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yamunapathak


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सॉरी…न बने लोरी (कुछ फेसबुक से )

Posted On: 25 Apr, 2016  
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Junction Forum lifestyle में

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आफलाइन से बेहतर आनलाइन होली

Posted On: 23 Mar, 2016  
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कविता में

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काश वह अनपढ़ होती (लघु कथा)

Posted On: 11 Mar, 2016  
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Junction Forum में

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त्रिवेणी

Posted On: 6 Mar, 2016  
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social issues में

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हाँ हम प्रतीकों में जीते हैं

Posted On: 23 Feb, 2016  
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Junction Forum में

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ठण्ड नहीं लगती (लघु कथा )

Posted On: 17 Feb, 2016  
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Junction Forum मेट्रो लाइफ में

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नेतृत्व का संकट

Posted On: 10 Feb, 2016  
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Junction Forum social issues मस्ती मालगाड़ी में

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सुनो कैकेई ! अब राम वन न जाएंगे

Posted On: 8 Jan, 2016  
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Junction Forum Others social issues में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

प्रिय यमुना जी अबकी आपका लेख देर से पढने को मिला सदैव की भाँती उत्तमता से पूर्ण लेख जिंदगी की तल्ख हकीकत से रूबरू होना बहुत अच्छी बात है । कुछ लोग हकीकत को हकीकत की नजर से देख पाते हैं और कुछ लोग भुलावे में जीना बेहतर मानते है ।मोम की बैसाखियों पर सफर क्यों और कब तक ?? हर व्यक्ति एक किताब की तरह है ।किताबों का चुनाव उन्हें सहेजना याद रखना पूर्णतः व्यक्तिगत निर्णय है ।कुछ किताबें ताउम्र याद रहती हैं.कुछ दराज़ में सम्हाल कर रख दी जाती हैं और कुछ पढ़ी तो नहीं जातीं पर दराज़ से बार बार बाहर अवश्य निकाली जाती हैं.कुछ हमारी ज़िंदगी को नए मोड़ दे कर पूर्णतः बदल देती हैं.और कुछ आधी पढ़ कर यूँ ही रख दी जाती हैं अति सुंदर आपकी कितनी भी तारीफ़ करूं कम है

के द्वारा: Shobha Shobha

आदरणीया यमुना पाठक जी ! बहुत सार्थक और विचारणीय लघु कथाएँ आपने प्रस्तुत की हैं ! मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिये ! लघुकथा 'काश वह अनपढ़ होती' खासतौर से बहुत अच्छी लगी ! दरअसल ज्ञानी होने का भी अपना एक दुःख है और अज्ञानी होने का भी ! ज्ञानी का दुःख ज्यादा है, क्योंकि एक तो वो अनपढ़ से ज्यादा स्वार्थी हो जाता है और दूसी बात ये कि संसार को जितना ही अधिक देखिये और जानिए, वो उतना ही अधिक दुखमय भी लगेगा ! आपकी नई तस्वीर बहुत अच्छी लगी ! किन्तु मेरे जेहन में आपकी पहचान आपकी रचनाओ से है ! आपकी सुन्दर और सार्थक साहित्यिक लेखनी को नमन ! रचना में आपका नाम न भी छपा हो तो भी उसे पढ़ के पता लग जाएगा कि आपने लिखा है ! आदरणीय संतलाल करुण जी और आदरणीया रंजना गुप्ता जी की भी यही पहचान है ! मंच पर मिला आप सबका वैचारिक सानिध्य हमें गौरवान्वित करने वाला है ! वैसे सबकी रचनाएँ जागरण मंच पर सुशोभित रंग-बिरंगे सुन्दर अनुपम पुष्प हैं ! सादर आभार !

के द्वारा: sadguruji sadguruji

आदरणीय जवाहर जी नमस्कार आप की बात से सहमत हूँ .गाँव के हालात वाकई ख़राब हैं.मैं जब राजस्थान पिलानी जाती थी तब वहां के गाँव में खेतों के अच्छे हालात देख कर मन खुश हो जाता था .वहां स्प्रिंकले सिंचाई की जाती है .पानी बहुत ही उचित मात्र में फसलों को मिलता है . खेत का ख और किसान का क से जुड़ाव तभी संभव है जब गाँव और शहर आपस में जुड़ें.मुझे याद है पापा हर गर्मी छूटी में हम भाई बहनों को गाँव भेज देते थे .गाँव में खेती कर रहे अपने छोटे भाई को बहुत मदद करते थे .वे भी खेत से उपजे गेंहूँ.दाल चना और घी पापा को देते थे .अब भाइयों के समय यह रिश्ता बहुत मुश्किल से ही निभाया जा रहा है.वज़ह दोनों भाई शहर में हैं .और पापा सी इच्छा शक्ति भी नहीं की गाँव में चाचा के बच्चों की मदद करें .आपकी टिप्पणी मुझे भी गाँव ले गई. आपका बहुत बहुत आभार

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

आदरणीया यमुना जी, सादर अभिवादन! का बरसा जब कृषि सुखाने, समय चूकि फिर का पछताने. जो आप ने आशा बंधाई है ...काश यह पिछले बजट में होता तो शायद दालों, खाद्य तेलों का या अन्य खाद्य सामग्रियों का उतना अभाव नहीं होता. मैं मूलत: किसान का बेटा हूँ. अभी अभी गांवों का भ्रमण करके आया हूँ. जितना मैं समझ पाया हूँ, सिंचाई पहली मूल आवश्यकता है. उसके बाद उचित खाद, कीटनाशक दवाएं और कृषि मजदूर या कृषि यंत्र. उसके बाद फसलों के उचित दाम, और सही रख रखाव. मनमोहन सिंह ने भी मनरेगा से गड्ढे तो अवश्य खुदवाये, पर सही रूप से क्रियान्वयन न कराये जाने की वजह से आज भी गांव बेहाल है. शहर की तरफ पलायन जारी है. सरसों के फूल हैं पर उन्हें निहारनेवाला कोई नहीं है. गेहूं की बालियां मुस्कुराती है पर उन्हें पुचकारनेवाले नहीं हैं. और मवेशी, पशुधन मत पूछिये गांवों में भी दूध का घोर अभाव है.... कारण बहुतेरे हैं.गांव की ओर अब सरकार चलने का मन बना चुकी है देखा जाय इस साल क्या परिणाम निकालता है. खाना तो सबको रोटी दाल ही है.छाए उसे खेत में बैठकर खाए या वातानुकूलित कमरे में.

के द्वारा: jlsingh jlsingh

आदरणीय सद्गुरू जी सादर नमस्कार आप की बात १०० % सत्य है तभी तो इस ब्लॉग के माध्यम से इस बात को घर परिवार समाज में पहुँचाना चाहती हूँ...ज़रुरत से ज्यादा चालक होना भी विवेकहीनता का ही नमूना है ...जो विवेकी है उसे सिर्फ सरलता और सादगी समझ आती है. यह विवेक सिर्फ साधू संतों तक ही सीमित नहीं है ....हाल ही में इस प्रकार की समस्या से समाज में रूबरू हुई ...समस्या थोड़ी सुलझ गई है क्योंकि बहुत कम संख्या में विवेकी स्त्रियां मिल पाइ ...थोड़ी बाकी है क्योंकि कुछ को ऐसी बातों का मह्त्व ही समझ नहीं आता .... घर परिवार समाज के अस्वस्थ होने का कारण सिर्फ भोजन की आदतों का खराब होना नहीं बल्कि गलत लोगों की संगत भी है यह कोई नहीं समझ पाता है.हर बात के लिए पुरूष वर्ग ही दोषी नहीं है. साभार

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

आदरणीया यमुना पाठक जी ! सार्थक और विचारणीय लेखन के लिए हार्दिक अभिनन्दन ! आपने अच्छा लेख प्रस्तुत किया है, किन्तु मेरे विचार से महारानी कैकेई और दासी मंथरा बुद्धिहीन और विवेकशून्य नहीं थीं ! वो दोनों जरुरत से ज्यादा चतुर थीं ! आज भी बड़े और सम्पन्न परिवारों में मालकिन और नौकर के रूप में कैकेई और मंथरा के दर्शन हो जाते हैं ! सब के सब जरुरत से ज्यादा चालाक ! अति महत्वाकांक्षा एक सदियों पुरानी मानव मन की कमजोरी है ! कैकेई और मंथरा इसे अपने हक़ के लिए लड़ना मानते हैं और जायज भी ! आदरणीया यमुना पाठक जी मुझे लगता है कि जिस मानवता से परिपूर्ण विवेक और बुद्धिमत्ता की बात आपने चर्चा की है वो सच्चे साधू या भक्त के सिवा कहीं संभव नहीं ! अधिकतर गृहस्थों को मैं बहुत मत्वाकांक्षी और चतुर पाता हूँ ! सादर आभार !

के द्वारा: sadguruji sadguruji

आदरणीया यमुना पाठक जी ! सबसे पहले आपको और आपके परिवार को नववर्ष की हार्दिक बधाई ! सार्थक और विचारणीय लेख प्रस्तुत करने के लिए आपका बहुत बहुत अभिनन्दन ! भारत में अंगदान बहुत कम होने का सबसे बड़ा कारण धार्मिक है ! लोग सोचते हैं कि कहीं ऐसा न हो कि अंगदान करने से अगले जन्म में वो अंग ही न मिले ! कुछ ये सोचते हैं कि अंग पाने के लिए कोशिश कर रहे जरूरतमंद लोग पापी हैं, इनकी मदद नहीं करनी चाहिए ! बहुत से पहुंचे हुए संतों के बेहद करीब मै रहा ! उनसे बातचीत करने पर मुझे इस बात का आश्चर्य हुआ कि वे अंगदान के विरोधी थे ! उनके पास एक ही तर्क था कि अंगदान करना प्रकृति के विरुद्ध है और उसके नियमों में हस्तक्षेप है ! लेख में इसी पहलू पर चर्चा नहीं हुई ! भारत जैसे धार्मिक देश में संतों और धर्मगुरुओं के सहयोग के बिना अंगदान अभियान का सफल होना संभव नहीं है ! सादर आभार !

के द्वारा: sadguruji sadguruji

संवेदनहीनता ही तो ऐसी सभी समस्याओं की जड़ है यमुना जी । संवेदनशील लोग घटते जा रहे हैं, संवेदना का दायरा सिमटता जा रहा है । समाज के नागरिकों की संवेदनशीलता को जगाने से ही इस समस्या तथा ऐसी अनेक अन्य समस्याओं का समाधान किया जा सकता है । यद्यपि सोनम की बात एकदम सही है कि सभी संबंधित व्यक्ति तथा अभिकरण ऐसी ज्वलंत समस्या तथा इसके कारण होने वाली जघन्य घटनाओं पर केवल बयानवीर बनकर बयानबाज़ी और बहानेबाज़ी करते हैं तथापि मेरा यही मानना है कि इस विकट समस्या का स्थायी समाधान केवल दंड में नहीं वरन अपराधियों, संभावित अपराधियों एवं तथाकथित तटस्थों (जिन पर बीती नहीं है, इसीलिए वे तटस्थ रह पाते हैं) में संवेदनशीलता की जागृति में ही निहित है । अंततः अपराधी या संभावित अपराधी के अंतस से यही बात निकलनी चाहिए कि अगर तू दोस्त है तो नसीहत न कर ख़ुदा के लिए मेरा ज़मीर ही काफ़ी है मेरी सज़ा के लिए

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

आदरणीय मैम सादर नमस्कार ..... ये लेख मैंने पढ़ना शुरू किया तो बस पढ़ती ही चली गयी, जीवन इतना जटिल नही है जितना मनुष्य ने इसे बना दिया है, मानव, मानव से जलने लगा है, एसिड अटैक्स की इन सभी पीडितो की हिम्मत और जज्बे को सलाम ......, प्रेम के नाम पर जो लोग ऐसे गुनाह करते हैं वो न जाने किस वजह से कहते हैं कि वो प्रेम करते हैं .... ऐसे लोगो को सख्त से सख्त सज़ा मिलनी चाहिए लेकिन मिल नही पाती, कानून, नियम सब ताक पर रख कर अपराधी अपराध करते चले जाते हैं और कानून, सरकार, नेता, जनता ये सब लोग सब बहाने बाजी और बयान बाजी करते रहते हैं ......, बहुत कुछ है जो सुधारना चाहिए, सरकार को, कानून को इस पर ध्यान देना चाहिए .....,जितना आसान सब कुछ दीखता है एक पीड़ित व्यक्ति के लिए उतना आसान कुछ नही होता ...... बहुत ही अच्छा और जागरूक करने वाला लेख है मैम ..धन्यवाद इस लेख के लिए .....

के द्वारा: Sonam Saini Sonam Saini

किसी ज़माने में डॉ॰ सरोजिनी प्रीतम द्वारा रची जाने वाली मर्मस्पर्शी क्षणिकाओं जैसी या नावक के तीरों जैसे गंभीर घाव करने वाले छोटे तीरों की उपमा पाने वाले सतसईया के दोहरों सरीखी छोटी मगर अद्भुत कविताएं हैं आपकी । शायद ये वे आईने हैं जिनमें आप ही के दिल का अक्स उभरता है । आख़िरी कविता अधूरी-सी लगती है लेकिन शायद यह अधूरापन आपके अपने लिए पूरा है । जहाँ तक पहली कविता का सवाल है, बस इतना ही कहूंगा कि आपकी कविता में कही गई बातों के अलावा लेखन में एक और चीज़ भी होती है - 'लेखक के दिल का दर्द', वो दर्द जिसे जब वह किसी से बांट नहीं पाता तो अपनी कलम की नोक पर रखकर अशआर में उतार देता है । बहुत-बहुत शुक्रिया यमुनाजी आपका हमें इतनी अच्छी कविताओं के रूबरू करवाने के लिए ।

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

प्रिय यमुना जी आपका लेख मैं सदैव आराम से रात के समय पद्धति हूँ उसमें पढने और समझने के लिए बहुत कुछ होता है आपने भावनात्मक कविता से अपना लेख शुरू किया | अंत में मेरी जान जी निकल गई "शहीद शहीद भी मरता है आतंवादी भी …पर एक के जनाज़े पर लोगों का हुजूम शामिल हो फूलों की बारिश कर देता है तो दूसरे क़ी अस्थियां तक भी नहीं मिलती और मिल भी जाएं तो धूल और खून में सनी अपने होने पर शर्मशार हो रही होती हैं …इन अस्थियों को उठाने वाला भी कोई नहीं होता . मेरे ख्याल से हमारे युवा दिग्भ्रमित हो कर ऐसे किसी भी बुरी राह पर ना जाएं ….इसके लिए उन्हें यह समझाना बहुत ज़रूरी है " काश बरगलाए गये जवान समझ सकते उनके माता पिता की क्या हालत होती है वह देख नहीं सकते | उनमें से कुछ जवान शायद अपने मुल्क की तरक्की में योगदान देते |बहुत अच्छा लेख

के द्वारा: Shobha Shobha

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

आदरणीया यमुना जी, सादर अभिनन्दन ! आपने ठीक उसी समय इस आलेख को लिखा जब इसकी आवश्यकता थी. वैसे हम सभी जानते हैं मामला भड़काया जाता है, अभी भी केरल भवन का उदाहरण सामने है ..इससे लोगों को प्रसिद्धि मिल जाती है ...खानेवाले पहले भी खाते थे आज भी खा रहे हैं. कोई काटजू को जाकर क्यों नहीं काटता ...अख़लाक़ गरीब था इसलिए एक भीड़ ने कुचल कर मार डाला.... प्रधान मंत्री की प्रति क्रिया राष्ट्रपति के बाद आये जबकि उन्हें सर्वप्रथम इसकी निंदा करनी चाइये थी बेलगाम नेताओं को रोकना चाहिए था. फटकार के बाद सभी शांत हैं. यह क्या पहले नहीं हो सकता था. उत्तर प्रदेश ज्यादा जोश में आ जाता है ...वभनसीता ठीक नहीं है. विकास अवरुद्ध हो जायेगा. आपने जो भी उदाहरण दिए वह सब समय और स्थान के अनुसार सही थे. आज भी गायों की सुरक्षा के लिए कदम उठाये जाने चाहिए. दूध न देनेवाली गायों के लिए वृद्धाश्रम गोशाला का निर्माण किया जाना चाहिए ताकि गायों की रक्षा की जानी चाहिए. वधशालाएं बैंड क्यों नहीं की जाती. बीफ एक्सपोर्ट क्यों किया जाता है. गाय और भैंस में अंतर क्यों? जैसे गोरे और काले में भेद किया जाता रहा है? ये सब अंतहीन विवाद है ...मांस मदिरा कभी अच्छा नहीं हो सकता पर समरथ को नहीं दोष गुंसाईं ... अगर कोई किसी के घर से गाय, बकरी, भैंस चुराकर काटे तो अपराध है.दंड दिया जाना चाहिए अन्यथा .... आपकी बेहतरीन लेखनी को सम्मान मिला आप हमेशा अच्छा लिखती हैं, आपको फिर से अभिनंदन!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

आदरणीया यमुना जी, आप ने ज्वलंत विषय पर गंभीरतापूर्वक ध्यान केन्द्रित किया है और अत्यंत विचारणीय व गवेषणात्मक विचारमाला प्रस्तुत की है-- "मैंने इस पोस्ट के जवाब में लिखा “ध्यान से देखो तो तरबूज के हरे और लाल रंग के बीच का रंग सफ़ेद है .अर्थात तरबूज तिरंगे का उदाहरण है जो देश की आन बान शान है.अतः तरबूज़ पूर्णतः सेक्युलर है क्योंकि यह तीन रंग का है .अतः यह सबके हिस्से में आएगा .” आप सब ध्यान से सोच कर बताओ क्या लाल रंग के फल हरी पत्तियों के बीच नहीं होते ??क्या वे दोनों मिलकर पेड़ को उपयोगी नहीं बनाते ???क्या उनका वज़ूद पेड़ से अलग हो सकता है ??" ...ऐसे श्रेष्ठ आलेख के लिए सहृदय साधुवाद एवं सद्भावनाएँ तथा ‘बेस्ट ब्लॉगर ऑफ़ द वीक’ के चयन पर हार्दिक बधाई !

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

के द्वारा: Shobha Shobha

अवश्य ही मातृभाषा वही है ,जिसे शिशु अपने शैशवकाल में सर्वप्रथम बोलता है और वह भाषा वह सबसे शीघ्र और आसानी से सीखता होगा ,भले ही हम कितने ही एडवांस क्यों न हो जाएँ | आदरणीया ,मेरे नन्नू से यह मुझे अनुभव हुआ,पर वह इंग्लिश भी सीख रहे ,जैसे -वह कहते ,हिन्दी में बिल्ली ,इंग्लिश में कैट | एक बार मैंने एक माँ को देखा,जो अपनी सहेली को यह बता रही थी - मेरा बच्चा ३-४ साल का हो गया,पर बोलता नहीं ,वह इंग्लिश में बात कर रही थी ,बच्चा उदास बैठा था ,मैंने बच्चे की ओर मुस्कराते हुए देखा ,और वह भी मुझे देखकर मुस्कराया,मुझे ऐसे लगता है -बच्चे भी भगवान की तरह भाव के ही भूखे हैं ,सरल और सहज होकर मिलो,बोलना तो क्या ,वह साथ में चल देंगे | अतः मातृभाषा ही माँ -संतान के बीच प्रेम का पहला पाठ है | सादर आभार और नमन |

के द्वारा: pkdubey pkdubey

प्रिय यमुना जी आपका लेख पढ़ा मन दुखी हुआ हम कैसे किसी घटना से अपने आप को इतना निराश कर लेते हैं की जीवन खत्म करने की सोच लेते थी आज सभी भौतिक वादी हो गये हैं पहले विदेशी हमलावर आते थे सब कुछ खत्म कर देते थे मलवे से जीवन फिर से खड़ा हो जाता था दिल्ली में सात साल के बच्चे की डेंगू से मृत्यु हो गयी बच्चे के माता पिता ने आत्म हत्या कर ली |में एक ऐसी महिला को जानती हूँ जिसका एक हाथ और पैर जड़ से कटा है वः ईएसआई तरह अपने घर का बिजनेस चलाती हैं पति डाक्टर उनके लिए आत्म हत्या करना क्या मुश्किल है ? जीवन अनमोल है जीवन जीने के दो ही तरीके हैं..अतीत से मुक्त होना और भविष्य के प्रति उन्मुख होना बहुत अच्छी बात

के द्वारा: Shobha Shobha

अवश्य ही आरक्षण देश के लिए घातक है ,आदरणीया, आप ने हर पहलू को बहुत अच्छे से समझाया पर मुझे लगता है ,यदि १०० % भी एक किसी जाती के एक ही सरनेम को आरक्षण दे दिया जाये ,तो जरूरी नहीं सबको सरकारी नौकरी मिलेगी ,आज प्राइवेट सेक्टर सरकारी सेक्टर से अधिक तेज़ी से आगे बढ़ रहा है ,पर प्राइवेट सेक्टर में शोषण है ,मैनेजमेंट सब कुछ है ,वर्कर कुछ नहीं ,धीरे -धीरे यह लोग प्राइवेट सेक्टर में भी आरक्षण की मांग करेंगे ,पर सबका समाधान तभी हो सकता है ,जब प्राइवेट सेक्टर को सरकार सही से कंट्रोल करे ,शिक्षा को हर इंसान तक पहुचाये और शिक्षा सस्ती हो ,सभी को उसकी योग्यता के अनुसार नौकरी मिले | उत्तर प्रदेश में मायावती ने जिन्हे प्रमोट किया ,अखिलेश उसे डेमोट कर रहे ,अखिलेश जिसे प्रमोट करेंगे ,उसे बीजेपी डेमोट कर देगी ,यदि ऐसा ही चलता रहा ,तो सब आपस में टकराकर ही मरते रहेंगे | सादर आभार और साधुवाद ,आलेख के लिए ,सादर नमन | शिक्षक दिवस की आप को और सभी शिक्षको को बहुत बधाई और सादर अभिवादन |

के द्वारा: pkdubey pkdubey

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

प्रिय यमुना जी आप सदैव इतना अच्छा लिखती है अत :लेख की प्रशंसा में क्या-क्या न लिखू बड़ी खूबसूरती से आपने अपने लेख में काव्य और गद्य को पिरोया है पिता बहुत संवेदनशील होते हैं वे संतान की उंगली थामते है हाथ नहीं क्योंकि वे उन्हें संरक्षण देना चाहते हैं उन्हें अधीन नहीं रखना चाहते हैं| बिलकुल नई बात सारपूर्ण बात अगर संतान माता की तरह पिता के भी ममत्व भाव को समझें और पिता भी बाहें फैला कर संतान के प्रति प्यार को मुखर कर लें तो संतान प्यार का इस महासागर के महत्व को गहराई से समझ पाएंगे किन शब्दों में अच्छाई नहीं है यमुना जी यही आपके लेखन की विशेषता है आप लेखक के साथ विचारक हैं केवल लिखने के लिए नहीं लिखती कहीं तो सूत्र ही लिख देती हैं

के द्वारा: Shobha Shobha

यमुना जी अाप योग सालों से करती आ रही हैं जानकर बहूत खुशी हुई । किंतु योग और योगासन मैं ऱात दिन का अंतर है । योगासन कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्था मैं कोई भी कर सकता है । उसका उद्देष्य केवल शरीर को लचीला स्वस्थ रखना ही होगा । .....परंतु योग का उद्देष्य आत्मा का परमात्मा से शाक्षात्कार हेतु तपस्या ही है । साधारण मनुष्य तो ईसके प्रथम अंग यम को ही पार नहीं कर सकता । ...्दूसरे या समाधी पहूॅचना तो सिर्फ ख्याली पुलाव भी नहीं हो सकते है । एक ब्राह्मण कुल के पंडित जो कर्म कांड के ज्ञाता हों । यज्ञोपवित धारण कर नित्य सुबह शाम संन्धय़ा वंधन कर अपना धर्म निभा रहे हों वे भी यम को नहीं लाॅघ पाते । एक धर्म भ्रष्ट योगी नहीं हो सकता और एक योग भ्रष्ट परमात्मा शाक्षात्कार नहीं कर सकता । गीता मैं कहा है योगी प्रयासी नष्ट भी नहीं होता ,किंतु अगले जन्म मैं कुलीन कुल मैं जन्रम लेकर योग की ओर प्रब्रत होता है । यानि की योगी भी वही हो सकता है जिसके पूर्व जन्म के शुभ कर्म हों । जिससे संस्कारवान होकर योग प्रसस्त होता है । मोदी जी का उद्रदेष्य योग नहीं योगासन ही होना चाहिए । जिस पर वे योग के विरोधाभाषी विकास मार्ग पर चलते विश्व गुरु बनने की चाहत पूरी करना चाहते हैं। योगासन विकास का मार्ग अवरोधक नहीं होगा और मोदी जी की जय जयकार होगी । मुसलमानों को वेवकूफ ना बनाते वे सत्य को स्वीकार करते कहें हाॅ योग हिंदुओं का ही परमात्मा शाक्षात्कार मार्ग है । जिसमैं योगासन को आम जनता की भलाई के लिए शुलभ किया जा रहा है ।यमुना प्रवाह को अनवरत करना ही मेरा उद्देश्य है | योग तन ,स्थान , और मन को निर्मल करके ही पाया जा सकता है | ओम शांति शांति

के द्वारा: PAPI HARISHCHANDRA PAPI HARISHCHANDRA

प्रिय वीना जी बहुत अच्छा लेख योग का कुछ वर्गों द्वारा राजनितिक कारणों से विरोध हो रहा करने वाले भी लम्बा जीने के लिए अपने घरों में योग करते हैं कुछ लोगों ने बताया वह अनुलोम विलोम करते थे सांस के रोगी थी सांस में जमा कफ पतला हो कर थूक से बाहर हो गया वह स्वस्थ हो गए परन्तु क्या करें कुछ लोगों का अड़ंगा डालना ही धर्म बन गया है | .धारणा, ध्यान और समाधि ही जीवन में संयम लाते हैं. योग को सही मायनों में जीवन में शामिल किया जाए तो शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक स्वास्थ्य भी बना रहता है क्योंकि इससे सदाचारिता ,सच्चरिता,आध्यात्मिकता जैसे गुण सहज ही विकसित हो जाते हैं .अतः योग की शक्ति को भक्ति विशेष से ना जोड़ा जाए .यह धर्म से जुडी पूजा पाठ की रस्म नहीं नहीं बल्कि स्वस्थ तन मन वाले सवा करोड़ भारतीयों के प्रिय भारत देश की सशक्त पहचान है बहुत उत्तम बात शोभा

के द्वारा: Shobha Shobha

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

आदरणीया यमुनाजी, सादर अभिवादन! चिंतनीय विषय पर गंभीर शोधपूर्ण आलेख के लिए आपका अभिनन्दन! आपने बहुत सारे कारण गिनवाए पर न्यायपालिका की तरफ आपकी कलम न चल सकी ...सजायाफ्ता कैदी को संग्रहालय में रखने की प्रवृत्ति आखिर कब तक रहेगी. क्या न्यायाधीश महोदय के पास ज्ञान की कमी है जो इस तरह के संगीन और क्रूरतम मामले को स्थगित रखने का तात्पर्य क्या है? और इस चर्चित विडिओ और दीमापुर की घटना से भी वे न्यायविद अनजान है? उनके उपर कोई उंगली उतहये तो न्यायपालिका की अवमानना, और सेवामुक्त होने के बाद काटजू की तरह प्रलाप ..ऐसे ही जज समांज का हित कर पाएंगे.? काम पढ़े लिखे की मानसिकता पर सवाल उठाना आसान है पर पढ़े लिखे लोग ही तो पोर्न फ़िल्में बनाकर ब्यवसाय कर रहे हैं और उनको अनुमति देनेवाले भी अनपढ़ तो नहीं.

के द्वारा: jlsingh jlsingh

यमुना जी अभिवादन । दर-असल इस मुद्दे पर समाज पूरी तरह दो हिस्सों मे बंटा हुआ है । महिलाएं जिनमे 99% की सोच एक्तरफा है और पुरूषों मे थोडा संतुलिए स्थिति है लेकिन इतना भी नही जितना ऊपर से दिखाई दे रहा है । इसमे पाखंडपूर्ण व्यवहार भी शामिल है । मुंह मे कुछ और दिल मे कुछ । रही बात बी.बी.सी की तो उसके पहले तो भारतीय मीडिया जिम्मेदार है । ऐसा तमाशा बनाओगे तो कोई भी डाक्यूमेंट्री बनाने आयेगा । इस तमाशे के कारण ही दीमापुर मे एक बेकसुर मारा गया । बलात्कार को तमाशा बनाने मे सभी का अपना अपना हित है । वरना सामाजिक समस्याएं तो और भी हैं और कम गंभीर नही । शहरों मे बुजुर्गों की बढती हत्या, बच्चों का यौन शोषण, अवसाद की बढती प्रवत्ति के कारण हो रही आत्महत्याएं , शहरों मे देह व्यापार का फैलता जाल , और भी तमाम । लेकिन वहां कुछ नही, बलात्कार को लेकर सारी चिंताएं हैं । मुझे तो मीडिया और समाज का यह व्यवहार ही समझ मे नही आ रहा ।

के द्वारा: एल.एस. बिष्ट् एल.एस. बिष्ट्

जहां इतनी असमानता हो कि चांदी के कटोरे कुछ घरों के शोकेस की शोभा बढ़ाते हैं और कुछ को हाथ पर रखकर भी खाने को रोटियां नसीब नहीं होती.वहां उपहारों की नीलामी से धन उगाही और उसका जन हित योजनाओं में प्रयोग करना बिलकुल तर्कसंगत लगता है .किसी बहाने तो ऐसे धन संग्रह से बाहर आकर चलन का हिस्सा बन धन जेनरेट करे ! सौ फीसदी सही कहा है आपने ! मुझे लगता है कि वृश्चिक राशि वाले लाल को शनि का नीला कलर सूट नहीं किया ! आदरणीय यमुना पाठक जी, नेताओं के झूठ फरेब और उल जुलूल हरकतों से इतना ऊब गया था कि कुछ दिन विश्राम करना उचित समझा ! सुबह इस लेख का सम्पादित अंश दैनिक जागरण में देखा तो मंच पर आ गया ! आपके प्रेरक और विचारणीय लेख सहज ही पढ़ने के लिए आकर्षित करते हैं ! विषयों में बदलाव पाठक को ऊबने नहीं देते हैं ! वादे पूरे नहीं करने के कारण मोदी जी से लोग अब ऊबने लगे हैं ! केजरीवाल जी से भी कुछ समय बाद जनता ऊबने लगेगी ! वो जनता को खुश कर पाएंगे, इसमें मुझे संदेह है !

के द्वारा: sadguruji sadguruji

आदरणीय शोभा जी यह सही है कि हम उनकी सिंसियरटी नहीं खरीद सकते पर एक बात बहुत अहम यह कि बच्चों के देखभाल के लिए बच्चों या किशोरियों को बिलकुल न रखें यह कानूनी तो गलत है ही साथ ही अपरिपक्वता की वज़ह से अपने बच्चों के साथ ये अपनी तुलना करने लगते हैं और ज़ाहिर है कि स्वयं को उपेक्षित मानाने की भूल कर जाते हैं अंजाम बच्चों से ईर्ष्या जो अपराध को जन्म देता है.परिपक्व उम्र की स्त्रियां फिर भी मातृत्व के एहसास से हानि शायद ही पहुंचाएं पर अपरिपक्व के साथ तो यह आशंका सदैव बनी रहती है. यूँ भी जब भी घर पर डोमेस्टिक हेल्प मौजूद हों हमारे कार्य और व्यवहार ऐसे हों जिस से वे स्वयं को निम्न या उपेक्षित न समझें . आपका बहुत बहुत आभार

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

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के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

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के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

के द्वारा: Rajesh Kumar Srivastav Rajesh Kumar Srivastav

सदगुरू जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद ....सम्मानित मंच की आभारी हूँ जिन्होंने साप्ताहिक ब्लॉग में इस विषय का चयन किया मुझे संतोष है कि यह बात अधिकाधिक लोगों तक पहुँच सकेगी कि वे बाल भिक्षुकों को दया वष चिल्लर ना दें इससे हम उनका कोई भला नहीं करते बल्कि ऐसे गलत चीज़ों को बढ़ावा देते हैं और जो लोग जान बूझ कर इस धंधे को अंजाम दे रहे हैं उनका हौसला बुलंद होता है .नेता चुनाव लड़ते है ....पर किसी नेता का ध्यान इन बच्चों पर नहीं जा पाता ...अमूमन सब की गाड़ियों के पास ट्रैफिक पर सड़क के किनारे मंदिर के बहार ये बच्चे दिख जाते हैं पर इसे उनका नसीब समझ चंद चिल्लर डाल लोग आगे बढ़ जाते हैं और ये बच्चे पुनः वहीं रूक जाते हैं कभी आगे ना बढ़ने के लिए . आपका अतिशय आभार

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

भारत में जनसँख्या अधिक नहीं है बल्कि प्राकृतिक साधनों का विकास नहीं होने के कारण गरीबी और बेकारी है ! आज एक तरफ मोदी जी डेमोग्राफी (मात्रात्मक या गुणात्मक) की बात कर रहे हैं और दूसरी तरफ साक्षी महाराज ,साध्वी प्राची चार चार बच्चे जन्म देने का सुझाव दे रहे हैं ! आदरणीया यमुना पाठक जी ! बहुत परिश्रम से लिखा गया बहुत उत्तम लेख ! बहुत बहुत बधाई ! लेख को समझने के लिए थोड़ा ध्यान से पढ़ना पड़ा ! आपने एक कुशल अर्थशास्त्री की भांति ये लेख लिखा है ! इस बात में कोई संदेह नहीं कि भारत में गरीबी का मुख्य कारण प्राकृतिक साधनों और मानव श्रम का पूरा सदुपयोग न हो पाना ही है ! हिन्दू संगठनों द्वारा चार बच्चे पैदा करने का सुझाव महज एक कूटनीतिक चाल है ताकि एक समान नागरिक संहिता देश में लागू करने के लिए सरकार और संसद पर दबाब बनाया जाये ! हिन्दू तो परिवार नियोजन का पालन कर ही रहे हैं, पर उन्हें कौन समझाए जो परिवार नियोजन का पालन कर ही नहीं रहे हैं? मंच पर सर्वोत्तम प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई !

के द्वारा: sadguruji sadguruji

आदरणीय जवाहर जी नमस्कार आपकी प्रेरणास्पद प्रतिक्रिया के लिए आप का बहुत बहुत आभार. यह सच है की मोदी जी की सोच नीतियां बहुत अच्छी हैं पर यह व्यवहारिक रूप में कैसे स्पष्ट हो ..जब वे डेमोग्राफी के बल पर निवेश करने को आमंत्रित कर रहे हैं तो इस डेमोग्राफी शब्द से उनका क्या तात्पर्य है...भारत जनसँख्या के मामले में (मात्रात्मक रूप )विश्व में दूसरा स्थान रखता है पर गुणात्मक रूप से तैयार नहीं यह भी ठीक कि युवाओं कि संख्या ज्यादा है जो श्रम (मानसिक /शारीरिक)बन कर उभर सकते हैं पर इस युवा मानव सम्पदा का विकास और उन्हें देश विश्व बाज़ार के अनुकूल तैयार करना है.डिग्री धारी पढ़ाई बहुत हो गई इससे बेरोजगारी का कुछ भी समाधान नहीं निकलता ,पहले इन युवाओं को तैयार किया जाए फिर आवश्यकतानुसार ही नए बच्चों कि संख्या बढ़ाने की बात हो .और अधिक जनसँख्या हमेशा मांग बढ़ाएगी यह भी ज़रूरी नहीं ....एक निर्धन परिवार में मांग किस वस्तु की बढ़ेगी ..खाद्यान्न की ...जब तक जनसँख्या पर नियंत्रण न होगा आर्थिक स्तर नहीं बढ़ेगा और आर्थिक स्तर निम्न रहने से मांग भी काम ही रहेगी. मोदी जी डेमोक्रेसी को भी निवेश के साथ जोड़ कर देखते हैं ...इस सच्चाई से उन्हें अवश्य वाकिफ होना चाहिए की आज जहां कारखाने लगे हैं ...स्थानीय नेताओं के नेतृत्व में अशिक्षित श्रमिकों द्वारा धरना प्रदर्शन हड़ताल आम बात हो गई है ...इससे निवेशकर्ता भी घबराते हैं .एक सुरक्षित वातावरण के बिना निवेश संभव नहीं.अभी मैने खोलने की बात हुई है यह सराहनीय कदम है . आपका पुनः धन्यवाद साभार साभार

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

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हरिश्चंद्र जी धर्म सदा से राजनीति से जुड़ा रहा है पर संवेदनशीलता और विवेकपूर्ण तरीके से .अकबर महान हो या अशोक महान सब ने राज काज चलाने के लिए धर्म का सहारा लिया था पर एक सुन्दर सन्देश के साथ आज धर्म का बचाव कह कर जो अधीरता दिखाई जा रही है मानव समाज के लिए ना तो वह कल्याणकारी है ना ही वह जो विशेष धर्म के मानक और प्रतिमानों पर कटाक्ष करती दिख रही है.धर्म संतुलन चाहता है .कबीर ने भी कटाक्ष किया था एक तरफ यह कह कर "कांकेर पत्थर जोर कर मस्जिद लिया बने ता चढ़ी मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदा ...वहीं दूसरी तरफ 'पत्थर पूजे हरी मिले तो मैं पूजूँ पहाड़ ता से तो चकिया भली पीस खाए संसार " यह कटाक्ष का संतुलन है . सुर असुर के युद्ध में KUCHH NAHEEN BACHATAA BAS ITIHAAS के PANNE BADH JAATE HAIN. AAPKEE प्रतिक्रिया बहुत ACHHEE LAGEE. saabhar

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भगवन दस जी आप की बात सही है बस कुछ ज़रूरी बातें यह कि .... प्रथम ,बाल भिखारियों को पैसे देने से बचें यहां तक कि पेन पेंसिल खिलौने भी ना दें क्योंकि ऐसी कोई भी वस्तु इनके काम नहीं आती इसे बेच कर भी इन्हे पैसे मिल जाते हैं जो गिरोह के काम आ जाते हैं .इनकी भूख मिटाने के लिए इन्हे भोजन ज़रूर दे सकते हैं जो ये हमारे सामने ही खा लें .भिक्षावृत्ति से निजात पाना मुश्किल है पर इसे कम करना इस तरह कुछ आसान होगा जब चिल्लर ही न मिलेंगे तो माफिआ भी क्या करेंगे . दूसरी अहम बात अपने या सगे सम्बन्धियों के बच्चे बच्चियों से सम्बंधित कोई भी updates या जानकारी सोशल साइट्स फेसबुक पर कभी ना डालें.बच्चों को भी समझाएं कि कुछ लाइक्स के चक्कर में यह गलती न करें .कुछ गिरोह इसी के ज़रिये बच्चों को टारगेट करते हैं मैंने यह सावधान इंडिया के एक कार्यक्रम में देखा था आपका बहुत बहुत धन्यवाद

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आदरणीय जवाहर जी आपकी बात सत्य है ये दोनों बात मैंने लिखी हैं हम पंगा भी नहीं ले सकते बस अपने स्तर पर कुछ महत्वपूर्ण काम करें प्रथम ,बाल भिखारियों को पैसे देने से बचें यहां तक कि पेन पेंसिल खिलौने भी ना दें क्योंकि ऐसी कोई भी वस्तु इनके काम नहीं आती इसे बेच कर भी इन्हे पैसे मिल जाते हैं जो गिरोह के काम आ जाते हैं .इनकी भूख मिटाने के लिए इन्हे भोजन ज़रूर दे सकते हैं जो ये हमारे सामने ही खा लें .भिक्षावृत्ति से निजात पाना मुश्किल है पर इसे कम करना इस तरह कुछ आसान होगा जब चिल्लर ही न मिलेंगे तो माफिआ भी क्या करेंगे . दूसरी अहम बात अपने या सगे सम्बन्धियों के बच्चे बच्चियों से सम्बंधित कोई भी updates या जानकारी सोशल साइट्स फेसबुक पर कभी ना डालें.बच्चों को भी समझाएं कि कुछ लाइक्स के चक्कर में यह गलती न करें .कुछ गिरोह इसी के ज़रिये बच्चों को टारगेट करते हैं मैंने यह सावधान इंडिया के एक कार्यक्रम में देखा था फ़लकनामा एक्सप्रेस की घटना के बाद मैं बहुत सशंकित हो गई हूँ मैं हर वह चीज़ अवॉयड करने लगी हूँ जिसमें जान का खतरा है सच कहूँ मुश्किल पड़ने पर कोई पुलिस मंत्री तक मदद नहीं कर पाता अपनी सावधानी ही काम आती है .यह घटना मुझे एक सबक सीखा गई .कितनी भी प्रमाणित सुरक्षित जगह का दावा सरकार करे पर वारदातें होती हैं और कोई कुछ नहीं कर पाता .अब तक मेरे सामान की रिकवरी नहीं हो पाई पुलिस हर बार आती है नए स्टेटमेंट ले जाती है और बस.... आपका अतिशय धन्यवाद.

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

अत्यंत मार्मिक होने के साथ साथ शोधकृत, सुविचारित एवं सूचनाओं से परिपूर्ण लेख है बहुत बहुत साधुवाद | समाज में व्याप्त एक ज्वलंत समस्या को आपने अपने लेख के माध्यम से सक्षम रूप से समाज के समक्ष रखा है| परन्तु समस्या ये भी आती है कि इस परिपेक्ष में सही गलत कि पहचान कर पाना असंभव सा हो जाता है| आज अनेकों NGO , जरूरतमंदों की सहायता करने का दावा करते हैं परन्तु असामाजिक गतिविधियों में लिप्त हैं और कभी कभी ये भी ख़बरें आती रहती हैं कि इस तरह के गिरोह पुलिस कि शह पर चलाये जाते हैं| आम आदमी विश्वास करे तो किस पर? इसीलिए आमलोग गहराई में गए बगैर अपने करुणा के स्वाभाव की तुष्टि शीघ्रातिशीघ्र कर लेतें हैं लेकिन उन द्वारा दिया गया धन पहुँच जाता है असामाजिक तत्वों के हाथों और समाज को और कमजोर बनाने में लगाया जाता है | मेरे देश और समाज का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है ! भगवान दास मेहंदीरत्ता

के द्वारा: bhagwandassmendiratta bhagwandassmendiratta

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जब तक सांस है तब तक विचारों का सुवास भी बना रहे..आदरणीया यमुना पाठकजी, बहुत सुन्दर बात कही है आपने ! मुझे तो ऐसा लगता है कि हम सबका जीवन चलती हुई ट्रैन की तरह है, जो परमात्मा के धाम से चलती है और संसार की विभिन्न योनियों में भ्रमण करते हुए एकदिन फिर परमात्मा के धाम जा पहुँचती है ! ट्रैन को चलने के लिए जैसे पटरी चाहिए, ऐसे ही जीवन को चलने के लिए संस्कारों की पटरी चाहिए और ये संस्कारों की पटरी ब्रह्माण्ड में हमेशा विद्यमान रहती है ! उसी व्यष्टि और समष्टि संस्कारों के आधार पर ये सृष्टि बनती बिगड़ती रहती है ! हमलोग कितनी सावधानी बरतते हैं, फिर भी घटनाए और दुर्घटनाएं घट ही जाती हैं ! इससे सिद्ध होता है कि सृष्टि में सबकुछ वही होता है, जो होना निश्चित हैं ! संपादक मंडल के सभी सदस्यों तथा मंच से जुड़े सभी ब्लॉगर मित्रों को नए साल की बधाई ! काफी दिनों के बाद आपकी मंच पर उपस्थिति बहुत अच्छी लगी ! आपको और आपके समस्त परिवार को नववर्ष की बहुत बहुत बधाई !

के द्वारा: sadguruji sadguruji

प्रिय ब्लॉगर साथियों जब a1 डिब्बों में ये हालत है तो हम आप शेष की भयावह कल्पना कर सकते हैं.ए सी में कोई घुस कर चैन काट कर अटैची ले जाता है और सात घंटे बाद एक बस स्टॉप से अटैची मिलाने का फोन आता है जब उसे कलेक्ट करने जाओ तो कीमती सामन गायब होते हैं सिर्फ कागजात मिलते हैं अजीब सी घटना है . आप सबों से इस घटना को साझा इसीलिये किया कि रेल यात्रा के दौरान आस पास बैठने वाले सहयात्री से भी सचेत रहे और रात भर जाग कर पुस्तक पढ़ते हुए या गेम खेलते हुए यात्रा करें क्योंकि अपनी सुरक्षा अपने हाथ या फिर एक ही स्थान पर जड़ बन जाइए क्या फायदा महंगी टिकट लेकर सुरक्षित यात्रा के भरोसे और आस में मेहनत और ईमानदारी से जोड़े धन गँवा दिए जाएं वह भी अपनी नहीं बल्कि रेलवे प्रशासन की लापरवाही से अटेंडर टी सी कोई देख नहीं सका और आश्चर्य की बात कि एक भी पुलिस एस्कॉर्ट्स नहीं था उस ए सी बोगी में . आप सब मेरे साथ हैं मुझे संतुष्टि है पर इस घटना का पर्दाफाश होना बहुत ज़रूरी है. साभार

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

आदरणीया यमुना पाठक जी ! इस संकट के समय में हम सब आपके साथ हैं ! रेलवे की लापरवाही से आपको इतना नुकसान हुआ है ! रेलवे कुछ नहीं कर सकती तो ट्रेन की बोगियों में साफ साफ लिख दे कि मुसाफिर अपनी और अपने सामान की रक्षा स्वयं करें ! आप पूरा विवरण दैनिक जागरण अख़बार को भेज दें ! मोदी जी कहते हैं कि मैं आम आदमी के बेहद करीब हूँ ! परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है,क्योंकि उनके मातहत कर्मचारी एक्टिव नहीं हैं ! यदि एक्टिव होते तो आपकी बात मोदी जी तक पहुँचती और तुरंत कोई कार्यवाही होती ! मोदी जी की वेबसाइट देखने वाले कर्मचारियों से मेरा अनुरोध है कि आदरणीया यमुना पाठक जी की समस्या मोदी जी तक न सिर्फ पहुंचाई जाये,बल्कि उसपर तुरंत कार्यवाही भी की जाये ! इस परेशानी के समय में सभी ब्लॉगर आपके साथ हैं ! शीघ्र कार्यवाही होने की शुभकामनाओं सहित !

के द्वारा: sadguruji sadguruji

हरिश्चंद जी मैं जानती हूँ इस ब्लॉग को सरसरी तौर से पढने पर इसके केंद्रीय भाव को समझ पाना मुश्किल होगा ....पाकिस्तान की बार बार के इस रवैये को विश्व मंच भी पहचान चूका है ...कश्मीर मुद्दे के विषय में उसके द्वारा संयुक्त राष्ट्र को भेजे गए पत्र का कोई ज़वाब नहीं दिया गया बल्कि आपसी बातचीत से समस्या सुलझाने की बात कही गई...कश्मीर के रास्ते जिस तरह से आई एस आई एस की भी एक झलक आज देखी गई ..(हालांकि इससे पैनिक होने की ज़रुरत नहीं)इस सारे गतिविधि को देखते हुए साहस और कूटनीति की ज़रुरत है दुस्साहस और लफ़्फ़ाज़ी की नहीं .... पाकिस्तान के अंदरूनी हालात ठीक नहीं राजनीति लड़खड़ा रही है और ऐसे ही हालात वह भारत देश में भी देखने को बेचैन है वह युद्ध चाहता है और इसी बहाने भारत की प्रगति के पहिये रोकना भी चाहता है ....क्या यह उचित होगा की हमारे नेता गण पूरे अवाम को युद्ध की आग में झोंक दें ....गोलीबारी का ज़वाब पूरी मुस्तैदी से भारतीय फ़ौज़ दे रही है जिसकी कल्पना भी पाक नहीं कर सकता था ....पर अभी अवाम को अपने आस पास के हालत से सचेत रहना है कोई अवांछित तत्त्व हमारे बीच हों और हम पूरे बेखबर बने रहे ....हम बॉर्डर पर लड़ने नहीं जा सकते पर सचेत तो रह सकते हैं . ब्लॉग पर आने का बहुत बहुत आभार

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शोभा जी तबस्सुम की कुछ झलक तो तो मलाला और कैलाश जी को नोबेल से सम्मानित होने पर महसूस की जा रही है.आपके अनुभव सही हैं पर फिर भी मैं कहूँगी की इस हालत में जब हमारा देश प्राकृतिक आपदा झेल रहा है फिर भी कई विकास वादी योजना पर आगे बढ़ रहा है ...देश को युद्ध की आग में झोंक देना बिलकुल तर्कसंगत नहीं लगता.पाकिस्तान ने फिर फायरिंग जारी कर दी है ...वह चाहता है कि विश्व के विशाल नभ में उभरते भारत देश के सूर्य को गोलीबारी,आतंकवाद कश्मीर आलाप से दिग्भ्रमित कर दो और यही हमारे नेताओं और अवाम को समझना है .....क्या युद्ध में भी लोग मारे नहीं जाएंगे ?? और क्या फिर सदा के लिए वह यद्ध से मुंह मोड़ लेगा ...नहीं ...पाकिस्तान वह पड़ोसी /भाई है जो इस कहावत को चरितार्थ करता है "ना भाई जस भाई ना भाई जस दुश्मन " उसकी छटपटाहट बस इसलिए है क्योंकि भारत तेजी से प्रगति पथ पर दौड़ रहा है.....और जाणारा जागृत है ......वह बस यही कर भारत के सुख चैन को छीन सकता है ...ज़रुरत है ....हमारे एकजुट रहने की .....सेना के जवान डेट मुक़ाबला कर रहे हैं हम क्यों उन्हें हतोत्साहित करें ......सवा सवा लाख पर एक को लडाऊँगा भी इस भारत की धरती से गूंजा था .....अभी युद्ध बिलकुल भी तर्कसंगत नहीं आपका अतिशय आभार

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

आदरणीया यमुना पाठक जी ! सादर अभिनन्दन ! इस लेख में आपने अच्छा सुझाव दिया है ! अर्थशास्त्र और हिंदी मेरी उच्चशिक्षा के मुख्य विषय होने के कारण विषयवस्तु को समझने में ज्यादा कठिनाई नहीं हुई ! 64 साल पुराने योजना आयोग को ख़त्म करना जरुरी था ! वित्तीय साधनों के आबंटन में दुहरापन तो था ही,साथ ही भेदभाव भी बहुत था ! इसकी जगह पर नई संस्था बनाने का जो सुझाव आपने दिया है,वो बात मुझे विचारणीय लगी ! मेरे विचार से सबसे बड़ी बात ये है कि नई संस्था में देशवासियों की रूचि,विश्वास और किसी न किसी रूप में सहभागिता हो ! मुझे लगता है कि राज्यों को वित्तीय साधनों आबंटन वित्त आयोग के जरिए होगा ! मुझे संदेह है कि नई संस्था को स्वायत्त अधिकार दिए जायेंगे ! ये केवल एक परामर्श देने वाली संस्था भर होगी ! एक बात और हो सकती है,वो ये कि नई संस्था का अध्यक्ष पद भाजपा नेता व पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा जी को दिया जा सकता है ! अंत में आपसे मन की बात कहूँ तो ये सब ड्रामे अपने दल के बुजुर्ग नेताओं को ससम्मान विदा करने के लिए किये जाते हैं ! देशहित सोचनेवाला कोई भी बुद्धिजीवी ऐसी संस्थाओं के भीतर न तो प्रवेश कर पाया है और न कभी कर पायेगा ! भाजपा कांग्रेस से बेहतर जरूर है,लेकिन अपने बुजुर्ग नेताओं को कोई न कोई पद देकर उपकृत करने के मामले में वो कांग्रेस से भी दो कदम आगे है,चाहे वो राज्यपाल के पद हों या फिर किसी नई बननेवाली संस्था के ! सार्थक,अतिसुन्दर और विचारणीय प्रस्तुति के लिए आभार और आपके देशप्रेम के जज्बे को सलाम !

के द्वारा: sadguruji sadguruji

आदरणीया यमुना पाठक जी ! अभिनन्दन और विजयदशमी की बधाई ! आपका लेख बहुत सार्थक और विचारणीय है ! आज सुबह दैनिक जागरण में इस लेख सम्पादित अंश पढ़ा ! आपके पिछले लेख का भी कुछ अंश अभी कुछ रोज पहले सम्पादकीय पेज पर छपा था ! अच्छे लेखों के सम्पादित अंश अख़बार में छपा देखकर बहुत ख़ुशी होती है ! आपके यहाँ दैनिक जागरण अख़बार नहीं मिलता होगा,इसीलिए मैंने सोचा कि आपको खबर कर दूँ ! आपका लेख पढ़कर एक नई चीज मैं सोच रहा था कि यदि रावण अर्द्धनारीश्वर होते अर्थात उनमे पुरषोचित के साथ स्त्रियोचित गुण भी होते तो वो राम के द्वारा नहीं मारे जाते ! मुझे लगता है कि यदि स्त्री और पुरुष दोनों भगवन शिव की तरह से अर्धनारीश्वर हो जाएँ संसार की अशांति और दुःख बहुत हद तक कम हो जाये ! विचारणीय वैचारिक प्रस्तुति के लिए आभार !

के द्वारा: sadguruji sadguruji

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

आदरणीय शोभा जी स्त्रियों की पीड़ा स्त्री ही दूर कर सकती है ...एक माँ अपने बच्चे को सही शिक्षा दे तो वह प्रत्येक स्त्री का सम्मान करे .दहेज़ प्रथा के विरोध में भी पुत्र की माँ इसका विरोध करे ...जेंडर डिस्क्रिमिनेशन को ना स्वयं स्वीकारे ना इसे घर पर प्रयोग करे .....घरेलू हिंसा के विरोध में घर की स्त्री ही उसे मदद कर सकती है...भ्रूण हत्या को सिरे से ख़ारिज करे संतान को जन्म देने का उसे अधिकार है फिर चाहे वह पुत्र संतान हो या पुत्री ...अपने स्त्री रूप में ही वह गौरवान्वित हो....खेल अंतरिक्ष विज्ञान गीत संगीत लेखन ऑटो चालक ,इंजन चालक .....हर क्षेत्र में उसने अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा दी है ...फिर उसे हताश होने की ज़रुरत नहीं है...पुरूष स्वभावतः कठोर होता है पर स्त्री की कोमलता और विवेक बुद्धि की रक्षा भी करता है ठीक उसी तरह जैसे गुलाब की कोमलता की रक्षा कांटे करते हैं कभी उसके खिलने के मार्ग में बाधक नहीं बनते.....आप ही बताओ क्या कभी किसी गुलाब ने यह शिकायत की कि कांटे उसे खिलकर सुगंध बिखेरने नहीं दे रहे हैं ...बस ज़रुरत है गुलाब के पौधे रूपी समाज में फूल रूपी स्त्री की कोमलता और कांटे रूपी पुरुष की कठोरता एक दूसरे की सहायक बने ...गुलाब का अस्तित्व भी उन काँटों की वज़ह से ही बच पता है.और कांटे गुलाब की वज़ह से ही कुदरत का अंग बन पाते हैं . ब्लॉग पर आपने अपना बहुमूल्य समय दिया आपकी आभारी हूँ.

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

कभी कभी मैं भी सोचता हूँ कि नरेंद्र datt (स्वामी विवेकानंद) का नरेंद्र मोदी के रूप में पुनर्जन्म हुआ है क्या ? आज फिर से जापान, चीन और अब अमेरिका में अपना झंडा फहराने पहुँच चुके है श्री नरेंद्र मोदी. अमेरिका में जो शोहरत शायद स्व्वामी विेकानन्द को मिली होगी उससे कहीं ज्यादा आज के नरेंद्र मोदी को मिल रही है ...कुछ तो बात है इस व्यक्तित्व में नवरात्रिकाल में निराहार रहकर अमेरिका में विभिन्न कार्यक्रमों में भाग लेंगे ...देश विदेश की मीडिया हर पल का अपडेट दे रही है. kisee भी राष्ट्राध्यक्ष के लिए किया जाने वाला यह सबसे खर्चीला और भव्य सम्मान है ...यह भी भारत के लिए गौरव की बात है ...अब देखने वाली बात यही है कि हम भारतीय कितना लाभ उठा पाते हैं इस नए स्वामी की देश bhakti का ...झाड़ू तो हाथ में आ गयी है गणमान्य लोगों के हाथ में ...सफाई तो हो रही है अंदर बाहर....जय हो! आपके आलेख की कुछ पंक्तियाँ जन्हे आपने भी “विवेकानंद -चरित ” से लिया है हो सकता है मैं भी इन्हे कहीं प्रयोग करूँ . पूर्व सूचना दे रहा हूँ. सादर अभिनन्दन आपका इस उत्कृष्ट आलेख के लिए

के द्वारा: jlsingh jlsingh

आदरणीया यमुना जी, सादर अभिवादन! सर्वप्रथम आपका बहुत बहुत आभार आज के दिन को महिमामंडित करने के लिए क्योंकि मेरा इस दिन से ख़ास रिश्ता है. दूसरा आपने जमशेदपुर के भूंजे, गुड़, सत्तू और फकीरा चनाचूर वाले का जिक्र किया है. तीसरा आपने उन सभी उपेक्षित निपुण कारीगरों का जिक्र किया है जिनसे मेरा खास लगाव भी है. काश की ऐसा होता जैसा की आपने अपने ब्लॉग में जिक्र किया है. उन सबको अपनी निपुणता के साथ नैतिकता भी सिखाई जाती साथ ही "स्किल @ गुड पे स्केल विद वैल्यू के मापदंड पर खरा तैयार किया जाए .मानव संसाधन को विकसित करने का यही नैतिक,आर्थिक,सामाजिक और तात्कालिक तकाज़ा है" . एक महत्वपूर्ण आलेख के लिए बधाई और अभिनन्दन !

के द्वारा: jlsingh jlsingh

आदरणीया यमुना पाठक जी ! सुप्रभात ! सबके लिए आज १४ सितम्बर का दिन मंगलमय हो ! हिंदी की सेवा करने के लिए आपका अतिशय अभिनन्दन ! आपका ये शिक्षाप्रद प्रसंगों से युक्त लेख मुझे बहुत अच्छा लगा ! कई जगह पर जो शाब्दिक त्रुटियाँ हैं,वो महत्वपूर्ण नहीं हैं ! किसी ब्लॉग के कमेंट बॉक्स में टाइप कर कठिनाई से इतना प्रेरक लेख लिखना तो यही दर्शाता है कि आप स्वयं प्रेरणा की एक बहुत बड़ी स्रोत हैं ! बहुत अच्छी अंग्रेजी जानते हुए भी आपका हिंदी के प्रति लगाव और समर्पण अत्यंत प्रशंसनीय है ! बहुत बहुत बधाई और इस प्रेरक रचना को मंच पर प्रस्तुत करने के लिए ह्रदय से आभार ! हिंदी दिवस पर आपको भी बधाई ! अपने इस प्रतिष्ठित और अनुपम जागरण जंक्शन मंच का इस बार 'हिंदी दिवस' पर खामोश रहना मुझे अच्छा नहीं लगा ! जागरण परिवार बहुत प्रभावशाली,धनवान और समर्थ है ! हिंदी के प्रसार-प्रचार के लिए मंच की ओर से हर वर्ष की भांति इस बार भी कोई आयोजन जरूर होना चाहिए था,क्योंकि हिंदी के संवर्धन के लिए ब्लॉगरों के अच्छे सुझाव हिंदी प्रेमी प्रधानमंत्री तक पहुँचते ! प्रधानमंत्री जी के बारे में मैं क्या कहूँ ! हमेशा की भांति बस यही कहूँगा कि प्रकृति,सदात्माएं और ईश्वर सभी उनके अनुकूल हैं और वो भारत के नवनिर्माण का एक नया इतिहास रचने जा रहे हैं ! आपसे दिल की बात कहूँ तो मोदी जी के बारे में जब भी मैं सोचता हूँ मुझे तो सबकुछ एक सुखद स्वप्न जैसा और फ़िल्मी दुनिया के बिग शो मैन राजकपूर जी की कोई दिलचस्प फिल्म जैसा लगता है ! मैं इस बात से बहुत खुश हूँ की मोदी जी हिंदी,हिन्दू और हिंदुस्तान इन तीनो की ही हीनभावना दूर कर उसे सम्मान और सफलता के क्षितिज पर पहुँचाने में लगे हैं ! वो आजादी के बाद से लेकर अबतक हुए प्रधानमंत्रियों से बिुलकुल भिन्न हैं,क्योंकि वो किसी भी हीनभावना से ग्रस्त नहीं हैं ! ईश्वर उन्हें देशसेवा करने के लिए लम्बी उम्र और अच्छा स्वास्थ्य दें !

के द्वारा: sadguruji sadguruji

हिन्दी दिवस को आने में एक दिन का समय शेष है.मैं इस प्रतिष्ठित मंच से अपने ब्लॉग के माध्यम से प्रधान मंत्री जी से सविनय निवेदन करना चाहती हूँ कि इस 'हिन्दी दिवस 'के अवसर पर वे देश के सभी राज्यों में यह नियम अनिवार्य बना दें कि किसी भी सूचना दायक बोर्ड पर (रैलवे स्टेशन,माइलस्टोन या दुकानों बाजारों के बाहर लगे बोर्ड पर ) लिखी सूचनाओं शब्दों और वाक्यों को उस राज्य की राजभाषा,और अंग्रेज़ी भाषा (जो प्रायः मैंने ओडिशा,पश्चिम बंगाल और अब कर्नाटक में देख रही हूँ) के साथ साथ अनिवार्य रूप से हिन्दी भाषा की देवनागरी लिपि में लिखा होना एक नियम बना दें .इससे उन सभी साक्षर लोगों को लाभ पहुंचेगा जो कि अपनी मातृभाषा या राष्ट्रभाषा हिन्दी से तो साक्षर हैं पर अंग्रेज़ी भाषा की रोमन लिपि से अनभिज्ञ हैं .ऐसी परेशानी मैं ने महसूस की है जब अन्य राज्यों में आने पर राजभाषा में ही लिखे सूचना बोर्ड को मैं साक्षर और शिक्षित होने के बावजूद पढने में पूर्णतः असमर्थ थी.(अभी कन्नड़ भाषा मेरे लिए मुश्किल है )अन्य राज्यों के स्थानीय लोग भी जब दक्षिण भारत या ओडिशा,बंगाल जैसे राज्यों में जाते हैं तो उन्हें अंग्रेज़ी या वहां की राजभाषा में लिखे शब्दों को पढने में असमर्थता महसूस होती है. अगर मेरा यह सन्देश प्रधान मंत्री जी तक पहुँच जाए तो मैं अपने इस अनुपम मंच की बहुत बहुत आभारी रहूंगी. आम जनता के लिए एक विशेष पहल के साथ आप सबों के साथ जागरण में साथी ... यमुना पाठक

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

प्रिय ब्लॉगर साथियों/पाठकों मैंने यह ब्लॉग बहुत मुश्किल से टाइप किया है ..क्योंकि HTML काम नहीं कर रहा है ....मैंने इसे अपने ही एक ब्लॉग में कमेंट बॉक्स में टाइप कर डैश बोर्ड पर कॉपी पेस्ट किया है ...कुछ त्रुटियाँ ब्लॉग में दिख रही हैं दूसरे अनुच्छेद की अंतिम पंक्ति में काम से काम गलत है कृपया उसे 'कम से कम 'पढ़ें ...तीसरे अनुच्छेद में समझती को 'समझाती 'पढ़ें और सबसे अंतिम अनुच्छेद में संचित को 'सिंचित' पढने की कृपा करें . आप सब दक्षिण भारत में मेरे इस अनुभव के विषय में क्या विचार रखते हैं अवश्य बताएँ मुझे अच्छा लगेगा और आस-पास के वातावरण के प्रति मेरी सजगता और ज्ञान वर्धन की ललक को और भी प्रेरणा मिलेगी. साभार

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

आदरणीय संचालक महोदय जी यमुना का सादर नमस्कार मान्यवर, पिछले कुछ दिनों से मैं जब भी ब्लॉग टाइप करने की कोशिश कर रही हूँ HTML पर क्लिक करने से कोई रिजल्ट नहीं मिलता और शब्द बिलकुल टाइप नहीं हो रहे हालांकि dash बोर्ड ओपन हो जाता है.आप को मालूम है अपने इस अनुपम मंच से दूर मैं ज्यादा देर नहीं रह सकती,ब्लॉग्स लिखने के लिए हिन्दी दिवस सा अवसर चूक ना जाऊं मेरे लिए यह भी एक अहम बात है ..कई विषयों पर विचार हैं ब्लॉग का ड्राफ्ट भी तैयार नहीं कर पा रही हूँ .आशा है आप इस दिशा में मेरी त्वरित मदद करेंगे.मैं कृतज्ञ हूँ कि हमें आपने एक ऐसा प्लेटफार्म दिया जो पूर्णतः निःशुल्क है और हम सब हिन्दी भाषा के बहुत ही अदने से ब्लोग्गेर्स को अपने विचार इतने प्रतिष्ठित माध्यम से साझा करने का सुअवसर दिया है .आप को पता है इस सम्मानीय मंच से जुड़ कर मुझे अब सिर्फ सामाजिक ,आर्थिक ,विषयों की तरफ रूझान के साथ साथ राजनीति जैसी कभी रुचिकर ना लगाने वाले विषय के प्रति भी रूझान हो गया है.जब किसी संस्था से हम इस तरह लाभान्वित होते हैं तो हमारी रूचि और सम्मान दोनों ही संस्था के प्रति दुगुनी रफ़्तार से बढ़ने लगती है. हिन्दी दिवस पर इस प्रतिष्ठित अनुपम मंच की वैचारिक दुनिया से जुड़े प्रत्येक सदस्य को बहुत सारी शुभकामना आपका अतिशय धन्यवाद.

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

बिष्ट आपका बहुत बहुत आभार आप सोचिये जब हमारे प्रधान मंत्री जी इस विषय पर इतने महत्वपूर्ण दिन इस विषय पर बोल सकते हैं तो हम तो बहुत अदने से लोग हैं.अव्वल तो सभी सरकारी संस्थानों में शौचालय की व्यवस्था नहीं है और जहां है वहां गन्दगी और टूटे दरवाज़े ,टूटे फर्श ,और पानी की असुविधा की वज़ह से वे ABANDONED ही हैं.जो धन राशि इस मद के लिए दी भी जाती है उसके खर्च पर कोई मॉनिटरिंग ही नहीं है.कुछ आँगन बाड़ी के टॉयलेट ना तो बेबी फ्रेंडली है ना ही उनमें छत या दरवाज़े हैं . देश में एक तरफ ऐसे आलीशान टॉयलेट्स हैं जहां बैठ कर हम अखबार मैगज़ीन पढ़ सकते हैं पूरा दिन खुशी खुशी बिता सकते हैं और दूसरी तरफ जहां के आस पास हम फटकना भी नहीं चाहते .... इंडिया और भारत के बीच के अंतर का यह भी एक पैमाना है . साभार

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

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बहुत सही कहा आपने यमुना जी जहां तक टॉयलेट की सफाई का प्रश्न है मैं समझती हूँ की इन्डियन स्टाइल  टॉयलेट हमारी मानसिकता के हिसाब से अधिक सही हैं जिनका निर्माण अधिक होना चाहिए क्यूँ की थोडा गन्दा होने की स्थिति में भी हम उसे अनिक्षा से ही सही मजबूरी मान के ही सही इस्तेमाल कर सकते हैं मगर युरोपियन तोय्लेट्स को तो अगर एक ने भी सफाई से इस्तेमाल नहीं किया तो उसे इस्तेमाल नहीं किया जा सकता न ही वोहाइजेनिक होगा यही वज़ह है कीमौल जैसी जगह में पढ़े लिखे लोग-महिलाएं भी इनटॉयलेट्स को इस्तेमाल नहीं करना चाहती-- कमोड्स भी दें क्यूँ की जोड़ों से परेशान लोगों की मजबूरी है मगर अधिक तर इंडियन सिस्टम का ही निर्माण हो तो शायद कुछ प्रतिशत फर्क अवश्य पड़ेगा ऐसा मुझे लगता है बाकी ये तो निर्विवाद सत्य है की जब तक हम खुद अपने को नहीं सुधारेंगे समाज नहीं सुधर सकता और हम यूँ ही सरकार को कोसते रहेंगे

के द्वारा: kavita1980 kavita1980

आदरणीया यमुना जी, सादर अभिवादन ! लीक लीक गाड़ी चले कायर क्रूर कपूत, लीक छाड़ि तीनो चले शायर सिंह सपूत. आपने एयर सद्गुरु जी ने लीक से हटकर अपने विचार दिया हैं, पर मुझे कुछ तीसरा ही सूझ रहा है, कोयल की कूक कवियों, को प्रेमियों को भाती है, कोयल की चतुराई मूर्ख कौवे को क्यों समझ न आती है. महामारी में कौवे ही मरते हैं,जूठे भोजन, और मुर्दे पर कौवे ही टूट पड़ते हैं. विधि का विधान, कुछ ऐसा ही है, चतुर मिहनत नहीं करते, मूर्ख मिहनत कर गरीबी में रहते है... एक दिन में डेढ़ करोड़ आदमी खाताधारी कार्ड धारी बन जाता है, गरीबी कैसे भगाई जाती है, किसी को समझ में कुछ आता है? बुलेट ट्रैन, काशी को क्योटो, स्मार्ट सिटी विकास ही कहलाता है.

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

तुम्हारी मीठी बोली का करते प्रचार अक्सर लोग पर कौवे को लगाते हैं ससम्मान पितृ भोग ! आदरणीया यमुना पाठक जी ! सुप्रभात ! फिर से एक नए विषय पर बहुत सुन्दर कविता ! परन्तु एक शिकायत भी है कि आपने अपनी कविता में कौवे का पक्ष कुछ ज्यादा ले लिया है ! आज सुबह आपकी कविता मैं पढ़ा और उसपे मैं कुछ देर तक विचार भी किया ! मेरे मन में भी एक विचार पैदा हुआ कि कौवे इस संसार के प्रतीक हैं और कोयल हम सब से अपने को छुपाये हुए परमात्मा की प्रतीक है ! परमात्मा रूपी कोयल कि सुरीली कूंक शांतचित्त होने पर आत्मा में जब गूंजती है तो आंनद और करुणा के सिवा और कुछ कहाँ रह जाता है ! सुबह के समय आपकी कविता पढ़ना बहुत अच्छा लगा ! अभिन्दन और बधाई !

के द्वारा: sadguruji sadguruji

आदरणीया यमुना पाठक जी ! सुप्रभात ! बहुत सार्थक और शिक्षाप्रद लेख ! आपने सही कहा है-जीवन तो ईश्वर का दिया हुआ उपहार है ! धारा ३०९ हटाने के समर्थन में आपने बहुत सही कहा है-आत्महत्या की कोशिश करने वाला व्यक्ति पहले ही मानसिक और शारीरिक पीड़ा झेल रहा होता है ऐसे में उसे सजा भी देना मरे हुए को मारना ही तो है ! लेख में आपने सभी वर्ग के लोंगो को बहुत सकारात्मक सुझाव दिए हैं ! हमारे आश्रम में बराबर आने वाली एक बीस वर्षीय युवती अभी कुछ दिनों पहले आत्महत्या कर ली ! वो अपने पति और ससुराल वालों से बहुत दुखी थी ! वो जब भी मेरे पास आती थी,मैं उसे बहुत समझाता था कि घबराओ मत,तुम्हारे जीवन में सुख के दिन भी जरूर आएंगे ! जब मुझे उसके आत्महत्या कर लेने की खबर मिली तो कई दिनों तक मैं बहुत अपसेट रहा ! मैंने अपनी सामर्थ्य के अनुसार उसकी हर संभव मदद की थी ! मैं चाहता था कि वो फिर से पढ़े ! बीए बीएड कर कहीं नौकरी करे ! पिछले वर्ष एक पंद्रह साल की लड़की घरेलू कलह की वजह से आत्महत्या कर ली थी ! मैंने उसके घरवालों को बहुत समझाया था,परन्तु वो आपस में झगड़ना बंद नहीं किये थे और एक बहुत दुखद हादसा हो गया था ! पहले मुझे लगता था कि आत्महत्या करने वाले बहुत कायर और नकारात्मक सोच वाले व्यक्ति होते हैं,परन्तु जब इस विषय में गहराई से अध्ययन किया तो पाया कि आत्महत्या करने वाले कायर नहीं बल्कि बहुत साहसी होते है,परन्तु अपने साहस का दुरूपयोग अपने को मिटाने के लिए करते हैं ! लोग अक्सर अपने परिवार,भाग्य और ईश्वर से नाराज रहते हैं,इसीलिए हमेशा नकारात्मक ढंग से ही सोचते हैं ! मुझे तो ये दुनिया और इस दुनिया को बनाने वाले,दोनों से ही बहुत प्रेम है ! अपनी सामर्थ्यनुसार मनुष्य से लेकर एक चींटी तक का भी कुछ हित करके ख़ुशी होती है ! मैं चाहता हूँ कि हजारो वर्ष तक मैं जीवित रहूँ और मानता की सेवा करता रहूँ ! मेरे जीवन में खुशिया हरदम रहती हैं,क्योंकि मैं उन्हें उतपन्न करना जानता हूँ ! दुःख में भी सुख उतपन्न कर लेता हूँ ! इस अनुपम मंच से और आपलोगो जैसे महान मित्रों से जुड़ने के बाद तो दुखी होने और नकारात्मक सोचने का समय ही नहीं मिलता है ! इस मंच से अधिक से अधिक लोंगो को जोड़ा जाये तो बहुत से लोग अपने मन की बात कह के नकारात्मक सोच से मुक्ति पा जायेंगे और आत्महत्या जैसा पलायनवादी विचार ही नहीं करेंगे ! दोस्ती का ये अनुपम मंच है,पर इसमें व्यापक सुधार की जरुरत है,ताकि अधिक से अधिक लोग इस मंच से जुड़ें ! अंत में इस विचारणीय लेख के लिए बहुत बहुत बधाई !

के द्वारा: sadguruji sadguruji

सबसे अहम बात अच्छी पुस्तकें पढ़ें ,अच्छी संगत में रहे और अच्छा सोचें …जीवन है तो परेशानियां भी रहेंगी ….और समाधान भी मिल जाएगा ….ईश्वर से और स्वयं से प्यार करें …भौतिक जगत में अपने कर्म करते रहे साथ में आध्यात्मिक भी बनें इससे जीवन शक्ति मिलती है .ईश्वर प्रदत्त उपहार की देखभाल करें …उसके महत्व को समझें….जीवन सोद्देश्य जीएँ …..अपनी और अपने आस पास के लोगों का भरपूर ख़्याल रखें …..जीवन की राह में कोई शार्ट कट नहीं होता जीवन संयमित रहे .अनावश्यक वस्तुओं और रिश्तों के प्रति लोभ रखना अनुचित है.कटु टिकट अनुभव जीवन में मिलते रहते हैं पर उनसे सीख लेकर और मधु अनुभवों को याद कर दरिया की मानिंद आगे बढ़ जाएं जो आज है वह कल ना रहेगा .वक़्त के हाथों कभी मज़बूर ना हों साहस दिखाएँ. बहुत अच्छा सन्देश दिया आपने आदरणीया यमुना जी!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

यमुना जी !आपकी लेखकीय मुद्रा गंभीर चिंतन का परिणाम होती है ! व्यक्ति की अच्छाई याँ उसे मरने नही देती ,और बुराइयाँ उसे जीने नही देती !इसी लिए अर्थात अपनी अच्छा इयों के कारण वह दुनिया में अमर रहता है !और बुराइयों के कारण जीवन काल या जीवनोंपरांत भी वह मृतक के समान ही रहता है! दुनिया पूजा तो केवल अच्छाई की ही करती है !पर ईश्वर ने मनुष्य को बुरा और अच्छा दोनों ही प्रकार की बुद्धि दी है ,अब यह उसकी प्रज्ञा या विवेक पर निर्भर है कि वह कौन सा मार्ग चुने! बुराई पहले लाभ देती दिखाई देती है !बाद मेदुष्परिणाम देती है ,अत:वह तामसी प्रवृत्ति मानी गयी है !पर अच्छाई का रास्ता काँटों भरा है ,वह अवमूल्यित होती है ,चलन से बाहर होती है ,पर अंत में विजयी और सर्व कालिक सर्व समर्थित होती है !क्योकि वह सात्विक वृत्ति है !इसीलिए हम आज तक राम की पूजा करते है और रावण को हर चौराहे पर हर साल फूँका जाता है !सादर !साभार !!

के द्वारा: ranjanagupta ranjanagupta

के द्वारा: tejwanig tejwanig

आदरणीया यमुना पाठक जी ! नई जगह पर व्यवस्थित होने और अपने स्कूल का कार्यभार सँभालने के बाद आपने मंच को पूर्व को भांति समय देना शुरू कर दिया है,इसके लिए बधाई ! आपके लेख को मैंने ध्यान से पढ़ा ! आपने एक जगह लिखा है कि-"दरअसल अच्छे लोग नैतिक और अच्छे होते हैं पर प्रज्ञावान नहीं हो पाते अतः चलन से बाहर हो जाते हैं या कर दिए जाते हैं .ज़रुरत है अच्छाई के साथ प्रज्ञावान होने की जैसा कि श्री राम श्रीकृष्ण महात्मा बुद्ध ,गुरूनानक , में था !" इतिहास को देंखे तो ज्ञात होता है कि अच्छे लोंगो ने बुरे लोंगो से लड़ने के लिए कलम चलाई या तलवार चलाई या फिर अपनी आध्यात्मिक शक्ति प्रदर्शित की.आज अधिकतर अच्छे लोग बुरे लोंगो से डरकर या फिर मुंह फेरकर अपने घरों में दुबक गए हैं ! जो प्रज्ञावान लोग कलम चला रहे हैं,उनकी प्रशासन सुन कहाँ रहा है ! मुझे मोदी जी से बहुत उम्मीद थी कि वो जनता से संवाद कायम करेंगे और उसकी आवाज सुनेंगे,परन्तु समय बीतने के साथ साथ मोदी जी को चुप होते देख मैं उनसे भी निराश हो चला हूँ ! जिस देश में प्रज्ञावान लोंगो की बातों पर सरकार ध्यान नहीं देती है,उस देश में बुरे लोंगो अर्थात दबंग और मनबढ़ू किस्म के राक्षसी प्रवृति वाले लोंगो का अत्याचार और आतंक बढ़ जाता है ! यही आज हमारे देश में हो रहा है ! अंत में एक विचारणीय लेख के सृजन के लिए बहुत बहुत बधाई !

के द्वारा: sadguruji sadguruji

आदरणीय यमुना जी, सादर अभिवादन! काफी दिनों बाद आपका शोधपूर्ण आलेख और साप्ताहिक सम्मान के लिए बधाई ! ...अब मई हाल के ही एक वाकये का जिक्र कर रहा हूँ....एक पार्टी में एक मित्र अपने दूसरे मित्र को अपनी पत्नी को दिखला रहे थे... "वो देखो पिंक कलर की सड़ी में जो महिला दिख रही है वही मेरी पत्नी है". मैंने भी अक्सर उनकी पत्नी को खासकर पार्टियों में पिंक साड़ी में ही देखा है और उसी से मैचिंग लगभग हर चीज....बस यही कह सकता हूँ उन दोनों के लिए पिंक कलर पसंद के ही हों. पर आपने जो बात कही है - गुलाबी रंग वास्तव में बेहद आकर्षक और प्रेम का भी प्रतीक होता है कहते हैं …प्रेम की रूमानी खूशबू जितना विस्तार गुलाबी रंग में पाती है उतना किसी और रंग में कभी नहीं पाती... एक बात मैं और जोड़ देता हूँ 'गुलाबी क्रांति' - अभी लोक सभा के चुनाव प्रचार में मोदी जी ने प्रयोग किया था...बस इस अनूठे आलेख के लिए बधाई ...

के द्वारा: jlsingh jlsingh

दिल की बात कह दी आपने पुरानी संकीर्ण मानसिकता में आकडे इस समाज का मुंह देखते हुए महिलाएं अपने माता पिता के लिए चाहते हुए भी कुछ नाही कर पाती बेहद त्रासदायक है ये स्थिति --मैंने भी कुछ ऐसा ही लिखा है मा के विषय में - हैरान होती हूँ जब लोग पूछते हैं मुझसे परेशान हो तुम अपनी– माँ के लिए ! भाई नहीं है क्या /अकेली हो /ससुराल –? और फिर देखते हैं ऐसी नज़रों से मानो कोई गुनाह कर दिया हो मैंने अपनी –माँ के बारे में सोच कर उसकी परेशानियों के बारे सोच कर बेटी हूँ उसकी- अधिकार की बात तो सब करते हैं मगर फ़र्ज़ क्या मेरा कोई बनता नहीं मुझको भी तो उसने जन्म दिया है अपने अंश से पाला है अपनी नीदों को खो कर जो हूँ बनने की प्रेरणा भी है उसी की फिर क्यों पूछते हैं लोग परेशान हो क्यों तुम -अपनी –माँ -के लिए चाहती हूँ की हर पल को संजो लूं अपनी यादों में हर पल उसके साथ का ,बटोर लूं अपने आँचल में साथ उसके रह सकूं जीवन की इस बेला में सांझ ढलने को है रात आने को है - मैं तो और कुछ नहीं ,उसका साया हूँ -सिर्फ छोड़ कैसे दूं उसे -इस शाम को. इस रात में ज़िम्मेदारियाँ हैं बहुत .चाहतें हैं बहुत बंदिशें हैं बहुत -उलझने हैं बहुत इनसे जूझने का हौसला भी तो दिया है उसने आज भी मेरा बचपन जिन्दा है क्यूँ की तू है आज भी मैं जिद कर सकती हूँ – ——————————– क्यूँ की तू है तेरा साया हर पल मेरे साथ रहेगा- माँ तेरे जाने के बाद भी – पर मैं तो बड़ी हो जाऊंगी डरती हूँ मैं घबरा रही हूँ मैं -अंधेरों से छुपना चाहती हूँ मैं तेरे आँचल में परेशान हूँ मैं अपने लिए और लोग पूछते हैं की क्यूँ – परेशान हो तुम –अपनी माँ के लिए– ऐसा क्यों आखिर –?

के द्वारा: kavita1980 kavita1980

आदरणीय संचालक महोदय (सादर प्रणाम)और मेरे प्रिय ब्लॉगर साथियों/पाठकों यमुना का प्यार भरा नमस्कार बहुत दिनों से अनुपम मंच पर नहीं आने की वज़ह तकनीक परेशानी थी..आपने इस ब्लॉग को पसंद किया यह मेरे लिए बेहद संतुष्टि की बात है एक ऐसा अनुभव जो मुझे ताउम्र सही राहों पर चलने को प्रेरित करता रहेगा .दोस्तों मैं झारखण्ड,महाराष्ट्र,छत्तीसगढ़ ,ओडिशा, पश्चिम बंगाल,मध्य प्रदेश के बाद दक्षिण भारत आ गई हूँ स्थानांतरण की वजह से ही अपने अनुपम मंच से दूर थी .दक्षिण भारत में मैं हिन्दी भाषा के प्रसार को देख कर बहुत प्रसन्न हूँ मुझे यहां भाषा सम्बन्धी परेशानी नहीं हो रही लोग हिन्दी बोलते और समझते हैं.हाँ अपने पसंदीदा समाचार पत्र 'दैनिक जागरण'पढने से वंचित हूँ.वेब न्यूज़ पढने में वह आनंद नहीं आता जो पृष्ठ पलट कर पढ़ने में आता है ...विशेष कर मध्य का सम्पादकीय पृष्ठ .... मैं हिन्दी भाषा का ही प्रयोग करूंगी मैंने यह ख्वाहिश भी की थी कि मुझे दक्षिण भारत में भी रहने का अवसर मिले आप सबों के साथ वैचारिक यात्रा बेहद रोमांचकारी है और मंच से दूर रहना संभव नहीं .. आप सभी का अतिशय धन्यवाद

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