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"दर्पण झूठ ना बोले "

Posted On: 31 Mar, 2012 कविता में

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साहित्य,समाज का दर्पण होता है आज मैंने इस दर्पण में समाज vs सोसाइटी में रहनेवाली महिलाओं के विभिन्न अक्श को प्रतिबिंबित करने की कोशिश की है.एक बार एक मक्खी को दर्पण के ऊपर बैठे देखकर, दो बच्चों में इस बात की शर्त लग गयी कि वह मादा है या नर?शर्त जीतने वाले बच्चे का ज़वाब था ‘मादा’ ,उसने मासूम सा तर्क दिया ” मैंने अधिकांशतः महिलाओं को ही दर्पण निहारते देखा है.”अब आप के ज़ेहन में अवश्य ही एक चिरपरिचित गीत गूंज रहा होगा”दर्पण को देखा,तुने जब-जब किया श्रृंगार”पर महिलाएं तो बिना श्रृंगार के भी दर्पण का मोह छोड़ नहीं पाती.रसोईघर के चमकते बर्तन,खिड़की के कांच,गाड़ियों के शीशे,माल्स के बड़े-बड़े दर्पण; मजाल है किसी दर्पण की; कि उनके अक्श को न समेटने की भी जुर्रत करे.पर भाई,ये दर्पण अक्श समेटता ही कहाँ है?एक शेर याद आ रहा है “आईने ने किसी सूरत को अपनाना ही नहीं सीखा ,उसकी यही अकड़ ही तो उसे चकनाचूर कर जाती है”पाठकों बहुत गहरी बात छुपी है इस शेर में.इसलिए तो मैंने महिलाओं और दर्पण के अटूट सम्बन्ध को ज़ल्दी से ज़ल्दी हर अक्श के साथ अपने प्यारे पाठकों के सामने रखने में देर नहीं लगाई है.

दो-चार दिन पूर्व एक गाँव में,adult education के अभियान की सफलता को देखने के लिए गयी.मुझे यह देखकर बहुत हर्ष हुआ कि ग्रामीण महिलाएं अपने घर के रोज़मर्रा के काम-काज निबटा कर ३ बजे से ४ बजे तक अंकगणित,अक्षर ज्ञान इत्यादि सीख रही हैं.उनमें से एक ने बताया”हम पहले दुकानों के सामने लगे बोर्ड नहीं पढ़ पाते थे और सामान लेने के लिए बहुत भटकते थे अब तो पढ़कर समझ जाते हैं कि कौन सी दूकान में क्या मिलता है.”दुसरी ने बताया”हॉस्पिटल में कमरा नंबर पता चलने पर भी बहुत भटकना पड़ता था पर अब तो हम संख्या पहचान कर वहां पहुँच जाती हैं” एक और दीदी ने बताया”हम एक जगह जब इकठी होती हैं तो टी.वी.के कार्यक्रम,घर-परिवार कि समस्याएं और उसके समाधान पर भी चर्चा करती हैं.यह वह नारी वर्ग है जो संघर्षमय जीवन व्यतीत करता है इसे मैं “समाज” का हिस्सा मानती हूँ.जिसके लिए शिक्षित महिला समाज दिशानिर्देशक बन सकता है.

अब दिखाती हूँ अक्श उन महिलाओं की जिन्हें मैं” सोसाइटी”का हिस्सा मानती हूँ ये वे वर्ग से तालुकात रखती हैं जो शिक्षित हैं,इनके पति  अच्छे पदों पर कार्यरत हैं,और आर्थिक दृष्टि से संपन्न हैं इसमें ४५% महिलाएं वास्तव में शिक्षित हो कर अपने घर-परिवार और समाज का मान बढ़ा रही हैं पर ५५% महिलाएं इस दृष्टिकोण से असफल साबित हो रही हैं.इन्हें आप “”बोर होती महिलाओं “ की श्रेणी में रख सकते हैं.घर पर काम वाली नौकरानियां हैं तो चौका-बर्तन,झाड़ू-पोंछा का दारोमदार सम्हालना नहीं है,बच्चे कॉन्वेंट में पढ़ते हैं और इनकी सुनते ही नहीं तो वे बच्चों को घर पर स्वयं पढ़ाने की बजाय tuition भेजना बेहतर समझती हैं.इनकी अर्थशास्त्र की डिग्री, धोबी का हिसाब या घर के बजट तक ही सिमट गयी है और अगर अब botany की पढाई कर ली है तो भी नौकरी तो कर नहीं सकती,ठीक भी है क्यों किसी ज़रूरतमंद के पेट में लात मारना यह तो किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं ठहरता .इसलिए अपने घर के lawn में हसरत से फूल-पत्तों को छू कर अपने कॉलेज के दिन याद कर लेती हैं और फिर lawn की देखभाल के लिए भी तो साहब का माली है तो वक्त कैसे कटे?तो हुजुर,ये ही वह वर्ग है जो मोहल्ले की खबर को दावानल सा फैलाने में अहम् भूमिका निभाता है.पति-पत्नी में हल्की सी नोंक-झोंक हो जाए बस इन्हें पता चल जाए तलाक तक पहुंचाने का काम कर जाती हैं,अपने पति की सहकर्मी की किसी बाला के साथ hai -bye हो जाए तो बस लैला-मजनू,हीर-रांझा,शीरी-फरहाद सभी कहानियाँ इनकी गढ़ी कहानियों के आगे पानी भरने लगे.अपने बच्चों की सुमेरु पर्वत के सामान गलती बस राई है और दुसरे बच्चे की राई सी गलती सुमेरु पर्वत बन जाती है.गांधारी की तरह ही वे आँखों पर पट्टी बाँध लेती है;;.और एक बात ऐसी महिलाएं गली-मुहल्लों में हमेशा नहीं दिखती हैं इन सभी के लिए वे व्यवस्थित तरीके से किटी पार्टी का आयोजन करती हैं जहाँ साड़ी ,गहनों,पति की प्रोन्नति ,वेतन ,बच्चों के अंक परिणाम की गला काट प्रतिस्पर्धा के प्रदर्शन संग  सामान्य ज्ञान को अपडेट किया जाता है.बातों ही बातों में मज़ाक का शगूफा भी छोड़ा जाता है “अरे mrs .अमुक.??………. बुरा ना मानना ………” और इस मज़ाक में ही अगर कोई बात नागवार गुज़री तो फिर आपस की जंग ऐसी कि इंडो-पाक युद्ध के पन्ने खुद अपने आप में ही शर्म से सिमट जाएँ. उम्रभर के लिए ऐसे रिश्ते  बना लेती हैं ये ‘सोसाइटी की social महिलाएं’

.इस आधुनिक किट्टी से अच्छा तो मैं गाँव का पनघट मानती हूँ जो हंसी-ठिठोली के संग बातों-बातों में अपनी-अपनी समस्या और उसका समाधान भी प्रस्तुत कर जाता था.

मैं जब रायपुर में थी; एक बुजुर्ग महिला हमारे लिए किट्टी का आयोजन करती थीं जिसमें नियम था कि हम देवी माँ के भजन करेंगे और शाकाहार का जलपान तैयार करेंगे.हमने उस दौरान कई भजन सीखे,शाकाहार व्यंजन बनाना सीखा और आत्मसंतुष्टि मिलती थी वह अलग. वे हमें अपने अनुभव से और भी कई बातें सिखाती थीं और हम आपस में भी अलग-अलग संस्कृति से परिचित होते थे.

अब मैं जो अक्श दिखा रही हूँ वह मिश्रित है पर हमें इन पर भी अवश्य ध्यान देना चाहिए.’दैनिक जागरण’अखबार में फखरा युनुस के विषय में पढ़ा जिस पर वहां की विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार के चचेरे भाई बिलाल खार ने acid attack किया. युनुस ने १२ वर्ष के संघर्ष के बाद अब ख़ुदकुशी कर ली पर एक बात गौरतलब है कि उसका मुकदमा खार की पूर्व पत्नी तहमीना दुर्रानी ने लड़ा और अन्तराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान इस तरफ खींचा …..इस acid attack विषय पर ही’ saving face ‘नाम से शरमीन ओबैद चिनॉय ने फिल्म banaayi और oscar से सम्मानित हुईं .

एक कथन का ज़िक्र कर रही हूँ जो हर देश,काल,संस्कृति के लिए सदैव प्रासंगिक था,है और रहेगा…………..

“A woman has a great role to play in society especially since she is peace loving.she can be a strong peacemaker at home,in the community ,in society and in the world.A woman by nature is multitalented and multifaceted.”—quoted by Bhanumati Narasimhan.

दरअसल ये जितनी छवि मैंने अपने लेखन  के दर्पण में संजोये हैं उससे एक बात स्पष्ट है कि स्त्री ही घर,संसार,समाज का रूप बेहतरीन   ढंग से संवार सकती हैं ,आप गौर करेंगे तो पायेंगे  कि दहेज़ के लिए घर की महिलाएं ही बहुओं को प्रताड़ित करती हैं,बेटे की चाहत में, भ्रूण जांच के लिए भी बुजुर्ग महिलाएं  ही जोर देती हैं,ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ नारी ही नारी की अस्मिता को चोट पहुंचाती है .कभी-कभी तो वे स्वयं की ही शत्रु बन जाती हैं .इस ब्लॉग को लिखने का मुख्या मकसद है कि एक नारी होने के नाते हम सब अपने सही कर्त्तव्य का एहसास कर सकें .समाज अपेक्षा करता है कि नारी बात को बिगाड़े नहीं बल्कि बिगड़ी बात भी बनाने की क्षमता रखे क्योंकि नारी को कुदरत ने इस धरा पर सृजन के लिए भेजा है; संहार या विध्वंस के लिए नहीं; हाँ जब कोई असुर दानव उसकी राहों को कंटित करने लगे;तब अवश्य वह यह कदम ले; पर समाज की रचना और विकास में उसकी भूमिका सकारात्मक ही अपेक्षित है.



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23 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
March 12, 2015

बहुत ही खुबसुरत लेख आप अर्थशास्त्री हैं या समाज शास्त्री क्या खूबसूरती से अपने विचार दिए हैं मेरी प्रशंसा उसके लिए अधूरी है डॉ शोभा

yogi sarswat के द्वारा
April 2, 2012

आदरणीय यमुना जी सादर नमस्कार ! एक साधारण विषय को लेकर इतना लिख पाना अगर असम्भव नहीं तो बहुत मुश्किल जरूर है ! लयमुना जी आपने इतना बेहतरीन लेख लिखा है की तारीफ करनी ही पड़ेगी ! आपने उदहारण देकर अपनी बात को और भी स्पष्ट कर दिया है !

    yamunapathak के द्वारा
    April 2, 2012

    dhanyavaad,main abhee aapkee hee rachnaayein padh rahee thee

jlsingh के द्वारा
April 2, 2012

आदरणीया यमुना जी, सादर अभिवादन! कहाँ से शुरू और कहाँ पे ख़तम……. पनघट से लेकर किट्टी पार्टी! चुगली से लेकर भजन! सृजन से लेकर संहार … साक्षरता से लेकर अर्थब्यवस्था तक .. वाकई आपकी कलम में इंक भरपूर है जो निर्बाध गति से धाराप्रवाह चलती ही जाती है! आवश्यकता है, आपके लेख से सीख लेने की और मन के दर्पण में अपने आपको तलाशने की! आपका हार्दिक अभिनन्दन!

    yamunapathak के द्वारा
    April 2, 2012

    नहीं सर ये आप सबों की प्रेरणा है जो लिखने के नए आयाम देती है. धन्यवाद सर

चन्दन राय के द्वारा
April 1, 2012

yamuna ji , आपके नाम की तरह ही आपकी रचनात्मकता का वेग है , सचमुच पढ़ते पढ़ते जाने क्या क्या बहा ले जाता है , जो पढ़ ले खुद भी चमक जाये आपकी तस्वीर मई भी इक तेज है , निश्चय ही आपका आचरण भी गंगा यमुना सा निर्मल होगा , माफ़ कीजियेगा पर जब ह्रदय आनंद से भर गया तो भावावेश लिखता जा रहा हूँ, अन्यथा मे इतना अधिक लिखने से बचता हूँ

    yamunapathak के द्वारा
    April 2, 2012

    आपका बहुत-बहुत धन्यवाद,आपने मेरे नाम की सार्थकता से मेरा साक्षात्कार करा कर मुझे एक नए अंदाज़ में अछे कार्य करने की प्रेरणा दी है मैं इसका सदैव ध्यान रखूंगी.

akraktale के द्वारा
April 1, 2012

यमुना जी सादर नमस्कार, नारी के दरपन से लेकर सरजन तक का पूरा चिट्ठा.आगे बढ़ने की चाह नारी में बचपन से ही होती है अक्सर देखा गया है की छुटपन में लडकियां लड़कों से पहले बोलना और चलना सीख लेती हैं.इसी तरह नारी सदैव पुरुष से अधिक सृजनशील भी होती हैं. हाँ जिस तरह का आपने उल्लेख किया है परिस्थितिवश कुछ महिलाएं सामान्य जीवन में निष्क्रिय होती जाती है. सही है आपका कहना निष्क्रियता को सवार ना होने दें.क्योंकि समाज की रचना और विकास में उसकी भूमिका सकारात्मक ही अपेक्षित है. यही बात पुरुषों पर भी लागू होती है.नारी उत्थान पर आधारित सुन्दर आलेख बधाई.

    yamunapathak के द्वारा
    April 2, 2012

    धन्यवाद सर ,आपके उपर्युक्त हर शब्द से मैं पूर्णतः सहमत हूँ.

    yamunapathak के द्वारा
    April 2, 2012

    dhanyavaad sir,aapke har shabd se main sahmat hun.

nishamittal के द्वारा
April 1, 2012

सही कहा है,यमुना जी,नारी के दोनों रूप हैं,सृजक भी और विध्वंसक भी ,बस आवश्यकता है सकारात्मक दृष्टिकोण की

    yamunapathak के द्वारा
    April 1, 2012

    nishaji,dhanyavaad,

RaJ के द्वारा
March 31, 2012

दिमाग की खिड़की खुली rakhe aur बहार की हवा आने दें फिर सब चीज़ चाहे आदमी हो ya aurat सब पर saman रूप se लागु होता है आपका लेख prashansha yogya है http://www.jrajeev.jagranjunction.com

    yamunapathak के द्वारा
    April 1, 2012

    shukriya,

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
March 31, 2012

समाज अपेक्षा करता है कि नारी बात को बिगाड़े नहीं बल्कि बिगड़ी बात भी बनाने की क्षमता रखे क्योंकि नारी को कुदरत ने इस धरा पर सृजन के लिए भेजा है; संहार या विध्वंस के लिए नहीं; हाँ जब कोई असुर दानव उसकी राहों को कंटित करने लगे;तब अवश्य वह यह कदम ले; पर समाज की रचना और विकास में उसकी भूमिका सकारात्मक ही अपेक्षित है. आदरणीया महोदया , सादर अभिवादन. हमेशा की तरह एक और सिक्सर.वाह. बधाई.

    yamunapathak के द्वारा
    April 1, 2012

    धन्यवाद सर

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
March 31, 2012

स्त्री ही घर,संसार,समाज का रूप बेहतरीन ढंग से संवार सकती हैं ,आप गौर करेंगे तो पायेंगे कि दहेज़ के लिए घर की महिलाएं ही बहुओं को प्रताड़ित करती हैं,बेटे की चाहत में, भ्रूण जांच के लिए भी बुजुर्ग महिलाएं ही जोर देती हैं,ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ नारी ही नारी की अस्मिता को चोट पहुंचाती है यमुना जी सटीक अभिव्यक्ति ..आप का कोमल मन नारी की व्यथा और आज जी स्थिति को अच्छी तरह से उजागर कर रहा है नारियां भी पुरुषों के साथ ही दोषी हैं नारियों की प्रताड़ना में ..काश सब आँखें खोलें और जग जननी को मान दें .. आप की हिंदी में प्रतिक्रिया देख मन में ख़ुशी और सुख हुआ आइये हिंदी को बढ़ावा देते चलें आभार भ्रमर ५

    dineshaastik के द्वारा
    April 1, 2012

    आदरणीया यमुना जी, भ्रमर जी के विचारों से पूर्णतः सहमत…..

    yamunapathak के द्वारा
    April 1, 2012

    धन्यवाद,आप सब ने इस लेख को पढ़ा.

ajaydubeydeoria के द्वारा
March 31, 2012

सारगर्भित आलेख.

    yamunapathak के द्वारा
    April 1, 2012

    धन्यवाद,

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
March 31, 2012

वर्तमान सन्दर्भ में पौराणिक गाथाओं को बखूबी पेश किया है आप ने – यमुना जी ! अध्ययन- अध्यापन का धर्म भी यही है | ( नारी है सम्मान विश्व का नारी है अरमान विश्व का | त्याग- तपस्या की वह मूरत सर्वोत्तम परिधान विश्व का | ससम्मान बधाई !!

    yamunapathak के द्वारा
    March 31, 2012

    शुक्रिया सर,दरअसल जब-जब मैं किसी शिक्षित महिला को वक्त जाया करते देखती हूँ दुःख होता है बस लेखनी दौड़ पड़ती है .


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