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फेअरवेल का वेलफेअर

Posted On: 28 Jul, 2014 Others,मेट्रो लाइफ,social issues में

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कुछ महीनों पूर्व एक रिश्तेदार के यहां जाना हुआ था.उनके एकलौते पुत्र की बहुत ही कम उम्र में अकाल मृत्यु हो गई थी.शोक मनाने वाले और संवेदना प्रकट करने वालों की कोई कमी ना थी.कुछ तो वास्तविक संवेदना थी और कुछ भौतिक सुख सुविधाओं की आस में नज़दीकी हासिल करने का कल्पनीय मोह था.ऐसे दुखद अवसर पर एक चिर परिचित जुमला सुनाई दिया,”बड़ा नेक इंसान था कभी किसी का बुरा नहीं चाहा ,ईश्वर भी बहुत निर्दयी हैं अच्छे लोगों को ही अपने पास जल्दी बुला लेते हैं.”

दुःख के ऐसे माहौल में यह एक वाक्य अक्सर सुना और कहा जाता हैं .मैं अक्सर सोचती हूँ क्या इंसान सच में अच्छा होता है या मृत्यु या  अन्य विदाई उसे अच्छा बना देती हैं या अच्छा साबित करती हैं.अर्थशास्त्र की विद्यार्थी होने के नाते अर्थशास्त्री ग्रेशम का एक नियम याद आता है “बुरी मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है(bad money drives out good )तो क्या यही नियम मनुष्य के साथ भी लागू होते हैं ???क्या ईश्वर भी इस नियम के अधीन है कि वह अच्छे लोगों को चलन से बाहर कर देता है ????विदाई की कोई भी घड़ी हो लोग उस सम्बंधित व्यक्ति के विषय में अच्छा ही बोलते हैं…सच कहूँ तो फेअरवेल शब्द को उलटा कर दो तो वेलफेअर हो जाता है यानी कल्याण अच्छाई की बात .

 

एक पढ़ी हुई घटना याद आती है.(osho )एक गाँव में प्रचलन था कि अगर किसी की मृत्यु हो जाए तो श्मशान ले जाने पर अंतिम क्रिया तब तक नहीं की जाती थी जब तक कि उसके विषय में कोई अच्छी बात ना कह दी जाए. एक ऐसे व्यक्ति की मृत्यु हुई जिसने कभी कुछ अच्छा ना किया था अर्थात वह बेहद बुरा इंसान था .एक घंटे बीते ….दो और…. फिर तीन .अंतिम क्रिया तो करनी थी अन्यथा लोग घर कैसे वापस जाते .अंत में एक बुजुर्ग खड़े हुए और उन्होंने कहा,”यह आदमी वैसे तो बहुत बुरा था पर फिर भी अपने अन्य तीन भाईयों से थोड़ा अच्छा था.बस फिर क्या था लोगों ने आनन फानन अंतिम क्रिया की और घर वापस आये .

दोस्तों , किसी इंसान को अच्छा तभी कहा जाता है जब वह चलन से बाहर हो जाता है या फिर अच्छा होने की वज़ह से उसे चलन से बाहर कर दिया जाता है.सच पूछिए तो अच्छे इंसानों का सबसे बड़ा नुकसान यही होता है कि वे बुरे लोगों के लिए जगह खाली कर देते हैं. आज भी अनैतिक होकर,बेईमानी कर लोग बच जा रहे हैं तो यह इसलिए कि दुनिया अच्छों से रिक्त नहीं हुई है.उन पर आसानी से  तोहमत लगा कर उन्हें चलन से बाहर कर स्वयं बचा जा सकता है वे उफ़ भी नहीं करेंगे सच है ऐसे अच्छे लोग ….बुराई के विरोध में आवाज़ ना उठा कर स्वयं दरकिनार हो जाते हैं या फिर आवाज़ उठाये जाने पर बुरे लोगों द्वारा चलन से बाहर कर दिए जाते हैं .नौकरी या सेवा क्षेत्रों में तबादला ,निलंबन जैसे हथियार उन्हें मिटा देने के लिए अस्त्र का काम करते हैं.झूठ की बाज़ार में सत्यवादी……बेईमानों की भीड़ में ईमानदार…….भ्रष्टाचारियों के समूह में सदाचारी …अनैतिक कृत्य में संलग्न लोगों के समक्ष नैतिक …..ठीक उसी तरह चलन से बाहर हो जाते हैं जैसे कटे फटे नोट या कम मूल्य वाली मुद्रा (bad money) अधिक मूल्य वाली मुद्रा (good money )को चलन से बाहर कर देती है.जिस प्रकार अच्छी मुद्रा को लोग संग्रह कर लॉकर में जमा कर देते हैं वैसे ही अच्छे लोगों को महान घोषित कर उसे विशेष बना देते हैं और विशेष लोग समाज की भीड़ का हिस्सा कैसे बन पाएंगे ?यह अच्छों से निजात पाने का सबसे अच्छा तरीका है .

अब गौर तलब बात यह कि लोग भूल जाते हैं कि बुरी मुद्रा अच्छी मुद्रा को भले ही चलन से बाहर कर दे पर बुरी मुद्रा की बुराईयाँ उसी पर इस कदर हावी हो जाती हैं कि वह एक दिन कूड़ेदान का हिस्सा बन जाती है और तब अच्छी मुद्रा स्वयं चलन में आ जाती है पर अफ़सोस की बात यह है कि वह अच्छी मुद्रा भी लाखों के हाथों से गुज़रते हुए फिर अपना मूल्य खो देती है और बुरी मुद्रा बन जाती है.शायद यही चक्र चलता रहता है.

अच्छे और बुरे इंसान प्रत्येक देश स्थान और काल में रहे हैं .राम को भी चलन से बाहर जाना पड़ा था उन्हें अपने अच्छे होने का भुगतान करना पड़ा था ठीक अच्छी मुद्रा की तरह पर वे पुनः लौट कर चलन में आये.अपने आदर्शों से एक प्रतिमान स्थापित किया .खैर ,अगर समाज में सभी अच्छे हो जाएंगे तो अच्छा आदमी खो जाएगा सफ़ेद दीवार पर चौक से लिखी इबारत की तरह .सवाल अच्छे और बुरे होने से भी ज्यादा विचारणीय यह है कि अच्छे भगोड़े क्यों बन जाते हैं या उन्हें भगोड़ा क्यों बना दिया जाता है.दरअसल अच्छे लोग नैतिक और अच्छे होते हैं पर प्रज्ञावान नहीं हो पाते अतः चलन से बाहर हो जाते हैं या कर दिए जाते हैं .ज़रुरत है अच्छाई के साथ प्रज्ञावान होने की जैसा कि श्री राम श्रीकृष्ण महात्मा बुद्ध ,गुरूनानक , में था पर ऐसे लोगों की संख्या गिनती में है शेष के लिए इतिहास चुप है.हर वक़्त जहां पत्थरों की बारिश हो वहां शीशे का कारोबार करना मुमकिन नहीं है यह तो अपना ही नुकसान है .पर शीशे की गुणवत्ता रखने वाले ,साथ ही पत्थरों को मात देने वाली समतुल्य वस्तु का सृजन करना या ऐसी तकनीक जो पत्थर को पिघला दे की व्यवस्था ही असली प्रज्ञा है .उस कला को सीख कर ही पत्थरों की बारिश के बीच भी शीशे का कारोबार बखूबी किया जा सकता है या फिर पत्थर को ही पानी बनाया जा सकता अर्थात प्रज्ञा द्वारा ही बुराई के बीच अच्छाई बचाई जा सकती है.

एक बात यह भी सही है कि जो आज अच्छे हैं वे भी परिस्थिति बद्ध शायद बुरे हो सकते हैं और जो बुरे हैं वे भी हमेशा बुरे नहीं रहते डाकू अंगुलिमाल इसका सशक्त उदाहरण है .प्रत्येक अंगुलिमाल रात्रि बेला में या जीवन के अवसान बेला में वाल्मिकी बन जाता है .अच्छाई की चमक और बुराई की ग्लानि अगर वास्तव में देखनी हो तो हर सोते हुए चेहरे को ध्यान से देखने पर यह आंशिक रूप में पाया जा सकता है.और मृत्यु की बेला में पूर्ण रूप से देखा जा सकता है … एक ऐसा क्षण जब संसार की असारता कठोर सत्य बन कर सामने डट कर खड़ी हो जाती है जो कुछ अच्छा किया उसकी दीप्ती और जो कुछ गलत किया उसका क्षोभ या ग्लानि की मिली जुली भावना चेहरे को बेहद उदार और निष्कपट बना देती है. शायद तभी सदा के लिए जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति की विदाई के वक़्त उसे अच्छा इंसान ही कहा जाता है………………………………और………….फेअरवेल सच में वेलफेअर बन जाता है.



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36 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sinsera के द्वारा
August 13, 2014

प्रिय यमुना जी , नमस्कार ,कुछ व्यक्तिगत कारणों से बहुत दिनों तक मंच से अनुपस्थित रही ..आज बहुत दिनों बाद जेजे पर आई तो पता नहीं क्यों इंट्यूशन सा हो रहा था की बेस्ट ब्लॉगर की खिड़की से आप ही झांक रही होंगी…और मेरा पूर्वाभास सच निकला…बधाई स्वीकार कीजिये..रचना तो हमेशा की तरह तथ्यपूर्ण और तार्किक है.आप इसी तरह ज्ञान शेयर करती रहें ये हमारी कामना है..

    yamunapathak के द्वारा
    August 15, 2014

    सरिता जी आपको मंच पर देख कर बहुत अच्छा लगा ये आप सब का प्यार ही है जो मेरी लेखनी और विचार दोनों को अपने साथ बहा ले जाता है आपकी प्रतिक्रिया का बहुत बहुत धन्यवाद इस अनुपम मंच से दूर रहना तो मुश्किल है आप का नया ब्लॉग अभी ही देखा पढने जा रही हूँ . साभार

Santlal Karun के द्वारा
August 10, 2014

आदरणीया यमुना जी, प्राय: सामान्य समझे जानेवाले जीवनगत विशिष्ट तथ्य पर चिंतनपरक, मौलिक आलेख के लिए हार्दिक साधुवाद एवं ‘बेस्ट ब्लॉगर ऑफ़ द वीक’ के चयन पर हार्दिक बधाई !

    yamunapathak के द्वारा
    August 15, 2014

    आदरणीय संतलाल सर नमस्कार आप की प्रतिक्रिया रचना के क्षेत्र में हमेशा ही बहुत सकारात्मक दिशा निर्देशन देती है.बहुत बहुत धन्यवाद साभार

August 5, 2014

यमुना जी आपके हर कथन से सहमत व् प्रभावित हूँ .अनेकों बार आप इस मंच पर श्रेष्ठ घोषित किया गया है और ये स्पष्ट हो चुका है कि आपको सम्मानित कर यह मंच स्वयं को ही सम्मानित करता है .आपको बहुत बहुत शुभकामनायें .

    yamunapathak के द्वारा
    August 6, 2014

    शालिनी  जी ब्लॉग पर आने का आपका अतिशय धन्यवाद आपकी प्रतिक्रिया सर आँखों पर यह मंच मेरे लिए बहुत ही सम्मानित मंच है एक संस्थान जहां मुझे बहुत कुछ सीखने को मिलता है . साभार

yogi sarswat के द्वारा
August 5, 2014

दरअसल अच्छे लोग नैतिक और अच्छे होते हैं पर प्रज्ञावान नहीं हो पाते अतः चलन से बाहर हो जाते हैं या कर दिए जाते हैं .ज़रुरत है अच्छाई के साथ प्रज्ञावान होने की जैसा कि श्री राम श्रीकृष्ण महात्मा बुद्ध ,गुरूनानक , में था पर ऐसे लोगों की संख्या गिनती में है , ब्लॉग लिखना बहुत आसान काम है ! लेकिन सटीक , पढ़ने लायक ब्लॉग लिखना बहुत कठिन काम है ! कुछ नया चाइये होता है और उस कठिन काम को आप अंजाम दे रही हैं आदरणीय यमुना जी ! बहुत ही सार्थक लेख और उस पर मिलने वाले इनाम के लिए आपको ढेरों बधाइयां !

    yamunapathak के द्वारा
    August 6, 2014

    yogee jee aapka bahut bahut dhanyvad nayaa kuchh naheen bas anubhuti hai yogee jee saabhar

ranjanagupta के द्वारा
August 3, 2014

यमुना जी !आपकी लेखकीय मुद्रा गंभीर चिंतन का परिणाम होती है ! व्यक्ति की अच्छाई याँ उसे मरने नही देती ,और बुराइयाँ उसे जीने नही देती !इसी लिए अर्थात अपनी अच्छा इयों के कारण वह दुनिया में अमर रहता है !और बुराइयों के कारण जीवन काल या जीवनोंपरांत भी वह मृतक के समान ही रहता है! दुनिया पूजा तो केवल अच्छाई की ही करती है !पर ईश्वर ने मनुष्य को बुरा और अच्छा दोनों ही प्रकार की बुद्धि दी है ,अब यह उसकी प्रज्ञा या विवेक पर निर्भर है कि वह कौन सा मार्ग चुने! बुराई पहले लाभ देती दिखाई देती है !बाद मेदुष्परिणाम देती है ,अत:वह तामसी प्रवृत्ति मानी गयी है !पर अच्छाई का रास्ता काँटों भरा है ,वह अवमूल्यित होती है ,चलन से बाहर होती है ,पर अंत में विजयी और सर्व कालिक सर्व समर्थित होती है !क्योकि वह सात्विक वृत्ति है !इसीलिए हम आज तक राम की पूजा करते है और रावण को हर चौराहे पर हर साल फूँका जाता है !सादर !साभार !!

    yamunapathak के द्वारा
    August 3, 2014

    sahmat hun ..100 %……bahut hee sundar aur dishnirdeshit karatee hui pratikriya ke liye aabhar ranjanaa jee

yamunapathak के द्वारा
August 2, 2014

सद्गुरू जी,अलका जी,तेजविंग जी ,जवाहर जी आप सब का अतिशय धन्यवाद ग्रेशम का नियम मैंने अपनी अर्थशास्त्र की कक्षा में पढ़ा था पर आज इसे समाज में बहुत सटीक पाती हूँ . साभार

sadguruji के द्वारा
August 2, 2014

आदरणीया यमुना पाठक जी ! बेस्ट ब्लॉगर आफ दी वीक चुने जाने की बधाई !

alkargupta1 के द्वारा
August 2, 2014

सप्ताह के सर्व श्रेष्ठ ब्लॉगर के सम्मन हेतु हार्दिक बधाई यमुना जी

jlsingh के द्वारा
August 2, 2014

साप्ताहिक सम्मान की बधाई! आदरणीया यमुना जी, अपनी निर्मल प्रवाह को जारी रक्खें… सादर!

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
August 1, 2014

हार्दिक बधाई यमुनाजी ,आपकी गहन सोच फिर सम्मानित हुई है ,विषय को परत दर परत विश्लेषित किया है अच्छे लोग चलन से बाहर हो जाते हैं और जो लोग उनको बाहर कर देते हैं ,उनकी विदाई पर उनकी प्रशंसा करते नहीं थकते , वाकई ये एक प्रश्न है कि मनुष्य के गुणों की चर्चा उसकी विदाई के वक्त ही क्यों की जाती है ,आपने जो बजह लिखी है वो भी जायज है लेकिन मेरी समझ में यह आता है कि   १ . अच्छे लोग तो अच्छाई को सम्मानित करेंगे ही और २. बुरे लोग स्वयं की बुराइयों पर पर्दा डालने के लिए भी एसी बातें करते हैं कि जाने वाले व्यक्ति में ये जो अच्छे गुण थे वो उनका अनुसरण करते हैं .सादर आभार

    yamunapathak के द्वारा
    August 2, 2014

    निर्मला जी आपकी प्रतिक्रिया का अतिशय धन्यवाद सच है मृत्यु या किसी भी अन्य फेयरवेल के वक़्त इंसान अच्छा कैसे बन जाता है मैं तो मरणोपरांत सम्मान के भी विरोध में हूँ कभी इस विषय पर भी ब्लॉग लिखना चाहती हूँ . साभार

alkargupta1 के द्वारा
August 1, 2014

चिंतनीय व विचारणीय अति महत्त्वपूर्ण आलेख है यमुना जी साधुवाद

tejwanig के द्वारा
August 1, 2014

वाकई उम्दा रचना है

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
August 1, 2014

यमुना जी, बधाई । बहुत महत्वपूर्ण विषय पर आपने अच्छा आलेख लिखा । इस विषय पर आपके विचारों व चिंतन से पूरी तरह सहमत हूं । अच्छे आलेख के लिये पुन   बधाई ।

    yamunapathak के द्वारा
    August 1, 2014

    बीस्ट जी आपका अतिशय धन्यवाद …एक ऐसी कशमकश जिससे प्रत्येक अच्छा आदमी जूझता है बस उसे हार नहीं मानना चाहिए साभार

Shobha के द्वारा
August 1, 2014

यमुना जी बहुत सुंदर लेख बड़ा ही प्रेक्टिकल लेख डॉशोभा

    yamunapathak के द्वारा
    August 1, 2014

    शोभा जी आपका अतिशय धन्यवाद ….समझ में नहीं आता अपनी संतानों को इस दुनिया में नैतिक मूल्य की शिक्षा दी जाए या बुराइयों से बचने की शिक्षा दी जाए प्रत्येक व्यक्ति बुराई पर तब तक चुप रहता है जब तक वह व्यक्तिगत रूप से उसका शिकार नहीं हो जाता . साभार

jlsingh के द्वारा
August 1, 2014

आदरणीया यमुना जी, सादर अभिवादन! गहन चिंतन के बाद लिखा गया आलेख और भी चिंतित कर रही है… क्या अब अच्छे लोगों को चलन से बाहर ही कर दिया जायेगा ????

    yamunapathak के द्वारा
    August 1, 2014

    जवाहर जी यह एक कटु व्यवहारिक सत्य है कि बुरे लोगों द्वारा अच्छे चलन से बाहर कर दिए जाते हैं या फिर वे स्वयं ही पलायन कर लेते हैं ऐसा अक्सर होता है पर मैंने कहा न कि अच्छे लोगों का प्रज्ञावान होना ज़रूरी है और एक बात जोड़ती हूँ ईश्वर पर विश्वास सबसे अधिक ज़रूरी है ….सूर्य को काले बादल ढक लेते हैं पर इससे सूर्य का अस्तित्व मिट नहीं जाता वह इंतज़ार करता है पुनः अपनी चमक से जग को रोशन करने का. आपका अतिशय धन्यवाद

sadguruji के द्वारा
July 30, 2014

आदरणीया यमुना पाठक जी ! नई जगह पर व्यवस्थित होने और अपने स्कूल का कार्यभार सँभालने के बाद आपने मंच को पूर्व को भांति समय देना शुरू कर दिया है,इसके लिए बधाई ! आपके लेख को मैंने ध्यान से पढ़ा ! आपने एक जगह लिखा है कि-”दरअसल अच्छे लोग नैतिक और अच्छे होते हैं पर प्रज्ञावान नहीं हो पाते अतः चलन से बाहर हो जाते हैं या कर दिए जाते हैं .ज़रुरत है अच्छाई के साथ प्रज्ञावान होने की जैसा कि श्री राम श्रीकृष्ण महात्मा बुद्ध ,गुरूनानक , में था !” इतिहास को देंखे तो ज्ञात होता है कि अच्छे लोंगो ने बुरे लोंगो से लड़ने के लिए कलम चलाई या तलवार चलाई या फिर अपनी आध्यात्मिक शक्ति प्रदर्शित की.आज अधिकतर अच्छे लोग बुरे लोंगो से डरकर या फिर मुंह फेरकर अपने घरों में दुबक गए हैं ! जो प्रज्ञावान लोग कलम चला रहे हैं,उनकी प्रशासन सुन कहाँ रहा है ! मुझे मोदी जी से बहुत उम्मीद थी कि वो जनता से संवाद कायम करेंगे और उसकी आवाज सुनेंगे,परन्तु समय बीतने के साथ साथ मोदी जी को चुप होते देख मैं उनसे भी निराश हो चला हूँ ! जिस देश में प्रज्ञावान लोंगो की बातों पर सरकार ध्यान नहीं देती है,उस देश में बुरे लोंगो अर्थात दबंग और मनबढ़ू किस्म के राक्षसी प्रवृति वाले लोंगो का अत्याचार और आतंक बढ़ जाता है ! यही आज हमारे देश में हो रहा है ! अंत में एक विचारणीय लेख के सृजन के लिए बहुत बहुत बधाई !

    yamunapathak के द्वारा
    August 1, 2014

    सद्गुरुजी आपकी प्रतिक्रिया ब्लॉग को वाकई एक नई राह दे रही है अच्छे लोग बुरे लोगों द्वारा दर किनार किये जाते हैं पर उनकी बुराईयाँ स्वयं उन्हें ही एक दिन निगल लेती हैं .अच्छे लोगों का प्रज्ञावान होना हर हाल में निहायत ज़रूरी है. साभार

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
July 30, 2014

यमुना जी नए अवतार मैं बधाई, राजनीति कूटनीति एक ऐसी चीज है जो अच्छे को बूरा और बूरे को अच्छा सिद्ध कर देती है खेल सब बुद्धी चातुर्य का है ओम शांति शांति भी बगुला भगत की तरह करनी होती है 

    yamunapathak के द्वारा
    August 1, 2014

    हरिश्चंद्र जी आपकी बातों से सहमत हूँ

pkdubey के द्वारा
July 30, 2014

आप का आलेख गहन है,पर सत्य और अच्छाई ,सूर्य के समान है.जो हमेशा व्याप्त है |

    yamunapathak के द्वारा
    July 30, 2014

    dubey jee aapane sahee kahaa satya aur achhaaii soorya ke samaan hai aur soorya ko bhee baadalon kee vajah se kabhee kabhee chhup jana padataa hai phir bhee ye usee kee roshanee hai jo din ko din rahane mein madad karatee hai baadal usake ujaale kee kshamataa ko kabhee rok naheen paate aapka atishay aabhar blog ko ek naii dishaa dee aapne . saabhaar

deepak pande के द्वारा
July 29, 2014

माफ़ी चाहूंगा यमुना जी परन्तु भला दुनिया को दिखने के लिए नहीं बना जाता भला होना एक कला है एक जीवन का तरीका है भला होना एक आतंरिक गुण है जो अपने अंतर्मन को परम संतुष्टि देता है से किसी और की प्रशंशा या निंदा का कोई फर्क नहीं पड़ता चाहे वो उसके मरने से पहले हो या बाद में

    yamunapathak के द्वारा
    July 30, 2014

    दीपक जी आपने ब्लॉग को अपना अनमोल समय दिया आभारी हूँ .मैंने यह कहीं नहीं मन की दुनिया को दिखने के लिए अच्छा बनाना है ..ब्लॉग का केंद्र अच्छे का बुराई के द्वारा अल्पकालीन विलुप्त हो जाना है जिस प्रकार बुरी मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है उसी प्रकार अच्छे लोग भी चलन से बाहर कर दिए जाते हैं या फिर वे स्वयं ही बुराई का सामना नहीं कर पाते. आपका अतिशय धन्यवाद

priti के द्वारा
July 29, 2014

बहुत ही सुन्दर और सार्थक पोस्ट ….

    yamunapathak के द्वारा
    July 30, 2014

    प्रीती जी ब्लॉग पर आने के लिए आपका धन्यवाद

nishamittal के द्वारा
July 29, 2014

एक ऐसा क्षण जब संसार की असारता कठोर सत्य बन कर सामने डट कर खड़ी हो जाती है जो कुछ अच्छा किया उसकी दीप्ती और जो कुछ गलत किया उसका क्षोभ या ग्लानि की मिली जुली भावना चेहरे को बेहद उदार और निष्कपट बना देती है. शायद तभी सदा के लिए जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति की विदाई के वक़्त उसे अच्छा इंसान ही कहा जाता है………………………………और………….फेयरवेल सच में वेलफेयर बन जाता है. सार्थक पोस्ट

    yamunapathak के द्वारा
    July 30, 2014

    आदरणीय निशाजी यह ब्लॉग मैंने बहुत मनन कर लिखा है जीवन के कटु सत्य को जानती हूँ दुनिया किस तरह अच्छे लोगों का जनाज़ा निकलती है और फिर उन्हें अच्छे होने का तमगा पहनाती है. आपका बहुत आभार


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