाम देता है. आपका बहुत बहुत धन्यवाद

Shobha के द्वारा
August 27, 2014

बहुत सुंदर कोयल की कूक जैसी यमुना जी आपकी कविता है कविता में कई तरह के खूबसूरत भाव हैं \ डॉ शोभा

    yamunapathak के द्वारा
    August 28, 2014

    shobha jee aapka bahut bahut dhanyvad


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